‘शरिया’ या विवादों का दरिया
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बिहार में मुस्लिम मतदाताओं को लामबंद करने में जुटी ‘शरिया’ या विवादों का दरिया

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले इमारत-ए-शरिया एक बार फिर मुस्लिम मतदाताओं को लामबंद करने में जुटी, लेकिन इस बार संस्था दो धड़ों में बंट गई है

Written byसंजीव कुमारसंजीव कुमार — edited by Rajpal Singh Rawat
Jul 14, 2025, 03:33 pm IST
in विश्लेषण, बिहार
पटना के फुलवारी शरीफ में सरकारी जमीन पर बना है इमारत-ए-शरिया का मुख्यालय, जो लीज पर ली गई है

पटना के फुलवारी शरीफ में सरकारी जमीन पर बना है इमारत-ए-शरिया का मुख्यालय, जो लीज पर ली गई है

बिहार की सियासत गरम है। विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और मुस्लिम वोटों को लेकर चालें तेज़। खुद को मजहबी-सामाजिक बताने वाली कई संस्थाएं असल में राजनीतिक एजेंडा चला रही हैं। इन्हीं में एक है इमारत-ए-शरिया। एक ऐसी संस्था जो आज शरिया की आड़ में राजनीति और संपत्ति की जंग का अखाड़ा बन चुकी है।

गत 29 जून को इमारत-ए-शरिया ने पटना के गांधी मैदान में ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ नाम से एक रैली बुलाई। मकसद यह बताया गया कि वक्फ संपत्तियों को बचाना है, लेकिन मंच से मुसलमानों में डर फैलाने की कोशिश की गई। ‘कब्रें छीन ली जाएंगी, सोचो तब अपने मुर्दों को कहां दफन करोगे?’- ऐसे डरावने जुमले बोले गए। नतीजा? गांधी मैदान खाली रहा और रैली में आए लोग सड़कों पर ही घूमते दिखे। महत्वपूर्ण बात यह है कि उस रैली से पसमांदा मुसलमान समुदाय और महिला नेतृत्व पूरी तरह गायब था। सवाल उठता है कि क्या यह वाकई वक्फ की लड़ाई थी या सिर्फ महागठबंधन को मंच देने की रणनीति?

पटना के समनपुरा मुहल्ले के निवासी मो. एजाज खां इस रैली से काफी दुखी दिखे। उन्हें उम्मीद थी कि इस दिन वक्फ पर कोई सार्थक बहस होगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सिर्फ मुसलमानों को खौफ दिखाया गया। लगा कि यह जुटान महागठबंधन के नेताओं को मंच प्रदान करने के लिए बुलाई गई हो। इससे पहले, 2018 में भी इस संस्था ने तीन तलाक मुद्दे पर ‘दीन बचाओ, ईमान बचाओ’ रैली की थी। रैली से संस्था को कुछ हासिल हुआ या नहीं, पर वली रहमानी के शागिर्द खालिद अनवर को एमएलसी की कुर्सी जरूर मिल गई। सवाल है, ये रैलियां वाकई मजहब के लिए होती हैं या सियासत के लिए?

बहरहाल, इस बार रैली आयोजन का मकसद कुछ और ही था। नौकरशाही डॉट कॉम के संपादक इर्शादुल हक अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में बताते हैं कि इस रैली के पीछे कुछ गुप्त एजेंडे थे। सबसे बड़ा एजेंडा विवादित चुनाव के बाद अमीर बने फैसल वली रहमानी को समाज के सामने खुद को स्थापित करना था। दूसरा, राज्य सरकार को यह बताना था कि सरकारी जमीन पर इमारत-ए-शरिया का जो कब्जा है, उसे खाली नहीं कराया जा सकता। इसके अलावा, सबसे अहम मुद्दा मुसलमानों को महागठबंधन के पक्ष में लामबंद करना था।

अमीर की कुर्सी या खानदानी ताजपोशी?

कट्टर देवबंदी समुदाय से संबंध रखने वाली संस्था इमारत-ए-शरिया की स्थापना 26 जून, 1921 को पटना सिटी स्थित पत्थर की मस्जिद में की गई थी। इस दिन मौलाना अबुल मोहसिन सज्जाद के नेतृत्व में मस्जिद में 500 से अधिक उलेमाओं की उपस्थिति में एक सभा हुई थी। सभा में अधिकांश उलेमा संयुक्त बंगाल प्रांत के थे। सभा की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की थी। लेकिन इसमें 45 साल तक अमीरी एक ही परिवार तक सिमटी रही। वली रहमानी के बाद उनके बेटे फैसल वली रहमानी को अमीर बना दिया गया, जबकि उनके पास न आलिम की डिग्री है, न मजहबी योग्यता। वे अमेरिका के नागरिक हैं और इंजीनियर रह चुके हैं। बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य और इस्लाम के जानकार मोहम्मद तुफैल अहमद खां कादरी तो फैसल रहमानी के अमीर बनने की पूरी प्रक्रिया को ही गलत बताते हैं। फहद रहमानी ने पिछली बार अपने भाई फैसल रहमानी को अमीर बनाने के लिए फर्जी तरीके 170 लोगों को संस्था का सदस्य बना दिया। इससे बड़ी हस्तियां, जैसे खालिद सैफुल्लाह रहमानी नाराज होकर चुनाव प्रक्रिया से पीछे हट गए।

