नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कई प्रश्नों के उत्तर दिए।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए दिल्ली प्रांत कार्यवाह अनिल गुप्ता ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए लगभग 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुई हैं। साथ ही लगभग 148 फीडबैक और सुझाव भी प्राप्त हुए हैं। 218 प्रश्नों को विषयवार 21 समूहों में बाँटा गया है। प्रत्येक समूह में प्रश्न का मर्म और भाव सुरक्षित रखा गया है।
प्रश्न – अवैध घुसपैठियों को भारत से निकालने तथा जनसंख्या असंतुलन की चिंता से भारत कैसे निपटेगा एवं संघ इस विषय में क्या सोचता है?
- आप कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम का डीएनए एक है, लेकिन उस पर फिर कट्टरवाद हावी हो जाता है। कुरान, सुन्नत और हदीस पर आधारित पॉलिटिकल इस्लाम मानने वालों के साथ हम कैसे व्यवहार करें?
- यदि डीएनए एक है तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना क्या सही है?
- संघ ने विभाजन का विरोध क्यों नहीं किया एवं पाकिस्तान जैसे देश पर संघ का क्या विचार है?
- अखंड भारत को लेकर संघ का क्या विचार है?
उत्तर – भारतवर्ष हमेशा वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत पर रहा है, फिर भी कुछ शताब्दियों में भारत की सीमाएं संकुचित क्यों हुई हैं? इस unification with neighbouring countries पर यह पहला हक है। तो डेमोग्राफी की चिंता होती है और होने का कारण है कि जब डेमोग्राफी बदलती है, तो उसके कुछ परिणाम निकलते हैं। देश का विभाजन एक परिणाम है। मैं केवल भारत की बात नहीं कर रहा हूँ; इंडोनेशिया सहित लगभग सभी देशों में डेमोग्राफिक असंतुलन की चिंता रहती है।
संख्या से ज्यादा इरादा मायने रखता है। इसके बारे में मन में शंका रहती है। तो पहली बात संख्या की है। जनसंख्या असंतुलन के वास्तव में कारण क्या हैं?
पहला कारण : मतांतरण (Conversion)
यह भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है। कैथोलिक चर्च के लोग हमें बताते हैं कि “हम कन्वर्जन नहीं करते।” यानी कहीं न कहीं क्रिश्चियनिटी में भी इसे ठीक नहीं माना जाता। ऐसा एक प्रवाह है। परसों उलमाओं से बात हुई थी। मदरसों के शिक्षकों से बात हुई। उन्होंने हमें बताया कि इस्लाम में भी कन्वर्जन मना है।
पैगंबर साहब के चाचा को जब कलमा पढ़ाने की बात आई, तो पैगंबर ने मना कर दिया। उन्होंने कहा—“यह नहीं करना है।” अगर ऐसा है, तो यह होना ही नहीं चाहिए। रिलिजनअपनी-अपनी पसंद है। जिसे जिस रिलिजन में जाना है, जाए। अगर कोई जबरदस्ती गया है और वापस आना चाहता है तो वह भी कर सके। रिलिजन का चुनाव अपने मन से होना चाहिए, लोभ, लालच या दबाव से नहीं। लेकिन आज यह हो रहा है। इसलिए इसे रोकना पड़ेगा।
दूसरा कारण: घुसपैठ
यह ठीक है कि हमारा डीएनए सबका एक है, लेकिन व्यवस्था होती है। अब यूरोप में भी तीन-तीन, चार-चार देश ऐसे हैं जो समान एसएसपी रखते हैं, लेकिन देश अलग-अलग हैं। देश एक व्यवस्था है, उसकी सीमाएँ होती हैं और उसमें आना-जाना नियमों से होता है।
आप पूछते हैं— घुसपैठियों को रोकना सही है क्या.? मैं कहता हूँ— परमिशन लेकर आना गलत है क्या? क्या परमिशन लेकर आ रहा था? परमिशन नहीं मिलती तो नहीं आना चाहिए। लेकिन विधि-विधान और नियम को बाजू में रखकर घुस जाना अपने आप में गलत बात है। आने पर उपद्रव होता है—यह अनुभव है। इसलिए घुसपैठ को रोकना चाहिए।
