3 जून की घोषणा-सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी
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विभाजन – विभीषिका : 3 जून की घोषणा-सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी

भारत के विभाजन के इतिहास में 3 जून, 1947 का दिन महत्वपूर्ण है। इसी दिन कांग्रेस ने विभाजन को मंजूरी दी। यह निर्णय न केवल राजनीतिक था, बल्कि इसने इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक को जन्म दिया। इसने विभाजन रोकने के संघ के प्रयासों पर भी पानी फेर दिया

Written byकृष्णानंद सागरकृष्णानंद सागर
Aug 14, 2025, 04:51 pm IST
in भारत, विश्लेषण

India Pakistan Partition : लाहौर पंजाब की राजधानी था। वहां सेना थी, पुलिस थी। इसके बावजूद वह मुस्लिम तत्वों को छुरेबाजी से मुक्त नहीं था। 1946 में इसमें और वृद्धि हुई तथा प्रति सप्ताह छुरेबाजी की औसतन 5-6 घटनाएं होने लगीं। मार्च 1947 के आरंभ से तो हिंदुओं पर जगह-जगह योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण होने लगे। 4 मार्च, 1947 को लाहौर में हिंदू छात्रों के जुलूस पर मुसलमानों ने आक्रमण किया। 4 मार्च को ही मुल्तान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर पर आक्रमण हुआ, जिसका प्रतिकार करते हुए वहां के विभाग प्रचारक लेखराज शर्मा बुरी तरह से घायल हुए। 5 मार्च को पंजाब के अनेक स्थानों पर एक साथ आक्रमण हुए, जिनमें सर्वाधिक भीषण स्थिति रावलपिंडी में हुई। 9 मार्च को उनका सीधा निशाना अमृतसर का दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर) था। सरकार की ओर से जिहादियों पर नियंत्रण का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा था। उल्टे सरकार उन्हें प्रोत्साहन व प्रश्रय ही दे रही थी। पुलिस में 75 प्रतिशत मुसलमान ही थे।

कृष्णानन्द सागर
वरिष्ठ लेखक एवं इतिहासकार

लाहौर में मोजंग एक मुस्लिम क्षेत्र था। वहां के 400-500 सशस्त्र मुसलमान अप्रैल 1947 में सामने के ही हिंदू क्षेत्र बीडन रोड की तरफ बढ़ने लगे। इतने अधिक लोगों का मुकाबला करना संभव नहीं था। अत: युक्ति से काम लिया गया। पंजाब नेशनल बैंक के महाप्रबंधक राम प्रकाश चोपड़ा का घर भी वहीं था। उन्हें बैंक की ओर से एक सुरक्षाकर्मी मिला हुआ था। उसे अपनी राइफल से 3-4 फायर करने के लिए कहा गया। उसने फायरिंग कर दी। गोलियों की आवाज सुन हमलावर भाग गए। इसके बाद पुलिस आ गई। पुलिस ने मोजंग के मुसलमानों को पकड़ने या उनकी तलाशी लेने की बजाए बीडन रोड के हिंदू घरों की ही तलाशी लेनी शुरू कर दी।

प्रतिरोध का फार्मूला

ऐसी स्थिति में अप्रैल 1947 के अंत में लाहौर के कुछ संघ कार्यकर्ताओं ने विचार किया कि अभी तक सभी जगह आक्रमणों की पहल मुसलमान ही करते आ रहे हैं और हिंदू केवल बचाव ही करते हैं। इससे मुसलमानों का मानस यह बन गया है कि ‘‘हिंदू कायर है, दब्बू है। उसे और दबाओ, मारो और लूटो। इससे या तो वह अपना घर-बार छोड़कर भाग जाएगा या मुसलमान बन जाएगा। दोनों ही परिस्थितियों में मुस्लिम जनसंख्या काफी बढ़ जाएगी और यह ‘दीन’ की बड़ी सेवा होगी। इससे पाकिस्तान बनना भी आसान हो जाएगा।’’ संघ कार्यकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि मुसलमानों के इस मानस पर चोट करने की आवश्यकता है। उन्हें ऐसा संदेश दिया जाए, जिससे वे समझ जाएं कि ‘हिंदू कायर नहीं है।’ फिर वे किसी भी हिंदू पर हाथ उठाने से पहले दस बार सोचेंगे।

