India Pakistan Partition : विभाजन काल की परिस्थिति, साम्राज्यवादी शक्तियों के हित और राजनीतिक हसरतों की कहानी एक तरफ.. मगर उन लोगों से बात करना जिन पर यह आफत गुजरी, दिल दहलाने वाला है। झुर्रियों से अटे चेहरे, धुंधलाती आखें और उस घटनाक्रम को याद कर रुंध जाने वाले गले… बुजुर्गों का अचानक फफककर रो पड़ना दबाए गए इतिहास का बांध टूट जाने जैसा है।
यह हिंदू नरसंहार का वह भीषण मामला है जिसकी दुनिया में कभी चर्चा तक नहीं होती। पाञ्चजन्य ने इसी पीड़ा को समाज के सामने लाने की ठानी है। हमारे संवाददाता दिल्ली सहित देश के विभिन्न शहरों, गांवों में महीनों से भटक रहे हैं, गलियों की खाक छान रहे हैं, तब जाकर उन लोगों तक पहुुंच पा रहे हैं, जो विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आए। बचपन में बंटवारे को अपनी आंखों से देखने वालों के बयान थर्राहट से भर देने वाले हैं। इनकी आपबीती किसी को भी रुला देती है। आज ये सभी 75-100 वर्ष के हैं, लेकिन इतने दिन बाद भी उनके मन में अपनी मिट्टी छोड़ने की कसक है। मुस्लिम गुंडागर्दी के सामने बेबस रह जाने की फांस है। अपनी मां,बहन बेटियों के साथ बलात्कारों को देखने, उनके कुंओं में छलांगें लगाने या जिहादियों द्वारा झपट लिए जाने की पहाड़ जैसी पीड़ा है।
ये दर्दनाक कहानियां लंबी और त्रासद हैं, जिन्हें हमने अपने यूट्यूब चैनल @panchjanya पर अपलोड किया है। इस विशेषांक में ऐसे ही लोगों के दर्द और संघर्ष की कहानियों को बहुत संक्षेप में उड़ेला गया है। यदि आपके आसपास भी विभाजन से पीड़ित लोग हों, तो हमें उनका वीडियो बनाकर [email protected] पर भेज सकते हैं।
गर्भवती महिलाओं को भी मारा
-बी.एल.शर्मा ‘प्रेम’ एवं कृष्णा शर्मा, फिरोजपुर (अब पाकिस्तान में)
India Pakistan Partition : बंटवारे की त्रासदी सात दशक बाद भी भूले नहीं भूलती। जब हिन्दू मां-बहनों पर खुलेआम आततायी मुसलमानों द्वारा अत्याचार किया जा रहा था, घर-दुकान, व्यवसाय को तहस-नहस करके परिवार के परिवार मौत के घाट उतार दिए जा रहे थे। यहां तक कि मुसलमानों ने गर्भवती महिलाओं तक को नहीं छोड़ा। उनके गर्भ पर वार करके पेट से बच्चा निकालकर सूली पर टांग कर उसकी हत्या की गई। ऐसी निर्दयता भला जीते-जी कौन भूल सकता है!