सरकार और समाज की भूमिका
कुछ तो सरकार रोक सकती है। सरकार प्रयास कर रही है, धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। परंतु समाज के हाथ में भी है कि हम अपने देश में रोजगार अपने देश के लोगों को दें। हमारे देश में भी मुसलमान नागरिक हैं, उन्हें भी रोजगार की आवश्यकता है। यदि मुसलमान को रोजगार देना है, तो अपने देश के मुसलमान को दीजिए। बाहर से आए को क्यों दें? उनके देश की व्यवस्था उन्होंने करनी चाहिए।
हाँ, परमिशन लेकर आकर नौकरी करने वाले लोग तो हर देश में होते हैं। हमारे यहाँ भी हो सकते हैं।
इसलिए समाज को चाहिए कि लोगों को पहचानें। अगर सुरक्षा से संबंधित कुछ बातें सामने आती हैं, तो उनकी रिपोर्ट करें ताकि उन पर निगरानी रखी जा सके। और ऐसे लोगों को रोजगार न दें। यह हम कर सकते हैं तो घुसपैठ का कारण भी कम हो जाएगा।
तीसरा कारण : जन्मदर
दुनिया के सब शास्त्र कहते हैं कि जिनका जन्मदर तीन से कम होता है, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं। इसलिए तीन से ऊपर बनाए रखना चाहिए। सब देशों और समाजों में ऐसा होता है।
डॉक्टर लोग मुझे बताते हैं कि तीन संतान होने में बहुत देर नहीं करनी चाहिए। विवाह के बाद तीन संतान होना माता-पिता और संतान — तीनों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है। जिस घर में तीन संतान होती हैं, वहाँ की संतान आपस में ईगो मैनेजमेंट सीख लेती हैं। इसलिए आगे चलकर उनके परिवार में कोई डिस्टर्बेंस नहीं होता।
पॉपुलेशन पॉलिसी और 2.1 का अर्थ
हमारे देश की पॉलिसी है Population Policy। वह 2.1 को रिकमेंड करती है। अब देश का औसत 2.1 है। यह तो ठीक है, लेकिन संतान तो 0.1 कभी होती नहीं। गणित में 2.1 का अर्थ होता है। लेकिन मनुष्य के जन्म में 2 के बाद पॉइंट नहीं होता। इसलिए 2.1 का मतलब भी वास्तव में 3 ही होता है।
इसलिए भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को यह देखना चाहिए कि उसके घर में तीन संतान हों। मैं यह देश की दृष्टि से कह रहा हूँ।
जनसंख्या : एसेट या बोझ.?
एक और चिंता है—जनसंख्या एक एसेट भी है और बोझ भी हो सकती है। कल सबको खिलाना पड़ेगा। इसके लिए पॉपुलेशन पॉलिसी ने रिकमेंड कर दिया है कि दोनों तरफ से संतुलन रहे—जनसंख्या नियंत्रित भी रहे और पर्याप्त भी। इसलिए तीन संतान होना ठीक है, लेकिन तीन से बहुत अधिक नहीं होना चाहिए। ताकि परवरिश अच्छी तरह हो सके। यह सब लोगों ने स्वीकार करने योग्य बात है।
जनसंख्या संतुलन की आवश्यकता
जन्मदर कम होने की बात है तो वह सबका कम हो रहा है। हिंदुओं का पहले से ही कम था, अब और भी कम हो रहा है। बाकी लोगों का उतना कम नहीं हो रहा था, इसलिए आज उनका अनुपात ज्यादा दिखता है। लेकिन उनका भी जन्मदर घट रहा है।
प्रकृति ऐसा करती है—जब संसाधन कम होते हैं और जनसंख्या ज्यादा हो जाती है तो प्रकृति अपने आप कोई संतुलन बना देती है। इसका संदेश ठीक है।
सब लोगों को चाहिए कि तीन से कम संतान न करें और तीन से आगे भी न बढ़ाएँ। इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना चाहिए। और जिनके हाथ में अभी भी है, उन्होंने ऐसा करना चाहिए। क्योंकि जनसंख्या का संतुलन ज़रूरी है।
संघ ने विभाजन का विरोध क्यों नहीं किया?
