कम्युनिस्ट चीन की नई भारत विरोधी शरारत, ​जानिए, सिंक्यांग से तिब्बत तक बनने जा रहे नए रेल लिंक की असलियत
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कम्युनिस्ट चीन की नई भारत विरोधी शरारत, ​जानिए, सिंक्यांग से तिब्बत तक बनने जा रहे नए रेल लिंक की असलियत

विशेषज्ञों के अनुसार, यह रेल लिंक परियोजना चीन की "वेस्टर्न फ्रंटियर" रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित कर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Aug 12, 2025, 12:17 pm IST
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कम्युनिस्ट विस्तारवादी चीन सिंक्यांग से तिब्बत तक नया रेल लिंक बनाने की योजना पर आगे बढ़ चुका है। रिपोर्ट है कि यह रेल लिंक भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा को लगभग छूता हुआ गुजरेगा। इस दृष्टि से भारत के लिए यह एक सामरिक महत्व का विषय बन गया है। इसलिए भारत की सुरक्षा एजेंसियां इसे लेकर सतर्क हो चुकी हैं। क्या इस रेल लिंक के माध्यम से चीन का उद्देश्य भारत के लिए कोई सामरिक खतरा पैदा करना है? क्या चीन इस रेल मार्ग से सैनिकों की आवाजाही सुगम बनाने की मंशा रखता है? ऐसे कई सवाल विशेषज्ञों के दिमाग में घुमड़ रहे हैं।

यह रेल लिंक सिंक्यांग के होटन शहर से तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक जाएगा। चीन का लक्ष्य साल 2035 तक ल्हासा को केंद्र बनाकर 5,000 किलोमीटर लंबा पठारी रेल नेटवर्क तैयार करना बताया जा रहा है। चीन ने इसी काम के लिए “सिंक्यांग-तिब्बत रेलवे कंपनी” नाम से एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी बना दी है, जिसकी शुरुआती पूंजी 95 अरब युआन (लगभग 13.2 अरब अमेरिकी डॉलर) तय की गई है।

चूंकि इस रेल मार्ग का एक हिस्सा भारत-चीन सीमा के बहुत पास से गुजरेगा, इसलिए भारत के लिहाज से सामरिक दृष्टि से बहुत संवेदनशील घटनाक्रम है। यह रेल मार्ग चीन के जी 219 राजमार्ग से भी जुड़ा है, जो विवादित अक्साई चिन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जो 1962 के भारत—चीन युद्ध के केन्द्र में रहा है।

चीन पहले ही सीमा के पास सड़कें और अन्य सैन्य-संबंधी बुनियादी ढांचे विकसित कर चुका है, जिससे उसकी कम वक्त में सैन्य तैनाती की क्षमता बढ़ गई है। इसलिए भारत की सुरक्षा एजेंसियों की इस उपक्रम पर पैनी नजर होनी जरूरी भी है। भारत की खुफिया और रक्षा एजेंसियां इस परियोजना पर सतत निगरानी रख रही हैं।

यह रेल मार्ग चीन के जी 219 राजमार्ग से भी जुड़ा है, जो विवादित अक्साई चिन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के केन्द्र में रहा है।

भारत में भी वर्तमान केन्द्र सरकार के सीमाओं को सुरक्षित बनाने की परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने की आवश्यकता बहुत पहले से जताई जा रही थी, लेकिन स्वतंत्रता के बाद अधिकांश समय केन्द्र में रहीं कांग्रेस सरकारों ने इस ओर उदासीनता ही दिखाई और हमारी सीमाएं लगभग असुरक्षित रहीं, जिसका खामियाजा हमें 1962 के युद्ध में झेलना पड़ा था, जब चीन की सीमाएं लद्दाख में काफी अंदर तक घुस आई थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लद्दाख के प्रति बहुत अपमानजनक शब्द बोलकर उसे अनदेखा छोड़ दिया था। यही स्थिति अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं की भी बना दी गई थी।

भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की विस्तारवादी नीतियों को उजागर करता आ रहा है, जिस पर और तीव्रता से काम किए जाने की आवश्यकता है। फिलहाल चीन भारत के साथ ‘संबंधों को सुधारने’ की बातें कर रहा है, लेकिन उसकी छद्म नीतियों को भारत के विशेषज्ञ अच्छी तरह जानते हैं इसलिए भारत का विदेश विभाग फूंक—फूंककर कदम रख रहा है, जो आवश्यक भी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह रेल लिंक परियोजना चीन की “वेस्टर्न फ्रंटियर” रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकसित कर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।
इसलिए आशंका है कि जब दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की कोशिशें चल रही हों, उस मौके पर यह परियोजना विश्वास की कमी को और गहरा कर सकती है।

यह खबर ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बीजिंग में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भाग लेने जाने वाले हैं। संभवत: इस मुद्दे पर वहां सम्मेलन से इतर बात हो, क्योंकि चीन का यह रेल लिंक भारत के लिए केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती है।

Topics: भारतचीनdiplomacyforeign relationsborder disputeindo china relationsरेल लिंक परियोजनाtibet rail link
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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