विभाजन – विभीषिका : ‘जमीन मिली, मगर दिल वहीं छूट गया’

उन्होंने तय किया कि ऐसा संदेश लाहौर से ही दिया जाए, ताकि उसका असर सारे पंजाब के मुसलमानों पर हो और पंजाब के माध्यम से सारे देश में यह संदेश जाए। ‘मुस्लिम होमलैंड’ (पाकिस्तान) का वैचारिक जन्म 1930 में लाहौर से ही हुआ था, इसलिए उन्हें वहीं से मुंहतोड़ जवाब मिलना चाहिए। यह भी तय किया गया कि यह संदेश ‘वाणी’ या ‘स्टेटमेंट’ से नहीं, अपितु प्रत्यक्ष कृति से हो। अभी तक पहल मुसलमान ही करते आ रहे हैं, अब पहल हम करेंगे। राजगढ़ लाहौर की बहुत बड़ी मुस्लिम बस्ती थी। संघ कार्यकर्ताओं की बैठक के 3-4 दिन बाद ही राजगढ़ ईदगाह में जुमे की नमाज पर वहां के इमाम ने भाषण में कहा, ‘‘हमने पाकिस्तान बनाना है। उसे संभालना है। इसलिए हिंदुओं से लड़ो नहीं, उनकी लड़कियों को उठाओ, उनके मकान जलाओ, उन्हें भगाओ, उनकी दौलत लूट लो। उनकी लड़कियों से हमारा इस्लाम बढ़ेगा।’’ संघ कार्यकर्ता निर्णय तो कर ही चुके थे। बस यही सोचना बाकी था कि शुरुआत कहां से की जाए। इमाम के भाषण ने वह भी तय करवा दिया। तय हुआ, इमाम के प्यादे कुछ करें, उससे पहले ही राजगढ़ को भस्म कर दिया जाए।

राजगढ़ जल उठा

मई महीने की एक अर्धरात्रि, जब राजगढ़ बस्ती के लोग गहरी नींद में थे, दो जीप आगे-पीछे निकलीं। अगली जीप थोड़े-थोड़े अंतर पर रुकती और उसमें बैठे लोग पेट्रोल में भीगी रुई सामने के मकानों पर फेंकते जाते और जीप आगे बढ़ जाती। पीछे वाली जीप पर सवार लोग आग के पलीते व बल्ब बम उन घरों पर फेंकते जा रहे थे। थोड़ी देर में मकान धू-धू कर जल उठे। ये सारे मकान बस्ती के एक ओर थे। लोग बचने के लिए बस्ती के दूसरी ओर भागे। तभी दूसरी ओर से बम धमाके शुरू हो गए। फलत: लोग दोनों तरफ से आग की ऊंची-ऊंची लपटों के बीच फंस गए। यह सारा काम 15-20 मिनट में हुआ।

इस घटना से मुसलमान घबरा गए। उन्होंने तो स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि हिंदू भी कभी आक्रमण कर सकते हैं, वह भी छोटी-मोटी बस्ती पर नहीं, राजगढ़ जैसी बड़ी मुस्लिम बस्ती पर, जहां मुसलमानों के पास काफी हथियार थे। बड़ी-बड़ी धमकियां देने वाले मुस्लिम नेता भी सोच में पड़ गए कि यह क्या हो गया? यह सीधा संदेश था मुस्लिम नेतृत्व को भी कि अगर मुसलमानों को भड़काओगे तो मुसलमान भी उसी हिंसा की अग्नि में भस्म हो जाएंगे और तुम भी नहीं बच पाओगे। इस घटना से सारे पंजाब के मुसलमानों में भय उत्पन्न हो गया। चंगेज खां और हलाकू की क्रूरताओं से भी बढ़ कर क्रूरता की धमकी देने वाले नेताओं की बोलती बंद हो गई। सब उत्पाती चूहे अपने बिलों में घुस कर बैठ गए।