तीसरा प्रश्न विभाजन से संबंधित है—संघ ने विभाजन का विरोध क्यों नहीं किया? यह जो सूचना है, उसके लिए शेषाद्री जी की एक पुस्तक है Tragic Story of Partition। आप सब लोग उसे पढ़िए। उसमें विस्तार से लिखा है कि विभाजन कैसे हुआ, विभाजन किस कारण से हुआ, क्या करने से रुक सकता था और विभाजन में किसका क्या योगदान रहा। संघ का मत क्या था, यह सब कुछ उसमें लिखा है।
इसका ठीक-ठीक ज्ञान आपको उस पुस्तक के पढ़ने से मिलेगा। जब आप उसे पढ़ेंगे तो पाएंगे कि संघ ने विभाजन का विरोध किया था। लेकिन संघ की शक्ति उस समय क्या थी? पूरा देश महात्मा गांधी जी के पीछे था। गांधी जी ने तो यहाँ तक कहा था—“मेरी लाश पर ही विभाजन होगा।”
गांधीजी और विभाजन का निर्णय
गुरुजी से एक स्वयंसेवक ने प्रश्न किया था। एक अच्छे कार्यकर्ता ने पूछा— “यह गाड़ी इधर जा रही है, तो क्या होगा?” तब गुरुजी ने कहा था—“नहीं, गांधीजी ने अनुमति नहीं दी है, विभाजन नहीं होगा।” लेकिन उसके बाद कुछ हुआ और गांधीजी ने उसे मान्य कर लिया। उनके मान्य करने के बाद संघ जो कुछ भी कहता, समाज उसका समर्थन नहीं करता था। इसलिए संघ विभाजन को रोक नहीं सका। उसे रोकने के लिए हम भी कुछ नहीं कर पाए।
अखंड भारत : एक सत्य
अखंड भारत एक सत्य है। विभाजन होने से क्या परिणाम होंगे, इसका पूर्वानुमान कई लोगों ने लगाया था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का एक लेख है। उस समय चट्टान नामक एक पेपर लाहौर से निकलता था। उसके पत्रकार ने उनका इंटरव्यू लिया था। यह 1946 का इंटरव्यू है। (सटीक तारीख मुझे याद नहीं, पर मिल जाएगा। वह उपलब्ध है।)
उस लेख में मौलाना आज़ाद ने विभाजन का विरोध करते हुए अपने विचार रखे और विभाजन के संभावित परिणामों का उल्लेख किया। उन्होंने जो भविष्यवाणियाँ कीं, वे अक्षरशः सत्य सिद्ध हुईं। आज हम देखते हैं कि पाकिस्तान की क्या स्थिति है और भारत में मुसलमानों की क्या हालत होगी— यह सब उन्होंने पहले ही लिख दिया था। लेकिन दुर्भाग्यवश, उनके जैसे लोगों की बात नहीं सुनी गई।
लेकिन भारत अखंड है। यह एक सत्य है, फैक्ट ऑफ लाइफ है। जबरदस्ती उस सत्य को नकारकर जो लोग अलग चल रहे हैं, उनका क्या हाल हुआ है? जिन्होंने कहा—“हम एक नहीं, हम अलग हैं,” और अलग हो गए— उस दिन से लेकर इस क्षण तक की स्थिति देख लीजिए। क्या वे सुखी हैं? न भौतिक सुख है, न आध्यात्मिक। क्या इतने वर्षों में उन्होंने प्रयास नहीं किए? बहुत प्रयास किए, लेकिन कोई उपाय नहीं निकला।
उपाय निकलेगा कैसे.? मान लीजिए मैंने एक हाथ को जबरदस्ती जकड़कर अलग कर दिया, तो वह सुन्न हो जाएगा, मृतप्राय हो जाएगा। क्योंकि जिस जीवंत शरीर का वह अंग था, उससे उसका संबंध काट दिया गया। उपाय केवल एक ही है—संस्कृति से, पूर्वजों से, मातृभूमि से हम एक हैं, ऐसा समझें और वैसा आचरण प्रारंभ करें।
अखंड भारत : केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं
अखंड भारत ध्यान में रखना चाहिए कि केवल पॉलिटिकल अवधारणा नहीं है। जब भारत अखंड था, तब भी यहाँ अनेक राजा थे, अनेक राज्य थे। सीमाएँ थीं, आने-जाने के लिए परमिशन लेनी पड़ती थी और प्राचीन काल में आपस में युद्ध भी होते थे। लेकिन जनता की प्रकृति यह थी कि उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक बेरोक-टोक जाती थी। कहीं भी रहकर कमाती-खाती थी और इस देश के साथ अपने आप को एकाकार मानती थी।
अखंड भारत की भावना का महत्व
यदि वही भावना फिर से जाग जाए, तो उस समय का पॉलिटिकल-इकोनॉमिक स्पेस चाहे जैसा भी हो, सबकी उन्नति होगी। सब सुखी रहेंगे, शांतिपूर्ण वातावरण बनेगा और मित्रता बढ़ेगी। इसलिए, यह जो खंडित भारत का दुस्वप्न आया है, उस नींद से जागना अत्यंत आवश्यक है। और सोया हुआ आदमी कभी न कभी जागता ही है। इसलिए हमें यह समझकर चलना चाहिए कि भारत अखंड है।
प्रश्न – अनेक मुसलमानों के लिए हिंदू शब्द की भौगोलिक पहचान को मानना आज आसान नहीं है, जबकि उन्हें भारतीय मुसलमान कहने में कोई आपत्ति नहीं है। मुस्लिम धर्म-स्थलों की खुदाई हो रही है तथा मुसलमानों पर अत्याचार में संघ के स्वयंसेवक ही आगे रहते हैं। यदि यह दूरी और अविश्वास बना रहा तो भारत मज़बूत और विश्वगुरु कैसे बनेगा.?
