ओडिशा की उड़ान : मुकुल कानितकर ने बताया "भारत के विकास का आधार"
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ओडिशा की उड़ान : मुकुल कानितकर ने बताया “भारत के विकास का आधार”

भुवनेश्वर में पाञ्चजन्य के सुशासन संवाद में मुकुल कानितकर ने कहा— भारत को देने की सोच ही विकास का आधार है। उन्होंने ओडिशा के योगदान को बताया सराहनीय...

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jul 28, 2025, 02:15 pm IST
inभारत, ओडिशा

भुवनेश्वर, ओडिशा । भारत के सुशासन मॉडल में तेजी से उभरते ओडिशा की नई भूमिका को लेकर ‘पाञ्चजन्य’ द्वारा आयोजित सुशासन संवाद : ‘ओडिशा की उड़ान’ का आयोजन आज (28 जुलाई, 2025) ताज विवांता, भुवनेश्वर में किया गया। कार्यक्रम के प्रथम सत्र “आधार और आह्वान” में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानितकर ने अपना उद्बोधन दिया।

भारत की प्राचीन समृद्धि और सांस्कृतिक पहचान

मुकुल कानितकर जी ने पाञ्चजन्य को धन्यवाद देते हुए कहा- जब हम विकास की बात करते हैं और विकास को आर्थिक परिणाम से नापने की बात करते हैं, तो जैसे सभी लोग जानते हैं कि हमारा देश योग और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत पूरे विश्व में, अगर इतिहास और स्वामी विवेकानंद के कहे शब्दों में कहें, तो इतिहास भी काल की गहन गुफाओं में झांकने का साहस नहीं कर सकता। इतने आदिकाल से भारत समृद्धि के परिचायक के रूप में ही विश्व में जाना जाता रहा है। इसलिए उसको सोने का घर कहा जाता था, सोने की चिड़िया कहा जाता था। भारत को सोने का घर कहा जाना चाहिए, सोने की चिड़िया तो छोटी बात हो जाती है।

भारत की स्वर्ण संपदा और वैश्विक स्थिति

उन्होंने भारत की स्वर्ण संपदा और वैश्विक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा- क्योंकि आज भी अगर चौथी अर्थव्यवस्था भारत है, तो सबसे ज्यादा सोना भारत ही खरीदता है। भारत के मंदिरों में जितना सोना है, उससे हम पूरे विश्व को कई बार खरीद सकते हैं। हमारी महिलाओं के पास इतना सोना है कि एक बार भारत के वित्त मंत्री को सपना आया था कि इस सोने पर डाका डाला जाए। इतना बड़ा सोने का भंडार आज भी हमारे पास है। एक लेखक ने लिखा कि सोने का हाथी अभी सोया हुआ था। 1998 में पॉल बरौक नाम के एक लेखक ने लिखा कि विश्व के ज्ञात इतिहास में सर्वाधिक वर्षों तक अगर कोई देश सबसे अमीर रहा है, तो वह भारत ही रहा है।

एंगस मैडिसन का आर्थिक अध्ययन

उन्होंने एंगस मैडिसन के आर्थिक अध्ययन का उल्लेख करते हुए आगे कहा कि उसी समय विश्व के सबसे अमीर देशों का संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर कॉर्पोरेशन एंड इकोनॉमिक डेवलपमेंट ने 1999 में इस लेख पर चर्चा की। उस समय इसके बारे में विमर्श हुआ, लेकिन अमीर देशों के जो भी लोग थे, वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुए। तब ब्रिटिश शासन ने आदेश दिया कि आप विश्व का आर्थिक इतिहास लिखिए। चार साल तक अनेक शोधकर्ताओं को साथ लेकर एंगस मैडिसन ने विश्व का 2000 वर्षों का आर्थिक इतिहास लिखा। 2004 में उसकी पुस्तक प्रकाशित हुई। पुस्तक का नाम था इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड: मिलेनियम पर्सपेक्टिव।

