पाकिस्तान और अमेरिका अपने-अपने एजेंडे के साथ एक-दूसरे की सवारी कर रहे हैं। एक ओर है अमेरिका, जिसने दुनिया में जगह-जगह छद्म युद्ध के अखाड़े सजाए और उनमें ताल ठोकने के लिए पहलवान जुगाड़े। दूसरी ओर पाकिस्तान है, जिसने तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में सजाए गए ऐसे ही अखाड़े में पेंच लड़ाते हुए आतंकवाद नाम के शेर की सवारी के गुर सीखे। इनकी हालिया जुगलबंदी संकेत है कि एशिया के इस क्षेत्र में अशांति का एक नया दौर शुरू होने वाला है।
हाल की कुछ घटनाओं को समग्रता के साथ देखने की आवश्यकता है। एक, अमेरिका का बलूचिस्तान में हिंसक घटनाओं में शामिल बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और उसकी इकाई मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित करना। दो, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसीम मुनीर को ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका से मिला न्योता, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनका डिनर और दोनों का एक-दूसरे की तारीफ में कसीदे पढ़ना। तीन, मुनीर का दोबारा अमेरिका जाना और वहां भारत को धमकी देना कि अगर उसने सिंधु का पानी रोकने के लिए बांध बनाया तो उसे मिसाइल मारकर तोड़ दिया जाएगा। साथ ही आगाह करना कि अगर पाकिस्तान को मजबूर किया गया तो परमाणु हथियार चल जाएगा और आधी दुनिया तबाह हो जाएगी। चार, बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज और बलूच लड़ाकों के एक-दूसरे पर किए गए हमलों की झड़ी। इन सबके अपने निहितार्थ हैं।
बीएलए पर कसा शिकंजा
यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका ने बीएलए को निशाने पर लिया है। 2019 में अमेरिका के वित्त विभाग ने बीएलए को स्पेशियली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट ग्रुप (एसडीजीटी) की सूची में डाला था। इसमें किसी संगठन को डालने का मतलब होता है-उसे मिलने वाली आर्थिक मदद को मुश्किल बनाना। लेकिन हाल ही में अमेरिका के विदेश विभाग ने बीएलए और इसकी इकाई मजीद ब्रिगेड को विदेशी आतंकवादी संगठन के तौर पर घोषित किया है। इसका असर यह होगा कि अमेरिका में बीएलए की जितनी भी संपत्तियां, बैंक खाते हैं, उन्हें जब्त कर लिया जाएगा। कोई भी अमेरिकी इन संगठनों के साथ वित्तीय लेनदेन नहीं कर सकेगा। बीएलए सदस्यों पर अमेरिका में आने पर रोक रहेगी और अमेरिका में इन्हें वित्तीय या किसी अन्य तरह की मदद नहीं दी जा सकेगी।
बीएलए का गठन 2000 के आसपास इसलिए किया गया कि कुछ बलूच क्रांतिकारियों का राजनीतिक संघर्ष से मोहभंग हो गया और उन्हें लगा कि जब तक पाकिस्तानी फौज की हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दिया जाएगा, तब तक कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। बीएलए ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, सरकारी अधिकारियों, सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर) की निर्माणाधीन परियोजनाओं और वहां काम कर रहे चीनियों को निशाना बनाने के लिए हिंसक छापामार युद्ध छेड़ रखा है। ग्वादर में हुए हमलों, कराची एयरपोर्ट पर हुए विस्फोट से लेकर हाल ही में जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को अगवा करके उसमें सवार सैकड़ों सैनिकों को मारने के पीछे बीएलए का हाथ रहा है। आएदिन यह संगठन पाकिस्तानी सैनिकों पर दुस्साहसी हमले करने के लिए सुर्खियों में रहता है। हर हमले के बाद उसका ब्योरा जारी करना, दोनों ओर के हताहतों की जानकारी देना और हमले की जिम्मेदारी लेना संगठन की विशिष्ट शैली रही है।
आतंकवाद बनाम स्वतंत्रता संग्राम