- स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी हिंदू-मुस्लिम संघर्ष क्यों.?
- क्या हम सभी भारतीय होने के नाते संगठित होकर नहीं रह सकते.?
- क्या आप मुस्लिम आक्रांताओं के नाम पर रखे मार्ग और शहरों का नाम बदलना उचित मानते हैं?
- संघ भारत के मुसलमानों एवं ईसाई समुदाय के विरोध में नहीं है। यह विश्वास संघ उन्हें क्यों नहीं दिला पा रहा है?
उत्तर – संघ का दृष्टिकोण मुसलमानों और ईसाई समुदाय के प्रति
हिंदू शब्द एक कंटेंट को व्यक्त करता है। इसलिए हम आग्रहपूर्वक हिंदू कहेंगे।कोई हिंदवी कहता है, कोई भारतीय कहता है, कोई आर्य कहता है, कोई इंडिक कहता है—तो यह सब भी सही है। हम जानते हैं, और वे भी जानते हैं। इसलिए उनके इस शब्द-प्रयोग को हम मान्यता देते हैं।
हम इन सभी शब्दों को समानार्थी मानते हैं। लेकिन जो कंटेंट मैंने बताया— विशेषकर सांस्कृतिक कंटेंट, पूर्वज-परंपरा— उसे व्यक्त करने वाला आज एक ही शब्द है, और वह है हिंदू। इसलिए हम उसका उपयोग रखते हैं। आप भारतीय कहें, ठीक बात है। आप जान लें कि यह एक ही बात है। उसी तरह कोई हिंदवी कहे, तो भी हमें कोई आपत्ति नहीं है। शब्दों के झगड़े में हम नहीं पड़ते। हमारा मतलब कंटेंट से है। वह कंटेंट आप समझ लीजिए, तो शब्दों के उपयोग में हमें कोई समस्या नहीं है।
हिंदू-मुस्लिम बहस और एकता का प्रश्न
इन शब्दों के कारण ही हिंदू-मुस्लिम जैसी बहस खड़ी हो गई। अब हिंदू-मुस्लिम एकता—मेरे मन में आता है कि जब हम पहले से ही एक हैं, तो फिर “एकता” की बात क्यों..? क्या अलग हुआ है..? पूजा बदली है, यही तो। और क्या बदला है..? लेकिन डर बैठा दिया गया कि यदि ये लोग साथ रहेंगे तो क्या होगा, कहा नहीं जा सकता।
हाँ, यह सही है कि बहुत लड़ाइयाँ हुईं, अत्याचार हुए, कत्लेआम हुए, देश भी टूटा। इसलिए सावधान रहो। लेकिन दूसरी तरफ यह भी कहा गया—“अरे भाई, हिंदुओं के साथ रहोगे तो तुम्हारा इस्लाम चला जाएगा। तुम अलग-अलग माँगो, नहीं तो तुम्हारी कोई आइडेंटिटी नहीं बचेगी।”
यह गलत बात है। उसका प्रमाण मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के इंटरव्यू में है। उन्होंने कहा था—“रिलिजन बदलने से क़ौम नहीं बदलती।” और यही बात मुझे अरशद मदनी साहब ने भी बताई थी कि उनके चाचा ने भी यह बात कही थी।
तो हमारी आइडेंटिटी जो रह गई है— हम हिंदू हैं, हम भारतीय हैं, हम हिंदू भी हैं। जो भी कहना है, वह एक पहचान है। यह हमारी संस्कृति, मातृभूमि, पूर्वजों और परंपरा को दर्शाती है। जब हम इसे भूल जाते हैं, तभी 70 वर्ष बाद भी यह अविश्वास बना रहता है। एक तरफ हिंदुओं में उनकी दुर्बलता के कारण यह आत्मविश्वास नहीं है कि “ठीक है, मुसलमान हमारे भाई हैं।”
लेकिन यह कहना कि “पूजा बदल जाएगी”—यह कैसा तर्क है..? हमारी संस्कृति तो कहती है— “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”। तो हम यदि संगठित होकर साथ चलें, साथ मिलकर आगे बढ़ें और मुसलमान भी आत्मविश्वास से साथ चलें, तो उनका इस्लाम बचेगा या नहीं, यह प्रश्न ही नहीं उठता।