भारत का आर्थिक योगदान और संघर्ष

उन्होंने आगे कहा- उस इतिहास में मैडिसन लिखते हैं कि पहले 15 सौ वर्षों तक पूरे विश्व का केवल एक नंबर का देश नहीं, बल्कि विश्व के आर्थिक उत्पादन में 40% योगदान देने वाला कोई देश था तो वह भारत था। वे कहते हैं कि कभी 30-32%, कभी 66% तक गया, और औसतन 46% जीडीपी का योगदान भारत से हुआ। उसके बाद चीन का उदय होता है, और उसके बाद भारत की हिस्सेदारी कम हो जाती है। भारत में इस्लाम का आक्रमण होता है और इस आक्रमण की वजह से संघर्ष होता है। पूरे देशभर में संघर्ष होने लगता है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाती है। पूरे देशभर में हिंदू अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ रहा होता है। ऐसे में हमारे विश्वकर्मा, हमारे कारीगर, हमारे उत्पादक भी संघर्ष में लगे रहते हैं। लोहार ने संघर्ष किया, बंजारों ने संघर्ष किया। जब भारत संघर्ष में था, तब भी उसका 23% योगदान विश्व की जीडीपी में था।

ब्रिटिश शासन और शिक्षा नीति का प्रभाव

मुकुल कानितकर जी ने आगे ‘ब्रिटिश शासन और उसका शिक्षा नीति पर प्रभाव को लेकर कहा- भारत में 1835 में लॉर्ड मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा नीति लागू हुई। भारतीय शिक्षा अधिनियम बना और भारत में गुरुकुल समाप्त कर दिए गए। उनके स्थान पर अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य करने का प्रयास हुआ। भारत की साक्षरता अंग्रेजों के आने से पहले काफी अच्छी थी। जब तक भारत की साक्षरता 100% थी, तब तक भारत का उत्पादन में योगदान 23% था। अंग्रेज जब हमारे देश में आए तो भारत की साक्षरता घटकर 14% रह गई और देश के 86% लोगों को अंग्रेजों ने अशिक्षित कर दिया।

अंग्रेजी शिक्षा और भारत का आर्थिक पतन

उन्होंने कहा- अंग्रेजों की किताबों में हमें पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों के बाद ही हमारे देश में शिक्षा आई थी। जबकि ब्रिटिश शासन के बाद भारत की साक्षरता घट गई और भारत का योगदान विश्व की जीडीपी में मात्र 2% रह गया। इतना अंग्रेजों ने भारत को लूटा कि भारत, जो अनादिकाल से व्यापार के लिए जाना जाता था, उसकी पहचान धूमिल हो गई।

यात्रियों और आक्रांताओं की नजर में भारत

मुकुल जी ने बताया कि विश्व के जितने यात्री, जितने आक्रांता और जितने आक्रमणकारी भारत में आए, वे भारत की संपदा से आकर्षित होकर आए। अलबरूनी जब यहां आया तो भारत की कला और संस्कृति के बारे में लिखते-लिखते थक गया। भारत केवल नृत्य, नाटक और कला की भूमि नहीं, बल्कि संस्कारों की भूमि भी है। भारत प्रत्येक अर्थ में समृद्धि का परिचायक अनादिकाल से रहा है और उसने विश्व को हमेशा योगदान दिया है।

वासुदेव कुटुंबकम की दृष्टि

उन्होंने कहा- भारत ने हमेशा विश्व स्तर पर योगदान दिया है, क्योंकि हमारी शक्ति हमारी दृष्टि में दिखती है। हमारी दृष्टि परिवार दृष्टि है — वासुदेव कुटुंबकम की दृष्टि। जब भी भारत के पास ताकत आई, उसने पूरे विश्व को प्रेम, ज्ञान और शिक्षा से भर दिया।

भारत की समृद्धि और वर्तमान दृष्टिकोण

उन्होंने बताया कि आज भी भारत की आर्थिक स्थिति को नापने के परिणाम गड़बड़ हैं। भारत की समृद्धि आज भी कम नहीं है। अगर आज हम अन्य देशों में मौजूद हैं, उड़ीसा में मौजूद हैं, तो हर क्षेत्र में योगदान रहा है। हमारी दृष्टि सही करना आवश्यक है। भारत की दृष्टि कभी भी गलत व्यवहार या व्यवस्था से जुड़ी नहीं रही है। वह हमेशा सही, सटीक और न्यायसंगत दृष्टि से सभी को देखता आया है।

