जमीन मिली, मगर दिल वहीं छूट गया
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विभाजन – विभीषिका : ‘जमीन मिली, मगर दिल वहीं छूट गया’

आज मैं 86 वर्ष की हूं। 1947 में जब देश का बंटवारा हो रहा था उस समय मेरी आयु 8—9 वर्ष थी। मेरा परिवार पाकिस्तान के लायलपुर जिले (अब फैसलाबाद) के बंगा गांव में रहता था

Written byप्रमोद कौशलप्रमोद कौशल
Aug 13, 2025, 06:23 pm IST
inभारत, विश्लेषण
जसवंत कौर, मूल स्थान — बंगा, लायलपुर

जसवंत कौर, मूल स्थान — बंगा, लायलपुर

India Pakistan Partition: आज मैं 86 वर्ष की हूं। 1947 में जब देश का बंटवारा हो रहा था उस समय मेरी आयु 8—9 वर्ष थी। मेरा परिवार पाकिस्तान के लायलपुर जिले (अब फैसलाबाद) के बंगा गांव में रहता था। हम लोगों के पास 100 एकड़ जमीन थी, हवेलियां थीं, घोड़े, पशु, गहने, नौकर–सब कुछ था, लेकिन एक दिन सब छिन गया। वह त्रासदी आज भी ताजा है। उन दिनों हमें पता चला कि नजदीकी गांवों में हिंदू-सिखों को मारा जा रहा है।

घरों में आग लगाई जा रही है। तभी परिवार ने फैसला किया कि पाकिस्तान छोड़कर भारत जाएंगे। हमने अपनी बैलगाड़ियां तैयार कीं और बस निकल पड़े। रास्ते भर काफिले पर हमले का डर, भूख-प्यास और असुरक्षा का माहौल था। परिवार ने अमृतसर पहुंचकर शरणार्थी शिविर में पनाह ली। वहां का हाल भी कम दयनीय नहीं था। न भोजन की गारंटी, न इलाज की सुविधा।

बच्चे रोते रहते थे, बुजुर्गों की तबीयत खराब हो जाती थी, लेकिन कोई किसी की क्या मदद करता, सब खुद ही उजड़े हुए थे। कई हफ्तों तक उसी हालात में रहने के बाद भारत सरकार ने पुनर्वास नीति के तहत मेरे परिवार को राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के रायसिंहनगर क्षेत्र में जमीन आावंटित की। वहीं से मेरे परिवार ने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की।

आज भले ही मेरा परिवार खुशहाल जीवन जी रहा है, लेकिन मेरा मन आज भी उस छूटी हुई जमीन, हवेली और विरासत में अटका है। मानो जमीन तो मिली, पर दिल वहीं छूट गया। लायलपुर में जो कुछ छोड़ा, वह कभी दोबारा नहीं मिला। हां, जिंदगी फिर से खड़ी की, लेकिन घाव अब भी हरे हैं।

हम बाबा नानक के दर के पास ही रहते थे। अब उनके दर्शनों के लिए भी वीजा लेना पड़ता है। कैसी विडंबना है ये! बंटवारे को लेकर दर्द अब भी वैसा ही है, जैसा 78 साल पहले था। वह सियासी फैसला सिर्फ नक्शे पर लकीर नहीं था, वह लाखों जिंदगियों की तबाही थी। पैसा तो दोबारा आ गया, लेकिन अगर कोई मारा जाता तो वह दोबारा नहीं आता।

वाहेगुरु का लाख-लाख शुक्र है कि हमारा पूरा परिवार बच गया। सियासत ने जो उजाड़ा, वह पीढ़ियों तक भरने वाला नहीं। आज हमारे बच्चे, पोते, और पड़पोते सब राजस्थान, पंजाब, विदेशों में बस गए हैं। लेकिन जब बात लायलपुर की आती है, तो आंखें भर आती हैं। अब कुछ नहीं चाहिए, बस हमारी पीढ़ियों को पता रहे कि क्या हुआ था, कैसे हुआ था, ताकि फिर कभी ऐसा न हो।’

विभाजन – विभीषिका : हमारे बीच ही हैं जिन्ना के पैरोकार

Topics: विभाजन विभीषिकाVibhajan Vibhishikaपाञ्चजन्य विशेषPanchjanya SpecialTrue Stories of PartitionIndia Pakistan Partition StoriesHindus atrocities in Partitionभारत पाक बंटवारे की कहानीजसवंत कौर
प्रमोद कौशल
प्रमोद कौशल
25+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ स्वतंत्र और टीम-आधारित काम में सक्षम। नेतृत्व, टीम विकास और प्रेरणा में सिद्ध कौशल। विशेषज्ञता: भारतीय व कनाडाई राजनीति। [Read more]
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