आध्यात्मिकता भूल गए है, अपनी शक्ति को भुला दिया है। इसलिए एक तरफ शक्ति जागरण करना आवश्यक है, समाज का संगठन करना आवश्यक है। और दूसरी तरफ यह गलतफहमी दूर करनी आवश्यक है कि भाई, इस्लाम भारत में पहले दिन आया और तब से आज तक है और रहेगा। मैंने पिछली बार भी कहा था—“इस्लाम नहीं रहेगा”—ऐसा सोचने वाला हिंदू सोच का नहीं है। हिंदू सोच ऐसी नहीं है। दोनों तरफ आत्मविश्वास बने, यही ज़रूरी है। तो यह संघर्ष समाप्त होंगे। पहले यह मानना होगा कि हम सब एक हैं। हमारी भाषाएँ अलग हैं, जाति-पाँति अलग है, पूजा अलग है—यह सब हमारी विशिष्टताएँ हैं। लेकिन सबसे ऊपर है— हमारा राष्ट्र, हमारा देश, हमारा समाज, हमारी संस्कृति। और यह अलग-अलग नहीं है। यह कोई फेडरेशन ऑफ कम्युनिटीज एंड सोसाइटीज़ नहीं है। We are one people, we the people.
शहरों और रास्तों के नाम बदलने का दृष्टिकोण
अब शहरों और रास्तों के नाम बदलने की बात— वह वहाँ के लोगों की भावनाओं और प्राण से जुड़ी होनी चाहिए। आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिए।
लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मुसलमानों के नाम नहीं होने चाहिए। आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिए। पर शहीद हवलदार अब्दुल हमीद का नाम होना चाहिए, डॉक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नाम होना चाहिए। यहाँ सवाल रिलिजन का नहीं है। सवाल यह है कि कौन देशभक्त है और हमें किससे प्रेरणा मिलती है। जितनी प्रेरणा रामप्रसाद बिस्मिल से मिलती है, उतनी ही अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान से भी मिलती है—और मिलनी चाहिए।
भिन्नताओं का सम्मान और झगड़ों का समाधान
क्योंकि पूजा-पद्धति, खानपान और रीति-रिवाज के भेद हमारी संस्कृति में भेद के रूप में स्वीकार नहीं किए जाते। वे विशिष्टता माने जाते हैं, उनका सम्मान और स्वीकार किया जाता है। परंतु राष्ट्र और समाज के नाते हम एक हैं। इसलिए झगड़े, जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण हुए, उन्हें धीरे-धीरे समाप्त करना होगा।
इसलिए नगरों/स्थानों का नाम बदलने में मुसलमान-विरोध नहीं है। नाम बदलना केवल आक्रांताओं के संदर्भ में है। बाकी सब स्वीकार हैं—यह ध्यान रखना चाहिए।
संघ पर अत्याचार के आरोप और प्रमाण
संघ पर यह कहा गया कि स्वयंसेवक ही अत्याचार में आगे रहते हैं। लेकिन विश्वसनीय प्रमाण क्यों नहीं दिए जाते? आपने कितनी जगह देखा कि संघ के स्वयंसेवक अत्याचार करते हुए मिले? मैं प्रमाण की बात नहीं कर रहा हूँ। वह तो अलग विषय है। प्रमाण कई बार मिलते भी नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि जब झगड़ा होता है, रास्तों पर टकराव होता है, तब एक-दूसरे पर प्रहार होता है और प्रतिकार भी करना पड़ता है।
क्या हिंदुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण किया.?