मुस्लिम नेताओं का पुनर्चिंतन

पूरे पंजाब में इसका सुपरिणाम देखने को मिला। मई का शेष महीना कुछ शांति से बीता। मुस्लिम नेता अब धमकियां देने की बजाए आत्म-निरीक्षण में लग गए। लाहौर में कई हजार मुस्लिम नेशनल गार्ड (मुस्लिम लीग का सशस्त्र संगठन) थे। इसके बावजूद न नेता कुछ कर पाए, न सशस्त्र गार्ड। मुसलमान सैकड़ों मारे गए, हिंदू एक भी नहीं-इस तथ्य ने मुस्लिम नेताओं को अपनी हरकतों पर पुनर्विचार करने को बाध्य कर दिया। संघ कार्यकर्ताओं की योजना ऐसी कुछ घटनाएं अन्य स्थानों पर भी करने की थी, ताकि मुस्लिम लीग अखिल भारतीय स्तर पर अपनी नीति पर पुनर्विचार करने को बाध्य हो जाए। जैसे ही उसकी समझ में यह बात आ जाएगी कि ‘हिंदू विनाश’ का अर्थ ‘मुस्लिम विनाश’ भी है, उसी समय वह अलग से ‘पाकिस्तान’ की मांग भी छोड़ देगी। फलत: दंगे, झगड़े और हत्याकांड स्वत: बंद हो जाएंगे। हिंदू और मुसलमान दोनों सुरक्षित रहेंगे तथा भारत भी अखंड बना रहेगा। इस फार्मूले से लाखों मुसलमानों की जीवन रक्षा भी होती।

विभाजन-विभीषिका : अखंड भारत से पाकिस्तान तक, विभाजन की दर्दनाक कहानी और उसके घाव

… और सब कुछ बदल गया

कांग्रेस की स्थिति उन दिनों कुछ और ही थी। वह ‘मुस्लिम हिंसा-वृत्ति’ से भयभीत नेताओं का एक टोला मात्र बन चुकी थी। उसके नेता न तो मुस्लिम धमकियों का समुचित उत्तर देने में सक्षम थे और न ही उनके द्वारा की जा रही हिंसा को रोकने के लिए पुलिस व सेना को आदेश देने की हिम्मत कर पा रहे थे। अत: वे चुपचाप अंदर ही अंदर भारत का विभाजन करने के लिए तैयार हो गए। मई 1947 में जब संघ ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ की नीति के अनुसार मुसलमानों को सुधरने का सीधा संदेश दे रहा था, उस समय कांग्रेस नेता मुस्लिम लीग और अंग्रेज सरकार के साथ भारत विभाजन की वार्ताओं में लगे हुए थे। अंतत: 2 जून, 1947 को विभाजन के समझौते पर जवाहर लाल नेहरू आदि ने हस्ताक्षर कर दिए तथा 3 जून को रेडियो पर सार्वजनिक घोषणा की गई कि 15 अगस्त, 1947 को भारत के दो टुकड़े करके पाकिस्तान बना दिया जाएगा। ‘राजगढ़ कांड’ से मुसलमानों में जो भय का वातावरण बना था और उसके परिणामस्वरूप अगले दो-तीन सप्ताह तक हिंसा की घटनाओं में जो पर्याप्त कमी आई थी, 3 जून की घोषणा ने उस पर पानी फेर दिया।

पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा मुसलमानों की बहुत बड़ी जीत थी। अब वे स्वयं ‘मालिक’ बनने वाले थे, तो डरना क्यों? फलत: उनकी मनोवृत्ति अब आकाश को छूने लगी। 3 जून की घोषणा ने मुस्लिम प्रशासनिक अधिकारियों, मुस्लिम पुलिस अधिकारियों तथा मुस्लिम सैन्य अधिकारियों में भी जिहादी भावना को जाग्रत कर दिया। वे भी अपने सरकारी अधिकारों तथा शक्तियों का उपयोग हिंदुओं को दबाने में करने लगे। दूसरी तरफ, हिंदू अधिकारी सरकारी नियमों और अनुशासन के जंजाल में ही फंसे रहते थे। इस कारण वे आम हिंदुओं की कोई सहायता नहीं कर पाते थे। परिणामस्वरूप मुस्लिम हिंसाचार फिर से बढ़ने लगा और पंजाब से हिंदू पलायन शुरू हो गया। इस प्रकार, इस्लामी हिंसाचार रूपी ‘जिन्न’ को बोतल में बंद करने के संघ के प्रयास को भी कांग्रेस ने पलीता लगा दिया। उसे समझ ही नहीं आया कि वह क्या कर बैठी है।

