हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मुद्दे पर साफ-साफ अपना पक्ष रखा है। यह मुद्दा राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों, उनके विवेक और उन पर न्यायपालिका की भूमिका से जुड़ा है। केंद्र का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट यह तय नहीं कर सकता कि राष्ट्रपति कब और किन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लें।
क्या है मामला- कुछ राज्य विधेयकों को लेकर विवाद था। कई बार राज्यपाल राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेज देते हैं। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की एक पिछली पीठ (8 अप्रैल 2024 की) ने यह राय दी थी कि अगर कोई विधेयक संविधान के खिलाफ हो, तो राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेनी चाहिए। यह सलाह संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत दी गई थी। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है।
केंद्र का तर्क क्या है- केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राष्ट्रपति को यह बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह हर बार सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लें। सलाह लेना पूरी तरह से राष्ट्रपति का व्यक्तिगत विवेक है, और यह निर्णय केवल वही कर सकते हैं कि कब सलाह ली जाए। संविधान का अनुच्छेद 143 यह अधिकार केवल राष्ट्रपति को देता है कि वह अदालत से सलाह लें या न लें।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में एक लिखित नोट दाखिल किया, जिसमें तीन प्रमुख बिंदु उठाए गए- न्यायपालिका राष्ट्रपति को बाध्य नहीं कर सकती- नोट में कहा गया कि अगर अदालतें यह तय करें कि राष्ट्रपति को कब और कैसे सलाह लेनी है, तो यह संविधान में न्यायपालिका को न दी गई शक्तियों का इस्तेमाल होगा। इससे संविधान में असंतुलन और “संवैधानिक अव्यवस्था” पैदा हो सकती है।
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समय-सीमा तय करना संविधान का उल्लंघन होगा- राज्य विधेयकों पर राज्यपाल या राष्ट्रपति को फैसला लेने की कोई तय समय-सीमा संविधान में नहीं दी गई है। केंद्र ने कहा कि जब संविधान को समय-सीमा तय करनी होती है, तो वह स्पष्ट रूप से ऐसा करता है (जैसे कुछ अन्य अनुच्छेदों में)। लेकिन अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर ऐसा कोई समय निर्धारण नहीं किया गया है। अगर कोर्ट ऐसा नियम बनाए तो यह एक तरह का “संवैधानिक संशोधन” होगा, जो न्यायपालिका का कार्य नहीं है। कुछ शक्तियाँ पूरी तरह कार्यपालिका के अधीन होती हैं- केंद्र सरकार का कहना है कि हमारे लोकतंत्र में तीनों अंगों- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन होना चाहिए। लेकिन कुछ अधिकार ऐसे होते हैं जो विशेष रूप से केवल एक अंग के लिए होते हैं। राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे पदों की कुछ शक्तियाँ इसी तरह की होती हैं, जिनमें न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। केंद्र का यह भी कहना है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल “राजनीतिक रूप से पूर्ण” पद होते हैं, जो लोकतंत्र के सर्वोच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर इनसे जुड़ी कोई चूक होती है, तो उसका हल राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से ही होना चाहिए। जैसे चुनाव, विधायी समीक्षा, कार्यपालिका की जवाबदेही या आपसी सलाह-मशविरा न कि न्यायिक हस्तक्षेप के जरिए।
कोर्ट की पिछली राय पर आपत्ति- सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि अगर राज्यपाल किसी विधेयक को इस आधार पर रोकते हैं कि वह असंवैधानिक है, तो राष्ट्रपति को उसे सर्वोच्च न्यायालय के पास सलाह के लिए भेजना चाहिए। कोर्ट का मानना था कि संविधान और कानून की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है। लेकिन केंद्र ने इस राय को खारिज करते हुए कहा कि ‘परामर्श’ का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति ऐसा करने को बाध्य हैं। सलाह लेना या न लेना, राष्ट्रपति का विशेष अधिकार है।
