बलोच नेशनल मूवमेंट (बीएलएम) के सूचना सचिव काजीदाद मोहम्मद रेहान कहते हैं, “ अमेरिका की कार्रवाई का बीएलए पर शर्तिया असर पड़ेगा। बेशक हालात मुश्किल होंगे, लेकिन बलूचों का संघर्ष जारी रहेगा। अमेरिका बलूचों के एक संगठन को इसलिए आतंकवादी करार देता है, क्योंकि वह सशस्त्र संघर्ष के रास्ते पर चल रहा है। लेकिन अमेरिका सहित पूरी दुनिया को विचार करना होगा कि आतंकवाद और स्वतंत्रता संग्राम में क्या अंतर है।” बलूचिस्तान में एक और संगठन है बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ)। यह संगठन भी पाकिस्तान के खिलाफ छापामार युद्ध कर रहा है। इसके नेता डॉ. अल्लाह नजर बलोच ने कहा कि ‘‘अगर बलूचों को आतंकवादी घोषित किया जा सकता है तो सशस्त्र आंदोलन करके अमेरिका को आजादी दिलाने वाले जॉर्ज वॉशिंगटन को क्यों नहीं? आखिर वाशिंगटन ने भी तो यही रास्ता अख्तियार किया था। दुनिया को बलोचों के साथ दोहरा रुख नहीं अपनाना चाहिए।”
बीएलएम के वरिष्ठ संयुक्त सचिव कमाल बलोच कहते हैं, “पाकिस्तान के जन्म लेने के पहले ही 11 अगस्त, 1947 को बलूचिस्तान एक आजाद मुल्क घोषित हो चुका था। 1948 में उसी मोहम्मद अली जिन्ना ने बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा कर लिया, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने आजाद बलूचिस्तान की पैरोकारी की थी और उनकी सेवाओं के बदले कलात के खान ने हीरे-जवाहरात से उनकी झोली भर दी थी। इसलिए बलूच जो संघर्ष कर रहे हैं, बेशक उनमें सशस्त्र संघर्ष भी हो, वह एक ऐसे मुल्क की जद्दोजहद है जो अपनी छीन ली गई आजादी वापस पाने के लिए 1948 से ही संघर्ष कर रहा है।
दहशतगर्द बलूच नहीं, पाकिस्तान है जिसने दहशतगर्दी को सियासी नतीजे हासिल करने के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया है। जरा बताइए, अलकायदा को किसने खड़ा किया? कौन इसका जरिया बना? फिर जब वह बलेगाम हो गया और उसने पलटकर अमेरिका को ही निशाना बना दिया और अमेरिका उसके नेता ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए खाक छानता रहा, किसने उसे बरसों छिपाए रखा? कुछ नहीं, यह सहूलियत की जुगलबंदी है। दोनों को एक-दूसरे का हाथ थामकर चलने में अपने-अपने हित सधते दिख रहे हैं।”

पाकिस्तान के हित
मजहब के आधार पर जन्म लेने वाले पाकिस्तान में पीढ़ियों से जो भारत विरोधी, ‘काफिर’ विरोधी घुट्टी पिलाई गई, उसके नशे में लोगों को रखना इस्लामाबाद और वहां की सत्ता को पीछे से चलाने वाली फौज को भाता है। पाकिस्तान और अमेरिका की सेना के बीच तालमेल लगातार रहा है, लेकिन हाल के समय में वह झीनी-सी चादर भी उड़ गई जो राजनीतिक सत्ता के हाथ कमान होने का आभास देती थी। ट्रंप को जब पाकिस्तान में शीर्ष स्तर पर बात करनी पड़ी, तो उन्होंने असीम मुनीर को बुलावा भेजा। वह कथित लोकतांत्रिक सरकार के मुखिया से बात करने की औपचारिकता को ताक पर रख देते हैं। खैर, दोबारा अमेरिका की ‘गुड बुक’ में आने से पाकिस्तान की कई मुश्किलें दूर हो रही हैं। उसे उन्हीं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से पैसे मिलने लगे हैं जो हाल के वर्षों में पाकिस्तान पर लगातार शर्मनाक शर्तें थोपती जा रही थीं।
भारत को लेकर पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता यही है कि आज का भारत पहले ‘डोज’ दे देता है, डोजियर बाद में भेजता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तीन दिन के भीतर भारत ने पाकिस्तान के घुटने तोड़कर रख दिए, जिसके बाद उसे मजबूरन संघर्षविराम का प्रस्ताव देना पड़ा। पाकिस्तान के लिए भारत के साथ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने में अमेरिका के साथ उसके रिश्ते रणनीतिक कारक के रूप में काम करते हैं। वैसे, अमेरिका के साथ पाकिस्तान के साथ रिश्ते हमेशा अच्छे रहे, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ कथित लड़ाई में तो वह भागीदार रहा ही, उसके पहले भी वह अमेरिका के काम आता रहा। 1990 में कुवैत युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान ने सऊदी अरब में पांच हजार सैनिक भेजे थे।