पारिवारिक संबंध और भारत का योगदान

उन्होंने कहा- अपने अस्तित्व के लिए सारी प्रजातियां संघर्ष करती हैं। उसी में भारत का बड़ा योगदान है। फिर एंगस मैडिसन की वेल्थ ऑफ द नेशन पुस्तक में यह लाया गया कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत लागू होता है। दूसरे देशों की बात करें तो वहां पारिवारिक संबंध नहीं हैं जैसे भारत में हैं, जिसकी वजह से वहां लड़ाई-झगड़ा और अशांति फैली हुई है।

म्यूचुअल एड और जैव विविधता का महत्व

मुकुल जी ने बताया कि रूस का एक जीवविज्ञानी, जिसका नाम पीटर क्रॉपोटकिन था, उसने बायोलॉजी और विश्व के सारे प्राणी जगत और जीव-जंतुओं के बारे में बताते हुए यह सिद्धांत दिया कि द वर्ल्ड एक्जिस्ट्स ऑन द बेसिस ऑफ म्यूचुअल एड।

भारत में तो यह विचार पहले से ही था। बायोडायवर्सिटी की जो बात आजकल चल रही है, उसके बारे में वह बताता है।

आज जब से प्रोजेक्ट टाइगर चल रहा है, तो यह कहा जाता है कि अगर टाइगर नहीं बचेगा, तो मनुष्य भी नहीं बचेगा। एक-एक छोटी से छोटी प्रजाति की रक्षा का प्रयास किया जा रहा है। बायोडायवर्सिटी पर पिछले 20–25 वर्षों से जो कार्य हो रहा है, उसका विचार वह 1930 में ही लिख चुका था।

संघर्ष बनाम परस्पर सहयोग की भारतीय अवधारणा

उन्होंने भारत के परस्पर सहयोग की अवधारणा को लेकर कहा- सारे विश्व को बाज़ार के दृष्टिकोण से देखने वाली इस धारणा ने संघर्ष का मार्ग अपनाया है, क्योंकि संघर्ष के बिना अस्तित्व नहीं है— यह बता दिया गया। भारत तो म्युचुअल एड से भी आगे की बात करता है, परस्पर पूर्वकता से भी आगे की बात करता है। भारत सदियों से इसके बारे में बात करता आया है, इसीलिए सदा-सर्वदा संपन्न रहा और केवल अंतिम व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रत्येक स्तर के व्यक्ति की बात की।

भारतीय दर्शन और सर्वे भवन्तु सुखिनः का संदेश

उन्होंने भारतीय दर्शन और उसके संदेश पर प्रकाश डालते हुए कहा-  हमारा देश सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु” जैसे विचारों से भरा हुआ है। यहां हर दिन लोग अलग-अलग पाठ करते हैं— कभी हनुमान चालीसा तो कभी सुंदरकांड का। उड़ीसा में जब सभी लोग जगन्नाथ जी की पूजा करते हैं तो आखिर में सर्वे भवन्तु सुखिनः का पाठ करते हैं। हमारे मंदिरों में आरती के बाद नारे लगते हैं— धर्म की रक्षा धर्म का नाश हो, विश्व का कल्याण हो। हम केवल भारत की बात नहीं करते, हम पूरे विश्व की बात करते हैं।

लेकिन अगर हम दूसरों की बात करें, तो वहां कहा जाता है कि जो ईश्वर को नहीं मानेगा, वह नरक में जाएगा। कन्वर्ज़न का आधार ही यही है। जो लोग कन्वर्ज़न नहीं होने देते थे, उन्हें मार दिया गया। कन्वर्ज़न का अर्थ यही है कि जब तक आप हमारे भगवान को नहीं मानेंगे, आप नरक में जाएंगे। लेकिन भारत के धर्म ने कभी यह नहीं कहा कि जो लोग हमारे धर्म को नहीं मानेंगे, वे नरक में जाएंगे।