1940 में मैं संघ का स्वयंसेवक बन गया था। हमारे इलाके में अफरातफरी का माहौल था। हिन्दू पलायन कर रहे थे। पाकिस्तान के मुसलमान स्वयंसेवकों को लक्षित करके हमले कर रहे थे। हालात को समझकर मैंने अपने क्षेत्र के 15 सौ हिन्दुओं को साथ लेकर भारत जाने का निश्चय किया। रास्ते में भी हम पर हमले हुए।
‘आते, काटते और चले जाते’
-बिहारीलाल सेठी,लालामूसा, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : उम्र के इस पड़ाव पर थोड़ा ऊंचा भले सुनता हूं, लेकिन मेरे दिमाग में बंटवारे के दिनों की यादें शीशे सी साफ हैं। वे हादसे भुलाए भी नहीं जा सकते। हम लोगों ने जो पीड़ा झेली, उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है। अचानक बंटवारे का ऐसा शोर मचा कि एक भय का माहौल बनता चला गया। उस समय कत्लेआम, लूटपाट और महिलाओं के साथ बदसुलूकी की घटनाएं सुनकर रूह कांप उठती थी। पता चलता कि फलां गांव में कट्टर मजहबियों के झुंड थे जो हिंदुओं को लूटकर, काटकर चले जाते थे। जब डर का माहौल ज्यादा बढ़ने लगा तो हमारे परिवार के बुजुर्गों ने जान बचाने के लिए हिंदुस्थान की ओर बढ़ना शुरू किया। हम सब रात-दिन भूखे-प्यासे रहते हुए, कहीं लंगर मिला तो पेट में कुछ डालते हुए कई दिन चलने के बाद अमृतसर, अंबाला होते हुए काशीपुर (उत्तराखंड) पहुंचे।
विभाजन – विभीषिका : दिल दहलाने वाला है हिंदू नरसंहार का वह भीषण मामला
शवों के साथ रहे
-बोधराज मदान,डेरा गाजीखान
India Pakistan Partition : भारत के बंटवारे के वक्त हमारे गांव कोटकसाने और उसके आसपास के मुसलमान हिंदुओं से कहते थे,‘‘अब यह इलाका सिर्फ मुसलमानों का हो गया है। तुम लोग जल्दी से यहां से चले जाओ।’’ भारत आने के दौरान भी हमारी गाड़ी पर हमले हुए। हमलों के बीच ही हमारी गाड़ी लाहौर पहुंची। गाड़ी लाहौर रेलवे स्टेशन पर तीन दिन और चार रात तक खड़ी रही।
गाड़ी में न तो खाना बचा था और न ही पानी। इसके बाद भी फौज वाले हम लोगों को बाहर नहीं निकलने दे रहे थे। कई लोगों की मौत तो भूख और दम घुटने से हो गई। लोग अपने रिश्तेदारों के शवों के साथ ही गाड़ी में पड़े रहे। बाहर मुसलमान इस बात पर अड़े थे कि किसी भी सूरत में गाड़ी को आगे नहीं दिया जाएगा। खैर, फौजियों ने समझा-बुझाकर मुसलमानों को मनाया और हमारी गाड़ी चली।
‘दंगाइयों ने लूटा हमारा घर’
-सुभाष मल्होत्रा, मुल्तान, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : उन दिनों मैं करीब पांच वर्ष का था। हर तरफ अफरातफरी मची थी। भयंकर फसाद होते थे। लूटमार होती थी। एक दिन पता चला कि हमारे घर को भी मुस्लिम लूटने की तैयारी कर रहे हैं। बता दें कि हमारा परिवार इलाके के संपन्न और रसूखदार परिवारों में था। तब हमारे कुछ वफादार मुस्लिम काश्तकारों ने ही कहा कि आप लोग भारत चले जाओ, हालात खराब हैं। तब हमारे परिवार में दादाजी, माताजी-पिताजी, मेरे बड़े भाई और एक छोटी बहन थी। हम लोग दिल्ली आ गए। शुरू में तो खाने की बड़ी तंगी थी, लेकिन धीरे-धीरे पिताजी ने नौकरी करनी शुरू की,पैसे आने लगे तो हालात सुधरने लगे। खैर, मैंने पढ़ाई-लिखाई की। बाद में बड़ा हुआ तो 1962 में ‘नवभारत टाइम्स’ में नौकरी मिल गई। 1964 में मैं भारत प्रकाशन दिल्ली लि. से जुड़ा और सेवानिवृत्त होने तक इसी में काम किया।
‘जान की भीख मांगते रहे’