इसके अलावा, पाकिस्तान का यह भ्रम भी टूट गया कि भारत उसके खिलाफ कोई भी बड़ी कार्रवाई करने से इसलिए हिचकेगा कि कहीं उसका ‘सदाबहार दोस्त’ चीन दूसरी ओर से धावा न बोल दे। लिहाजा, पाकिस्तान के लिए अमेरिका के साथ रिश्तों में आई गर्मजोशी उसके कूटनीतिक नजरिये से बड़ी सफलता है।

अमेरिकी हित
1950 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को मध्य-पूर्व के लिए प्रवेश द्वार माना था और इसी को ध्यान में रखते हुए वाशिंगटन ने इस्लामाबाद के साथ रक्षा समझौते किए। 1954 में अमेरिका ने पाकिस्तान को साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (सिएटो) और सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (सेंटो) का सदस्य बनवाया ताकि सोवियत संघ के प्रभाव को रोका जा सके। इन संगठनों का सदस्य बनने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी मात्रा में सैन्य मदद देकर मजबूत किया। इनके सदस्य के रूप में पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए भी प्रतिबद्धता जताई, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे ये संगठन कमजोर होते चले गए और फिर कागजों में ही सिमटकर रह गए। लेकिन दोनों देशों के बीच रणनीतिक रिश्ते बने रहे।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ से एक बात अच्छी तरह साफ हो गई कि पाकिस्तान में कई सैन्य ठिकाने ऐसे हैं जो काफी हद तक अमेरिकी नियंत्रण में हैं। इसका मतलब, इस पूरे क्षेत्र में अमेरिकी रणनीति के नजरिये से पाकिस्तान का स्थान महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, अमेरिका के हालिया झुकाव के पीछे जो सबसे बड़ा कारक है, वह है राष्ट्रपति ट्रंप की व्यक्तिगत दिलचस्पी। मुनीर ने ट्रंप को जो सपने दिखाए हैं, उन्हें देखते हुए ट्रंप प्रशासन गंभीर दिख रहा है। पाकिस्तान ने ट्रंप को बलूचिस्तान के तेल और दुर्लभ खनिज पदार्थों का लालच दिया है।
ट्रंप इससे इतने खुश हैं कि वह पाकिस्तान के लिए बिछे जा रहे हैं। लेकिन क्या अमेरिका के लिए बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर पाना इतना ही आसान होगा, जहां चीन 65 अरब डॉलर खर्च करने के बाद भी अपने पैर जमा नहीं पा रहा है? काजीदाद रेहान कहते हैं- “हमें भी ऐसा ही लग रहा है कि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर अमेरिका से कुछ वादा किया है, लेकिन इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं होनी चाहिए कि ये प्राकृतिक संसाधन बलूचों के हैं और हम किसी को भी इसकी लूट मचाने नहीं देंगे। यहां के संसाधनों के बारे में फैसला करने का अधिकार केवल और केवल बलूचों का है।
हम आजाद हो जाएं तब कोई भी और मुल्क अगर यहां खनिज निकालना चाहेगा तो इस बारे में बातचीत हो सकती है, उसके साथ करार किया जा सकता है।” यानी कहा जा सकता है कि अगर भविष्य में अमेरिका बलूचिस्तान के किसी इलाके में खनिज निकालने पहुंचता भी है तो उसे भी वैसे ही प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा, जैसा चीन को करना पड़ रहा है। बेशक ट्रंप आज पाकिस्तान के ‘ऑफर’ से बल्लियों उछल रहे हों, लेकिन कल भी क्या वह अमेरिकियों को ऐसे खतरनाक माहौल में भेजने पर अड़े रहेंगे, यह देखने की बात होगी।
