IADWS: आयरन डोम से आगे की सोच, भारत का स्वदेशी हवाई कवच
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IADWS: आयरन डोम से आगे की सोच, भारत का स्वदेशी हवाई कवच

ड्रोन-मिसाइल युद्ध के दौर में भारत का रक्षक कवच होगा 'आईएडीडब्ल्यूएस'

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Aug 24, 2025, 05:15 pm IST
in रक्षा
इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस हथियार प्रणाली (आईएडब्ल्यूएस) का सफल परीक्षण

इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस हथियार प्रणाली (आईएडब्ल्यूएस) का सफल परीक्षण

दुश्मन के हवाई खतरों के खिलाफ श्रेत्रीय रक्षा को मजबूती देने के लिए डीआरडीओ ने ओडिशा के तट पर ‘इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम’ (IADWS) का पहला सफल परीक्षण कर यह साबित कर दिया कि भारत अब मल्टी लेयर एयर डिफेंस में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। यह भारत की केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि देश की रक्षा क्षमताओं में गुणात्मक छलांग का प्रतीक है। यह प्रणाली ऐसे समय में विकसित और परखी गई है, जब आधुनिक युद्ध की परिभाषा तेजी से बदल रही है। आज का युद्ध केवल परंपरागत टैंक, तोप और लड़ाकू विमानों पर आधारित नहीं रह गया है बल्कि इसमें ड्रोन, मिसाइल, सैटेलाइट और साइबर हमलों की अहम भूमिका हो चुकी है। विशेषकर ड्रोन अटैक और स्वॉर्म तकनीक जैसे खतरे दुनिया की सेनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों की नीतियां और उनके द्वारा अपनाई गई रणनीतियां भारत को लगातार सतर्क रहने के लिए बाध्य करती हैं। ऐसे में एकीकृत डिफेंस सिस्टम का परीक्षण भारत की रक्षा तैयारी को एक नए स्तर पर ले जाता है।

विभिन्न श्रेणियों की स्वदेशी मिसाइलों और उच्च क्षमता के लेजर हथियारों (हाई पावर लेजर बेस्ड डायरेक्टेड एनर्जी वेपन) से लैस इस प्रणाली में ‘क्विक एक्शन सरफेस टू एयर’ मिसाइलें शामिल हैं, जो दूर से आने वाले तेज गति वाले हवाई खतरों को तुरंत निशाना बना सकती हैं। इसमें एडवांस्ड वैरी शॉर्ट एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम भी है, जो कम दूरी और कम ऊंचाई पर आने वाले धीमे खतरों को भी मार गिरा सकता है। सबसे आधुनिक और महत्वपूर्ण तकनीक इसमें लेजर बेस्ड डायरेक्टेड एनर्जी वेपन की है, जो ड्रोन और सस्ते लेकिन भारी संख्या में किए गए हमलों को एक साथ निष्क्रिय कर सकती है। परीक्षण के दौरान तीन अलग-अलग लक्ष्यों पर हमला किया गया, जिनमें दो हाई स्पीड फिक्स विंग अनमैन्ड ड्रोन और एक मल्टी कॉप्टर ड्रोन शामिल थे। ये सभी अलग-अलग ऊंचाई और दूरी पर उड़ रहे थे। आईएडीडब्ल्यूएस ने तीनों लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक किया और उन्हें सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया, जो इस प्रणाली की दक्षता और वास्तविक क्षमता को स्पष्ट दर्शाता है।

इसका संचालन एक सुव्यवस्थित अवधारणा पर आधारित है। सबसे पहले इसकी रडार यूनिट आने वाले खतरों की निगरानी करती है और उनकी पहचान करती है। फिर यह कमांड सेंटर को जानकारी देती है, जो खतरे की प्रकृति और दूरी के अनुसार यह तय करता है कि किस हथियार प्रणाली को सक्रिय करना है। यदि खतरा तेज रफ्तार मिसाइल या फाइटर जेट की तरह ऊँचाई से आ रहा है तो क्विक एक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल को दागा जाता है। यदि खतरा कम दूरी से धीमी गति वाले ड्रोन या हेलीकॉप्टर का है, तो वैरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय होता है। यदि एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन या स्वॉर्म अटैक सामने हो तो लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह यह प्रणाली परत दर परत सुरक्षा प्रदान करती है।

