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होम भारत उत्तराखंड

उत्तराखंड त्रासदी :  प्रकृति का शोषण और बेजुबान पहाड़ों की पुकार

15 बरस पहले वे मैदान के बाजार से उठकर पहाड़ के बाजार की खोज में गए थे। वे बस यात्रा कर पहाड़ पर पहुंच गए । उनकी आंतरिक यात्रा अपरिवर्तित थी। आज ऐसे अगणित लोग हिमालय को रौंद रहे हैं। उसके पांव कांप रहे हैं। बादल फटे, पहाड़ टूटे, भूकंप आए, पर मस्ती नहीं रुकनी चाहिए।

Written byदेवांशु झादेवांशु झा
Aug 19, 2025, 08:59 pm IST
inउत्तराखंड, सोशल मीडिया
उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही

उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही

घर के पास एक छोटा-सा रेस्तरां है। वहां चला जाया करता हूं। उसके यहां हाथ धोने का एक सिंक है। नल टपकता रहता है। मैंने कई बार ध्यान दिलाया पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। मैं हाथ धोते हुए आगे-पीछे कर उसे बंद कर देता हूं। मेरा अनुभव है। उसका एक वाशर ढीला है। उसे बदल दिया जाए तो नल ठीक हो जाएगा। सौ-पचास रुपये का खर्च है। रेस्तरां वाले के लिए टपकता नल अर्थहीन है।

हर दिन हजारों लीटर पानी वहां से बह रहा है। बह रहा है तो बह रहा, क्या करें? वहां आने वाले हर उपभोक्ता के लिए भी टपकता हुआ नल बेमानी है। वह हाथ धोता है, खा- पीकर चला जाता है। रेस्तरां के चलने और बंद हो जाने के बाद तक वह नल बहता रहता है। अगली सुबह खुलने पर भी वह बहता हुआ मिलता होगा। पर…वह ठीक नहीं होता क्योंकि पानी दे रहा है। जैसे कचरा खाने वाली गायें दिन भर मुंह मारने के बाद दूध देती हैं। उन्हें दुहा जाता है। नल को निचोड़ा जा रहा है। दरअसल धरती की छाती खींची जा रही है।

आज भारतीय समाज में ऐसे लाखों-करोड़ों नल बह रहे हैं। प्रतीकात्मक अर्थ में समझिए। पहाड़ के पांव से लेकर सिर तक रिसाॅर्ट हैं। होटल ही होटल। भीड़ ही भीड़। यात्री ही यात्री। हिमालय के सीने पर धुर्मुस चल रहा है। फिर ‘तुणकतुणकतुण ताताता’ भी होना है। दो दिन की छुट्टी हुई नहीं कि गाड़ी जा पहुंची हिमालय।

सेल्फी-फोटो दारू-डांस। चप्पे-चप्पे पर घर। चप्पे-चप्पे पर कोठियां, होटल, रिसार्ट, भीड़। बादल फटा तो विप्लव आया। सबकुछ बहा ले गया। वह पहाड़ी गांव जैसा तो नहीं दिखाई देता था। बड़े-बड़े घर थे। बड़े-बड़े लोग वहां पहुंच गए होंगे। हिमालय पर रिसाॅर्ट बनवा लेते हैं जी!

रेस्तरां का टपकता हुआ नल एक दिन थम जाएगा। फिर उससे हवा झरेगी। एक विशुद्ध मूर्ख समाज, जिसकी समझ-बूझ, संवेदना मर चुकी है, वह आपदाओं को दावत देता है। मुझे पहाड़ बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने पहाड़ों पर जाने की प्यास बुझा ली है। मैं विंध्याचल और अरावली की छोटी पर्वतमालाओं से संतुष्ट हूं। इसलिए नहीं कि महान त्यागी हूं, इसलिए कि हिमालय की छाती पहले से विदीर्ण है, उसे और कष्ट देना ठीक नहीं।

आज दिल्ली का एक आटो वाला डीएनडी पर यमुना में किसी को बोतल फेंकते हुए देखकर दुखी हुआ था। उसने मुझ से साझा किया। मैं उस छोटे मनुष्य की बड़ी भावना को समझ रहा था लेकिन इस देश की हवाई हुई भीड़ को कौन समझा सकता है? वह तो सबकुछ त्याग देने पर उतारू है! बरसों पहले पत्नी और बच्चों के साथ शिमला गया था।

लगभग पंद्रह बरस पहले मैंने भीड़ का पागलपन देख लिया था। वे पहाड़ पर किसी शांति की खोज में नहीं गए थे। वे मैदान के बाजार से उठकर पहाड़ के बाजार की खोज में गए थे। वे बस यात्रा कर पहाड़ पर पहुंच गए थे। उनकी आंतरिक यात्रा अपरिवर्तित थी। ऐसे अगणित लोग हिमालय को रौंद रहे हैं। हिमालय के पांव कांप रहे हैं। बादल फटे, पहाड़ टूटे, भूकंप आए, पर मस्ती नहीं रुकनी चाहिए। तुणकतुणकतुण ताताता।

Topics: अंधाधुंध पर्यटनमानवीय लापरवाहप्रकृति का शोषणदेवांशु झापाञ्चजन्य विशेषप्राकृतिक आपदाएंपर्यावरण संकट
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