यह अलग बात है। लेकिन क्या कोई प्रमाण है कि हिंदुओं ने मुसलमानों पर आक्रमण किया हो या संघ के लोगों ने आक्रमण किया हो? यदि एक जगह ऐसा मान भी लिया जाए, तो दूसरी ओर के उदाहरण भी देखने होंगे। जैसे चरखी दादरी में विमान दुर्घटना हुई, सभी प्रवासी मुसलमान थे—उनकी कितनी सेवा संघ के स्वयंसेवकों ने की। केरल में बाढ़ आई, गुजरात में भूकंप आया—तब किसी का रिलिजन नहीं देखा गया। सबकी सेवा की गई।
नैरेटिव और अविश्वास का कारण
एकतरफ़ा दृष्टि बनाए गए नैरेटिव के कारण यह अविश्वास उत्पन्न हुआ है। परसेप्शन का पर्दा हटाकर, थोड़ा साहस करके दो कदम भीतर जाकर देखें तो वास्तविकता दिखाई देगी। जिन्होंने प्रत्यक्ष देखा है, उन्हें पता है कि यह आरोप सरासर गलत है। संघ का स्वयंसेवक न तो किसी अत्याचार में विश्वास रखता है, न ही उसका समर्थन करता है।
यदि कहीं कुछ गलत हुआ है तो वह संघ की ओर से कभी नहीं हुआ। हिंदू समाज की कुछ कमज़ोरियों के कारण यदि कुछ गलत हुआ भी, तो मैंने स्वयं सार्वजनिक मंचों से उसकी निंदा की है। यह सब आप जानते हैं। तो फिर संघ पर आरोप क्यों.? ऐसा नहीं कहना चाहिए।
विश्वास निर्माण और पारदर्शिता
विश्वास बनाने की बात है। हम जो करते हैं, खुलकर करते हैं। डंके की चोट पर करते हैं। आज के इस भाषण में भी अनेक मुसलमान भाई आमंत्रित हैं। हिंदू राष्ट्र की बात हम छुपाकर नहीं करते। आप कभी भी आकर देख सकते हैं। कोई गुप्त बात नहीं है।
उधर से भी कुछ होना आवश्यक है, तभी हिंदू समाज और संघ पर विश्वास बनेगा। क्योंकि संघ तो ऐसा बिल्कुल नहीं है और न ही हिंदू समाज की प्रकृति ऐसी है।
साझा चेतना और संस्कृति
यह ध्यान में रखना चाहिए कि मुस्लिम और ईसाई समाज भी इस साझा चेतना (common consciousness) और साझा संस्कृति से जुड़ सकते हैं— बशर्ते यह धारणा थोपना बंद हो जाए या वे स्वयं इसे अस्वीकार करें कि “हमारी पूजा अलग है, इसलिए हम समाज और संस्कृति से अलग हैं।”
वे मुसलमान हैं, ईसाई हैं— लेकिन यूरोपीय नहीं हैं। वे अरब या तुर्क नहीं हैं। वे भारत के हैं। उनके पूर्वज भारतीय हैं। जब उनके नेतृत्व की भाषा यह होगी और जब यह शिक्षा वहाँ दी जाएगी, तब सब ठीक होगा। हिंदू समाज आतुरता से इसी राह की प्रतीक्षा कर रहा है।
“वसुधैव कुटुम्बकम” और स्वतंत्रता की सीमाएँ
“वसुधैव कुटुम्बकम” का उत्तर भी मैंने पहले दिया था। देश की व्यवस्थाएँ होती हैं। पृथ्वी एक कुटुंब है, लेकिन कुटुंब भी व्यक्तियों से बनता है। अनेक देश इस कुटुंब के व्यक्ति-स्वरूप हैं। पूरा कुटुंब एक रहता है, लेकिन कुटुंब की व्यवस्था का सम्मान प्रत्येक व्यक्ति को करना पड़ता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी संयम रखना पड़ता है।
हर किसी को स्वतंत्रता है—आपका हाथ जैसे चाहे घुमाइए। लेकिन यदि वह मेरे गाल तक पहुँच गया तो वह स्वतंत्रता नहीं रहेगी। वहाँ सीमा होगी।
स्वतंत्रता भी एक मर्यादित बात है। वह अनुशासन का नाम है, केवल मुक्तता का नाम नहीं है। यह ध्यान में रखना और उसी अनुसार आचरण करना आवश्यक है। इसलिए देश में अवैध (Illegal) प्रवासी नहीं आने चाहिए। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है और न ही यह वसुधैव कुटुम्बकम के तत्व के विपरीत है। कुटुंब की व्यवस्था ठीक चले, इसके लिए जो नियम सबके लिए हैं, उन नियमों का पालन सभी को करना चाहिए।

