थाईलैंड और कंबोडिया का उदाहरण

उन्होंने कहा-  चार दिन पहले हमारे पूर्व में थाईलैंड— जो कभी भारत का अंग था और जहां भारत के बड़े व्यापारी वस्त्र और टेक्सटाइल का व्यापार करते थे— का एक जहाज एक द्वीप के पास खराब हो गया। बताया गया कि उस द्वीप के लोग सुरक्षा की भावना से रहते हैं और किसी भी बाहरी सेवा को स्वीकार नहीं करते। जहाज ठीक होने तक उन्हें वहीं रुकना पड़ा। बिना किसी डर के वे वहां गए और सहज प्रेम भाव से निकले। रानी ने जब उन्हें देखा तो आश्चर्य हुआ, क्योंकि वहां के लोगों ने कभी वस्त्र नहीं देखे थे। जब उन्होंने वस्त्र देखे, तो प्रेमपूर्वक संवाद किया और कंबू को स्वीकार कर लिया। उन्होंने कंबू से वस्त्र पहनना शुरू किया और सारी संस्कृति की शिक्षा दी।

उन्होंने वर्तमान वैश्विक अशांति और भारत की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आज वह कंबोडिया, थाईलैंड आज युद्ध की स्थिति में हैं। विश्व में 54 स्थानों पर ड्रोन और मिसाइलों से आक्रमण हो रहा है। बंदूकें चल रही हैं, सैनिक मारे जा रहे हैं, सामान्य नागरिक मर रहे हैं। सारा विश्व अशांति में है, और इसका कारण स्ट्रगल फॉर एग्ज़िस्टेंस है। आज इसलिए विश्व भारत की ओर देख रहा है और भारत को अपना गुरु बनाना चाहता है।

संतुलित विकास का भारतीय मॉडल

उन्होंने कहा- अगर विकास की बात करें तो हर जगह से विकास होना चाहिए। लेकिन अगर उदाहरण लें कि केवल माथे का विकास हो और शरीर का बाकी हिस्सा न हो, तो कितना विचित्र लगेगा। हमारे यहां भागवत में श्रीकृष्ण का वर्णन होता है — नवदृष्ट, उत्तम बालक, जिसने एक उंगली पर गोवर्धन उठाया और क्रोध में भीष्म पर रथ का पहिया उखाड़ फेंका, किंतु शरीर कितना कोमल रहा। समय का उत्कर्ष और संतुलित उत्कर्ष — यही भारत का नाम है।

भीष्म की शिक्षाएं और धर्म का विकास

उन्होंने महाभारत से पितामह भीष्म का उदाहरण देते हुए कहा- महाभारत में पितामह भीष्म धर्मराज युधिष्ठिर को शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि धर्मराज कैसे स्थापित होगा, धर्म का विकास कब होगा — जब दोनों प्रकार का विकास होगा। यहां जो सड़कों पर लिखा होता है— सड़कें अच्छी होंगी, बिजली होगी, भवन होंगे, प्रसाद होंगे — उसमें भी कल्याणकारी और इको-फ्रेंडली दृष्टिकोण होना चाहिए। प्रकृति का विनाश करके किया गया विकास अभ्युदय नहीं कहलाता। यानी कि भौतिक विकास के साथ-साथ आंतरिक विकास आवश्यक है।

भारत की परंपरा और आंतरिक विकास का मॉडल

उन्होंने आगे कहा- भारत की परंपरा यही रही है। भीष्म जो बातें कहते हैं, वे भविष्य की नहीं, बल्कि भूतकाल की हैं। भारत में भूतकाल से ही सभी चीजों का संतुलित इस्तेमाल होता आया है। यहां गुड गवर्नेंस की आवश्यकता नहीं, क्योंकि समाज स्वयं अनुशासित है। आजकल वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट की बात होती है। यह केवल इतनी बात नहीं है। प्रत्येक जनपद, तालुका, ग्राम स्तर पर हर क्षेत्र का अपना स्वभाव और उत्पादन है। यही आंतरिक विकास का मॉडल है।

गुजरात की तीर्थ ग्राम योजना और उड़ीसा की क्षमता

मुकुल जी ने कहा कि गुजरात के मॉडल की बात करें तो बहुत कम लोगों को पता है कि तीर्थ ग्राम योजना बनाई गई थी। इसमें 10–15 पैमानों पर गांवों का चयन होता था। जैसे — जिस गांव में जाति के आधार पर संघर्ष न हो, जहां पीने का जल एक ही स्रोत से मिलता हो, जहां एक मंदिर हो — ऐसे गांवों को शांति और समृद्धि का प्रतीक मानकर योजना का लाभ दिया गया। नरेंद्र मोदी, जब मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने इस योजना को आगे बढ़ाया। उस समय 150 गांवों को तीर्थ ग्राम घोषित किया गया। बाद में जब फॉर्म भरे गए तो पता चला कि साढ़े तीन हजार गांव सारे 15 मानकों पर खरे उतरे।