जो भी हो, चाहे ईरान की मुश्कें कसनी हों या इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाना हो, अमेरिका के लिए कूटनीति की चौसर पर पाकिस्तान की एक वैकल्पिक मोहरे के रूप में उपयोगिता है, इसमें फिलहाल तो कोई संदेह नहीं दिखता।
ताबड़तोड़ हमले
बलूचिस्तान के लिए अगस्त का उत्तरार्द्ध मिश्रित भावनाओं वाला होता है। 11 अगस्त का दिन उसे सालता है, क्योंकि इसी दिन आजाद होने के बाद भी वह आजाद नहीं रह सका और 14 अगस्त का दिन उसे उद्वेलित कर जाता है, क्योंकि 1947 में इसी दिन पाकिस्तान के रूप में एक ऐसा मुल्क अस्तित्व में आया, जिसने एक साल बाद ही बलूचों की आजादी को फौजी बूटों के तले रौंद डाला। इसलिए आम तौर पर हर साल इस दौरान बलूचों के हमले बढ़ जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। बलूच लड़ाकों ने पूरे बलूचिस्तान में कई जगहों पर फौज को निशाना बनाया। वहीं, पाकिस्तानी सेना ने भी ऑपरेशन चलाकर बड़ी संख्या में बलूचों को मारने का दावा किया। खैर, बलूचिस्तान में हिंसा का दौर लगातार जारी है- कभी इसकी रफ्तार कम हो जाती है, तो कभी तेज। लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा।
बीएनएम के अध्यक्ष नसीम बलोच ने 11 अगस्त को बयान जारी कर कहा, “पाकिस्तान के कब्जे से पहले हम एक आजाद मुल्क थे। 27 मार्च, 1948 को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा किया। तब से अब तक हजारों बलूच अपने मुल्क को आजाद कराने के लिए शहीद हो चुके हैं, हजारों लोग पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं और अमानवीय यातनाएं झेल रहे हैं। लेकिन आजादी के परवाने बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का यह कब्जा खत्म करके रहेंगे।”

मुनीर की गीदड़ भभकी
अमेरिका की धरती से मुनीर ने जिस तरह भारत को धमकी दी, उस पर भारत ने बड़ी ही संतुलित प्रतिक्रिया दी। भारत ने बयान को गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए कहा कि परमाणु हथियारों की धमकी देना पाकिस्तान की पुरानी आदत है, लेकिन भारत इसके आगे नहीं झुकेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जो भी जरूरी कदम होगा, उसे उठाने से पीछे नहीं हटेगा। इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने यह कहते हुए अमेरिका को आड़े हाथों भी लिया कि “अफसोस की बात है कि ये टिप्पणियां एक मित्र देश (अमेरिका) की धरती से की गईं।”
पाकिस्तान के पूर्व रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के शब्दों में, अमेरिका के लिए पाकिस्तान ‘गंदे काम’ को अंजाम देता रहा है तो जाहिर है, वह रणनीति आज भी कायम है, लेकिन इसकी कीमत दक्षिण एशिया की शांति को चुकानी पड़ सकती है। पहले अपने कूटनीतिक-रणनीतिक हितों को पूरा करने के लिए सशस्त्र गुटों को खड़ा करना और जब यही गुट बेलगाम हो जाएं और पलटकर अमेरिकी हितों और अमेरिकियों को ही निशाना बनाने लगें, तो उनके खिलाफ ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग’ छेड़ना अमेरिका की आदत हो गई है। अपने ऐसे हर प्रयोग में हाथ जलाने के बाद भी अमेरिकी नीतियां नहीं बदलीं, बेशक इसके कारण दुनिया पर आतंकवाद का शिकंजा कसता चला जाए। एक बार फिर अमेरिका ऐसी ही आग से खेल रहा है जिसके नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
कमाल बलोच कहते हैं, “एक बात लिख लीजिए, दुनिया में तब तक अमन नहीं हो सकता जब तक पाकिस्तान और उसके दहशतगर्द नेटवर्क को तोड़ा न जाए। अमेरिका ने तो दहशतगर्दी पर पाकिस्तान की दोधारी नीतियों का दर्द झेला है, अपने लोगों को मरते देखा है। अगर फिर भी वह पाकिस्तान को गले लगाना चाहता है तो उसकी इच्छा। लेकिन इसकी कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ेगी।”
