विभाजन – विभीषिका : डर, अनिश्चितता पीछे छोड़ दिया

मुसलमानों को संजीवनी

‘3 जून की घोषणा’ कांग्रेस की दूषित सोच की चरम परिणति थी। राजगढ़ कांड से घबरा कर जब मुस्लिम मानस अपनी कार्यशैली के बारे में पुनर्चिंतन की मन:स्थिति में था, ऐसे समय अकस्मात् ‘पाकिस्तान निर्मिति’ की घोषणा ने मुसलमानों द्वारा किए गए अब तक के नरसंहारों पर एक तरह से ‘औचित्य की मोहर’ लगा दी। इससे मुसलमानों को संजीवनी मिल गई। चूंकि इस घोषणा में पाकिस्तान की सीमाएं नहीं तय की गई थीं, इसलिए प्रत्येक मुसलमान में यह लालसा जाग उठी कि उसका गांव या शहर भी ‘पाकिस्तान’ बन जाए। जिन क्षेत्रों के पाकिस्तान बन जाने की संभावना नहीं थी या बहुत कम थी, वहां के मुसलमान भी उन क्षेत्रों को ‘व्यावहारिक पाकिस्तान’ का रूप देने की जुगत में लग गए। ऐसे स्थानों के मुसलमान अपनी दबंगई से हिंदुओं को पहले से ही दबा कर रखने की कोशिश तो करते ही थे।

अब उन्होंने व्यापक विद्रोह कर अपने ग्राम-नगर से हिंदुओं को निष्कासित करने या उन्हें समाप्त कर देने के लिए शस्त्रास्त्र भी एकत्रित करने शुरू कर दिए। कुछ स्थानों के मुसलमान तो और ‘बुद्धिमान’ निकले। उन्होंने अपने-अपने स्थानों पर बड़े-बड़े गेट खड़े कर दिए और उन पर लिख दिया ‘पाकिस्तान गेट’। हरियाणा के करनाल और उत्तर प्रदेश के हापुड़ में बने ऐसे दो गेटों का वर्णन ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ पुस्तक के खंड एक के पृष्ठ 353-54 तथा खंड दो के पृष्ठ 159-60 पर है। ये दोनों ही गेट वहां के हिंदुओं ने तुरंत भूमिसात कर दिए थे।

पाकिस्तान बन जाने के तुरंत बाद शेष भारत के पूर्वी पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर आदि में भी जो भीषण रक्तपात हुआ, वह इन क्षेत्रों को ‘व्यावहारिक पाकिस्तान’ बनाने की वहां के मुसलमानों की इच्छा का ही दुष्परिणाम था। कुल मिलाकर ‘3 जून की घोषणा’ देश के लिए ‘हलाहल विष’ साबित हुई, जिसके परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। यदि कांग्रेस इस घोषणा में शामिल न होती तो संघ के ‘फलीभूत प्रयास’ आगे बढ़ते। परिणामस्वरूप कट्टर मुसलमानों की जिहादी मनोवृत्ति का शमन होता और विभाजन की मांग भी स्वत: समाप्त हो जाती।
लेखक की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘कांग्रेस और संघ : एक सिंहावलोकन’ का एक अंश

Topics: भारत पाक बंटवारे की कहानीमुस्लिम होमलैंडविभाजनकालीन भारत के साक्षी1947 की मानवीय त्रासदीविभाजन विभीषिकाकृष्णानन्द सागरVibhajan Vibhishika3 जून 1947 की घोषणापाञ्चजन्य विशेषPanchjanya SpecialTrue Stories of PartitionIndia Pakistan Partition StoriesHindus atrocities in Partition
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कृष्णानंद सागर
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