गुजरात से भी ज्यादा तीर्थ ग्राम आज भी उड़ीसा में मिल जाएंगे, क्योंकि यह समाज समृद्ध और संपन्न है। शासन को केवल उनके साथ जुड़ने की आवश्यकता है। इसलिए विकास केवल एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि संपूर्ण दृष्टिकोण से होना चाहिए। उड़ीसा राष्ट्रीय परिवार का एक अंग है। इस अंग को छोड़े बिना भारत माता जगतगुरु नहीं हो सकती।

भारत का ग्रॉस एम्पावरमेंट मॉडल

उन्होंने कहा- भारत में केवल ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट की बात नहीं होती। हमारे प्रधानमंत्री जी ने ग्रॉस एम्पावरमेंट की बात की। भारत में ऋषियों ने सदियों से यह तय किया है कि कौन उन्नत है और कौन विकसित है।

त्याग और योग की भारतीय परंपरा

उन्होंने आगे कहा कि भरत में त्याग का सम्मान किया जाता है। हमारे ऋषियों ने हमेशा पूरे विश्व को आर्थिक और सामाजिक दिशा दी। योग और प्राणायाम से लेकर कपालभाति तक का अभ्यास कराया, जैसा आज बाबा रामदेव कराते हैं। भारत का इतिहास गवाही देता है कि यहां हर पीढ़ी यह प्रयास करती रही कि अगली पीढ़ी उससे ज्यादा सक्षम और समृद्ध हो। हर हिंदू का सपना यही होता है कि उसकी अगली पीढ़ी अधिक समर्थ बने। भारत का आधार क्रॉस नेशनल कंट्रीब्यूशन है।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था

उन्होंने कहा— अमेरिका की बात करें तो वह आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया जैसा देश है, जो कई गुना लोन में अभी अपनी जिंदगी काट रहा है। हमने विजय माल्या के बारे में बहुत ज्यादा बात की, भारत में इसके बारे में बहुत चर्चा की जाती है, लेकिन वास्तव में अमेरिका लोन से घिरा हुआ है। अमेरिका काफी कुछ देखकर चला, जिसकी वजह से आज इस जगह पर खड़ा है। अगर हम अमेरिका की बात करें तो वह हमेशा यह सोचता रहा कि मैं क्या दूंगा। जो लोग ऐसा सोचते हैं, वही जिंदगी में आगे बढ़ते हैं।

ओडिशा का योगदान और दृष्टिकोण

उन्होंने कहा- इसलिए आज विभिन्न राज्य कह रहे हैं कि जीएसटी में हम इतना देते हैं, कौन कितना लेता है, तो इसका हिसाब करके बातें करते हैं। तो मुझे लगता है कि ओडिशा ने हमेशा किया है, हमेशा दिया है। हमेशा इसलिए देने वाले, दिया— इस बात के परिमाण बनाए कि हमारा नेशनल कंट्रीब्यूशन क्या होगा, हम भारत को विश्व गुरु बनाने में क्या योगदान देंगे।

शिक्षा, उद्योग और खान-पान की भूमिका

उन्होंने बताया- यहां के अकैडमिशियन, यहां के शिक्षाविद, यहां के वैज्ञानिक, यहां के शोधकर्ता, यहां के उद्योगपति, यहां के ग्रामीण, यहां के कार्यकर्ता, यहां के विश्वकर्मा, यहां की माइंस— क्योंकि खान से ही तो हमारे देश भारत को सोने की चिड़िया बनाया गया था। हमेशा से हम मैन्युफैक्चरिंग करते रहे, आज फिर से वह सपने साकार करने की आवश्यकता है।

भारत को देने की सोच ही विकास का आधार

उन्होंने कहा-  इससे प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचना है कि मैं भारत को क्या दूंगा। वही विकास का माध्यम होगा, वही सुमेरु कर्तव्य का माध्यम होगा। क्योंकि राष्ट्र के विकास में ही राष्ट्र संघ का विकास होगा। राष्ट्र के अंग के रूप में हमारा विकास तभी होगा, जब हम यह सोच रखेंगे।

 

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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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