-इंद्रसेन ढींगरा,मरदान, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : हमारा पूरा परिवार विभाजन के बाद अक्तूबर, 1947 तक पाकिस्तान में ही रहा। इलाके के हालात ऐसे थे कि रात होने के बाद यही लगता था कि सुबह तक कोई जिंदा बचेगा या नहीं। मेरे इलाके में सबसे ज्यादा सिखों के साथ ज्यादती हुई। हुआ यह था कि मास्टर तारा सिंह ने लाहौर में जिहादियों को आड़े हाथों लेते हुए एक भाषण दिया था, इससे मुसलमान भड़क गए। हिंदू या सिख जहां मिलते उन्हें वहीं गोली मार दी जाती। इसी डर से हमारे इलाके के हिंदू और सिख सब कुछ छोड़-छाड़कर मरदान पहुंचे। हमें यहां दो महीने शिविर में रहना पड़ा। वहां से निकले तो जान बचाते हुए भारत आए। आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि आखिर हमारी क्या गलती थी? हम हिन्दू-सिखों को सिर्फ इसलिए मार कर भगाया गया कि हम इस्लाम को नहीं मानते थे।
मुस्लिम तरेरने लगे थे आंखें
-श्रीसंत पाल रावल, साहिवाल, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : उन दिनों आजादी का जोश था। हर तरफ मेरा रंग दे बसंती चोला…जैसे देशभक्ति के गीतों की धुन सुनाई देती थी। लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा। अब नारे आने लगे- ‘नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हू-अकबर’, ‘लेकर रहेंगे पाकिस्तान।’ तब मैं सात साल का था। मेरे पिताजी जमींदार थे। घर-परिवार बहुत समृद्ध था। अचानक घर के पास एक दिन मुनादी होती है कि देश बंट गया है, इसलिए हिन्दू पाकिस्तान से चले जाएं। यह मुनादी होते ही मेरे पड़ोसी मुसलमान, खेतों में काम करने वाले मजदूर जो कल तक हमारी आवभगत करते थे, उनकी नजरें ही बिल्कुल बदल गर्इं। अब इलाके में एक डर का माहौल बनने लगे लगा था। वही मुसलमान डरा रहे थे। जान का खतरा बन चुका था। मुसलमान समृद्ध परिवारों को निशाना बनाने लगे थे, क्योंकि जिहादियों को पता था कि इनके घरों से काफी माल-पैसा मिल सकता है।
विभाजन-विभीषिका : अखंड भारत से पाकिस्तान तक, विभाजन की दर्दनाक कहानी और उसके घाव
‘मकान में लगा दी आग’
-जितेंद्र कुमार मल्होत्रा,गुजरांवाला,पाकिस्तान
India Pakistan Partition : पाकिस्तान में हमारे पिताजी और दादाजी का बहुत बड़ा कारोबार हुआ करता था। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतने बड़े उद्योगपति घराने से संबंध रखने वाले इस परिवार को जान बचाने के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर भागना पड़ जाएगा। 1947 में विभाजन के समय हुए कत्लेआम, आगजनी और लूटपाट को मैंने अपनी आंखों से देखा है। हफीजाबाद में मकान आपस में सटे हुए थे। एक दिन मुसलमानों ने हमारे मकान के निचले हिस्से में आग लगा दी। परिवार के सभी लोग छत के रास्ते भाग कर दूसरे मकान में चले गए। वहां हम छत पर ही छिपे रहे। बाद में हालात और बिगड़ते चले गए। दंगे के माहौल में ही हम शिविर में चले गए, लेकिन दादाजी और पिताजी फैक्ट्री में ही छूट गए। उन्मादी मुसलमानों ने फैक्ट्री में लूटपाट की और दोनों को बंदी बना लिया। फिरौती देकर उन्हें छुड़ाया गया।
गोलियों की तड़तड़ाहट
-लक्ष्मी नारायण जग्गी, रावलपिंडी, पाकिस्तान
India Pakistan Partition : बंटवारे के समय मैं 13 साल का था। पिताजी बैंक में नौकरी करते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन एक दिन रावलपिंडी के बाजार में हिन्दू-मुसलमानों के बीच झगड़े शुरू हो गए। मुसलमान झुंड में आकर, तलवारें लेकर हमला कर रहे थे। खबरें आ रही थीं कि दंगा होने वाला है और ऐसा ही हुआ। बाजार में जहां भी हिन्दुओं की दुकानें थीं, उन्हें आग लगाई जाने लगी, हिन्दुओं के घरों को लूटा जाने लगा। यानी माहौल अराजक हो चुका था। मुझे याद है कि रात में मैंने छत पर जाकर देखा तो चारों तरफ शोर था। आग की लपटें थीं। धुंआ उठ रहा था। घर के पास एक गोशाला थी, वहां मुसलमानों ने आग लगा दी थी। चारों तरफ अल्लाह-हू-अकबर की आवाजें आ रही थीं। गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई दे रही थी। मेरे पड़ोसी को गोली मार दी गई थी। पिताजी हकीमी करते थे, सो वे उसकी चिकित्सा करने गए थे।

