मुसलमानों के बीच छवि अच्छी नहीं

इमारत-ए-शरिया का कार्य क्षेत्र बिहार, झारखंड और ओडिशा है। बिहार झारखंड में यह संस्था 267 मदरसे, सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त 10 स्कूल, 8 टेक्निकल इंस्टिट्यूट, एक पैरामेडिकल इंस्टिट्यूट और अस्पताल चलाती है। संस्था से ही संबंधित उम्मीद फाउंडेशन है, जो मुस्लिम विद्यार्थियों को सरकारी सेवा में जाने के लिए कोचिंग संस्थान चलाता है। इसके अलावा खानकाह रहमानी और रहमानी सुपर 30 भी अमीर के लोगों की देखरेख में चलता है। यही संस्था तब्लीगी जमात का संचालन भी करती है। पहले इसका काफी रसूख था, लेकिन एक दल विशेष को बार-बार मदद कर, एक परिवार के कब्जे और वित्तीय अनियमितताओ जैसे आरोपों के कारण मुसलमानों के बीच इसकी स्वच्छ छवि नहीं रह गई है।

फैसल रहमानी बनाम संस्था के भीतर के सवाल

फैसल रहमानी की योग्यता पर जब सवाल उठा तो छह लोगों की जो जांच कमेटी बनी, उसके तीन बड़े आलिमों ने ही उन्हें आलिम मानने से इनकार कर दिया था। शेष 3 फैसल के ही मदरसे से ताल्लुकात रखते थे। अमेरिकी नागरिक होने के कारण फैसल रहमानी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव पद से हटा दिया गया था। खैर, अमीर बनने के बाद फैसल रहमानी और उनके भाई फहद रहमानी ने अपने विरोधियों को एक-एक कर बाहर का रास्ता दिखा दिया। मौलाना मोहम्मद शिबली कासमी जैसे सम्मानित लोगों को भी नहीं बख्शा गया। इफ्तार पार्टी के बहिष्कार पर भी संस्था दो गुटों में बंट गई-एक फैसल का, एक बर्खास्त नाजिम शिबली कासमी का।

दरअसल, बीते 22 मार्च को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रमजान पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया तो इमारत-ए-शरिया ने इसके खिलाफ फतवा जारी कर दिया, क्योंकि जदयू ने वक्फ संशोधन विधेयक का समर्थन किया था। उसके बाद संस्था का अंदरूनी विवाद सतह पर आ गया। अहमद अली फैसल रहमानी ने एक बैठक करके संस्था के चार न्यासियों अबू तालिब रहमानी, नजर तौहीद मजाहिरी, अहमद अशफाक करीम और रागिब अहसन को बर्खास्त कर दिया। पूर्व राज्यसभा सांसद अहमद अशफाक करीम ने ही कहा था कि फैसल रहमानी अमेरिकी नागरिक हैं। ऐसे विवादित लोगों को अमीर जैसे महत्वपूर्ण पद पर नहीं होना चाहिए।
पटना के वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद बताते हैं, ‘‘इमारत-ए-शरिया पहले राजनीतिक संस्था नहीं थी, लेकिन समय के साथ इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा है। पसमांदा मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर भी बहस हुई है। सीधे तो नहीं, लेकिन लुके-छुपे यह संस्था राजनीतिक पार्टियों के लिए वोटिंग की अपील करती रही है।’’

मजहब की चादर में संपत्ति की लड़ाई

इमारत-ए-शरिया को कई करोड़ का चंदा मिलता है, लेकिन उसका आय-व्यय कभी सार्वजनिक नहीं होता। यही नहीं, संस्था के पास कई बेनामी संपत्ति है। यहां तक कि फुलवारी शरीफ का मुख्यालय भी सरकारी जमीन पर है, जिसे सरकार कभी भी वापस ले सकती है। इसी डर से सरकार को रैलियों के माध्यम से दबाव में लाने की कोशिशें होती रहती हैं। संस्थान से जुड़े सूत्र बताते हैं कि पूरे विवाद की जड़ में संपत्ति है। संस्था गरीब होती गई और रहमानी परिवार की संस्थाएं जैसे रहमानी सुपर-30 की कमाई बढ़ती गई। यहां के छात्र भी शिकायतें करने लगे हैं, जिनमें घुटन का माहौल, खराब व्यवहार और पढ़ाई की गिरती गुणवत्ता प्रमुख हैं। शरिया का नाम लेकर चलने वाली इस संस्था में आज न लोकतांत्रिक प्रक्रिया बची है, न पारदर्शिता। न प्रतिनिधित्व है, न जवाबदेही। जो सवाल उठाए, उसे बाहर कर दिया जाता है। और जब जमीन, जायदाद और कुर्सी ही मकसद बन जाए – तो शरिया की नहीं, ‘शरारतों’ की बात होती है। प्रश्न है क्या यह संस्था मुस्लिम समाज की सेवा कर रही है या कुछ परिवारों की सत्ता और संपत्ति का साधन बन चुकी है?

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