भारत ने इस प्रणाली को ‘सुदर्शन चक्र मिशन’ का हिस्सा बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपने भाषण में सुदर्शन चक्र मिशन की घोषणा की थी। यह मिशन मूलतः भारत की मल्टी लेयर एयर डिफेंस कैपेबिलिटी को और मजबूत करने तथा देश को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करने की दिशा में एक दीर्घकालिक पहल है। परीक्षण की सफलता का अर्थ यह भी है कि भारत को अब विदेशी एयर डिफेंस सिस्टम, जैसे रूस की इग्ला मिसाइल या पश्चिमी देशों की क्लोज-इन वेपन सिस्टम (सीआईडब्ल्यूएस) पर अधिक निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी। इस सफलता से भारत की सामरिक स्वायत्तता और रक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। यह प्रणाली केवल तकनीकी दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी यह बेहद अहम है। पाकिस्तान ने पिछले कुछ वर्षों में बार-बार ड्रोन के जरिये भारतीय सीमाओं पर हथियार और नशीले पदार्थ गिराने की कोशिश की है। चीन भी स्वॉर्म ड्रोन तकनीक में भारी निवेश कर रहा है। भविष्य के युद्धों में ऐसे ही सस्ते लेकिन खतरनाक हथियार बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाएंगे। ऐसे में आईएडीडब्ल्यूएस भारत के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करेगा।

गौरतलब है कि इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने पंजाब के आदमपुर एयरबेस से जिस आकाशतीर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम की सराहना की थी, वह भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। आकाशतीर प्रणाली ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के सैकड़ों ड्रोन, मिसाइल और रॉकेट को मार गिराकर अपनी क्षमता साबित की थी। इसीलिए इसे ‘भारत का आयरन डोम’ भी कहा जाने लगा है। आकाशतीर एक एआई-पावर्ड एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे डीआरडीओ, इसरो और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने मिलकर तैयार किया है। इसका काम लो लेवल एयरस्पेस की निगरानी करना और जमीन पर तैनात एयर डिफेंस हथियार प्रणालियों को नियंत्रित करना है। यह रडार, सेंसर और कम्युनिकेशन नेटवर्क को एकीकृत कर वास्तविक समय में आने वाले खतरों का पता लगाता है और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है।

आईएडीडब्ल्यूएस और आकाशतीर जैसी प्रणालियों का संयुक्त रूप से इस्तेमाल भारत की हवाई सुरक्षा को बेहद मजबूत बना देगा। यह एक नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर का हिस्सा है, जिसमें विभिन्न प्रणालियों को जोड़कर एक समन्वित ढांचा तैयार किया जाता है। आने वाले वर्षों में इन प्रणालियों को भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के साथ पूरी तरह से इंटीग्रेट किया जाएगा ताकि किसी भी हवाई खतरे से तुरंत और प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। तकनीकी दृष्टि से देखें तो आईएडीडब्ल्यूएस का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह एक मल्टी लेयर डिफेंस सिस्टम है। इसमें तीन स्तर की सुरक्षा है, लंबी दूरी के लिए क्विक एक्शन मिसाइल, मध्यम और कम दूरी के लिए वैरी शॉर्ट रेंज मिसाइल और सामूहिक हमलों के लिए लेजर हथियार। इसके अलावा यह प्रणाली एआई आधारित निर्णय क्षमता से लैस है, जिससे यह स्वतः ही खतरों का विश्लेषण कर सकती है और सबसे उपयुक्त हथियार का चुनाव कर सकती है।

इस उपलब्धि का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह पूरी तरह स्वदेशी है। डीआरडीओ, इसरो और बीईएल जैसे संस्थानों ने मिलकर इसे विकसित किया है, जिससे न केवल भारत की तकनीकी क्षमता का पता चलता है बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर भारत का सपना धीरे-धीरे साकार हो रहा है। भविष्य में इस प्रणाली का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाएगा और इसे भारत के विभिन्न सामरिक ठिकानों, सीमाओं और संवेदनशील इलाकों में तैनात किया जाएगा। इसका निर्यात भी संभव है क्योंकि आज दुनिया के कई देश ड्रोन और मिसाइल हमलों से जूझ रहे हैं और उन्हें ऐसे समाधान की आवश्यकता है।

आईएडीडब्ल्यूएस परीक्षण की सफलता को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह केवल एक हथियार प्रणाली का विकास नहीं है बल्कि भारत की सामरिक सोच और तैयारी में आए बदलाव का भी प्रमाण है। भारत अब केवल रक्षात्मक स्थिति में नहीं है बल्कि वह भविष्य की संभावित चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए पहले से ही ठोस तैयारी कर रहा है। कुल मिलाकर, आईएडीडब्ल्यूएस भारत की रक्षा नीति का एक अहम स्तंभ साबित होगा। यह दुश्मन के हवाई खतरों, चाहे वे मिसाइल हों, फाइटर जेट हों या ड्रोन, सभी के खिलाफ सुरक्षा कवच प्रदान करेगा। इसके साथ ही यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को और मजबूत करेगा और देश को वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करेगा।

 

Topics: भारत का स्वदेशी हवाई कवचड्रोन-मिसाइल युद्धसुदर्शन चक्र मिशनओडिशा तटडीआरडीओनरेंद्र मोदी‘आत्मनिर्भर भारत’आकाशतीरआईएडीडब्ल्यूएसIADWS
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