पश्चिमी सत्ता प्रतिष्ठान और उनके भोंपू लिबरल मीडिया की भारत के प्रति एक सनक भरी दुर्भावना पहले से ही छिपी नहीं थी लेकिन पहलगाम हमले के बाद यह पूरी तरह नग्न हो गई है। पहलगाम में धर्म पूछ कर हिंदू पर्यटकों की हत्या के बावजूद पश्चिमी मीडिया इसे उग्रवादी/अलगाववादी हमला साबित करने की कोशिश करता रहा।
प्रमुख अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स की पहलगाम खबर का शीर्षक कुछ ऐसा था कि अमेरिकी विदेश विभाग की हाउस कमेटी को सोशल मीडिया पर आकर कहना पड़ा, “न्यूयार्क टाइम्स, हम आपको बताना चाहते हैं कि यह सीधे और साफ तौर से आतंकवादी हमला है। जब भी भारत या इजराइल हो और मामला आतंकवाद से जुड़ा हो तो न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्टिंग हमेशा सच्चाई से कोसों दूर रहती है।” लेकिन पश्चिमी मीडिया के लिए यह न आतंकी हमला था और न हमलावर आतंकी थे।
बीबीसी, वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा बंदूकधारी
बीबीसी, वाशिंगटन पोस्ट और अल जजीरा ने शीर्षकों में ‘बंदूकधारी’, एपी, रायटर्स तो न्यूयार्क टाइम्स ने ‘उग्रवादी’ शब्द का इस्तेमाल किया। कुछ ने पर्यटकों पर हमला और पहलगाम में गोलीबारी जैसे शीर्षकों का इस्तेमाल किया।
पाकिस्तान का भोंपू बना पश्चिमी मीडिया
भारत के आपरेशन सिंदूर के दौरान तो पश्चिमी मीडिया खुलकर पाकिस्तान का भोंपू बन गया था। पाकिस्तान के दावों को चीवी चैनलों पर ज्यों का त्यों चलाया गया और ‘अटलांटिक’ व ‘फारेन अफेयर्स’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने पाकिस्तान को विजेता तक घोषित कर दिया। यह उन पाकिस्तानी दावों के आधार पर था कि उसने रफाल सहित भारत के छह लड़ाकू विमान मार गिराए हैं।
जब मांगे गए सबूत
हालांकि जब अफगानी मूल की एक टीवी एंकर ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री से इन दावों के बारे में सबूत मांगे तो वे इतना ही कह पाए कि सब कुछ सोशल मीडिया पर है। पश्चिमी मीडिया के लिए सबूत असुविधाजनक हो गए थे। कुछ तो आंतकी अड्डों पर हुए हमले में मारे गए आतंकियों को भी बेगुनाह आम नागरिक साबित करने की कोशिश से बाज नहीं आए।
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भारत ने हर हमले के दिए सबूत
उधर, भारत ने हर हमले के बाद बाकायदा वीडियो सबूत पेश किए। और ये हमले 88 घंटे के युद्ध में तीन बार हुए जिसके नतीजे पाकिस्तान के लिए ड़रावने साबित हुए। हवाई युद्ध के तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले में पाकिस्तानी वायुसेना की 20 प्रतिशत क्षमता नष्ट हो गई और युद्ध अगर एक-दो दिन भी खिंच जाता तो पाकिस्तानी वायुसेना बर्बाद हो जाती। लेकिन पश्चिमी मीडिया की खबरों में हाथ की सफाई दिखाते हुए पाकिस्तानी शहरों में ड्रोन हमलों और उसके वायुसेना अड्डों पर हुई तबाही का कोई जिक्र नहीं है। वे बस भारत के कुछ लड़ाकू विमानों को मार गिराने के पाकिस्तानी दावे को ही प्रचारित-प्रसारित करते रहे जिनके बारे में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के मुताबिक, सबूत सोशल मीडिया पर हैं। उधर, भारतीय हमलों से हुई तबाही के न सिर्फ सैटेलाइट सबूत हैं बल्कि खुद पाकिस्तानियों द्वारा बनाए गए सैकड़ों वीडियो हैं।
बड़ा सवाल यह है
सवाल यह है कि पश्चिम और खासतौर से अमेरिका इतना पाकिस्तान परस्त क्यों है जिसके आंतकवाद का पोषक होने के टनों सबूत हैं और जहां से प्रशिक्षित आतंकियों ने अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों में भीषण आतंकी हमलों को अंजाम दिया है। इसके जवाब कुछ इतिहास में हैं और कुछ वर्तमान में। आजादी और विभाजन के बाद भारत निश्चित रूप से एक गरीब देश था और वामपंथी मिजाज के साहित्यकारों-फिल्मकारों ने पश्चिम के लिए भारत की गरीबी बेचने को उद्योग बना लिया था। पश्चिमी मीडिया भारत को गरीब, कुपोषित और संपेरों के देश के तौर पर ही जानता था। ऊपर से शीत युद्ध के दिनों में भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति अमेरिका को कभी रास नहीं आई। उधर, हिंदू घृणा और टू- नेशन थ्योरी के आधार पर बना पाकिस्तान पहले ही दिन से पश्चिम की गोद में बैठा है और उसके इशारे पर कुछ हमेशा कुछ भी करने को तैयार। उन दिनों कालजयी उर्दू कहानीकार शहादत हसन मंटो पाकिस्तान में बदहाली की जिंदगी जी रहे थे और अमेरिकी दूतावास को पाकिस्तान और दीन-दुनिया के हालात पर चिट्ठियां लिखा करते थे।
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अंकल सैम को मंटो ने क्या लिखा
बहरहाल 70 साल पहले 1954 में अंकल सैम को लिखी चिट्ठी में मंटो लिखते हैं, “भारत चाहे लाख बार गिड़गिड़ाए लेकिन तय है कि आपका फौजी मदद का समझौता तो पाकिस्तान से ही होगा क्योंकि आपको दुनिया की सबसे बड़ी इस्लामिक सल्तनत की हिफाजत की चिंता है और हो भी क्यों नहीं, हमारे मुल्ला रूसी साम्यवाद के खिलाफ सबसे मारक दवा हैं। जहां तक मैं समझता हूं कि इस सैन्य सहायता का असली मकसद है मुल्लों को हथियारबंद करना। मैं आपका पाकिस्तानी भतीजा हूं और आपकी सारी तिकड़में समझता हूं। यह इल्म और इलहाम मुझे आपकी हिकमत-ए-अमली (नीतियों) से हुआ है। अल्ला इसे बुरी नजर से बचाए।” मंटो ने इशारों में साफ कर दिया था कि भारत कभी भी अपने नौजवान अमेरिका की मदद के लिए नहीं भेजेगा। मंटो ने जिस साल यह खत लिखा, उसी साल पाकिस्तान को अमेरिकी सैन्य मदद का समझौता हो गया। इसी से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान किसलिए पश्चिम के लिए इतना अहम है।
भारत के लिए दोहरा रवैया क्यों
रूसी सेना के 1979 में अफगानिस्तान में घुसने से पहले ही ये तैयारियां शुरू हो गई थीं। अमेरिकी मदद से पाकिस्तानी मुल्लों को हथियारबंद किया गया, उन्हें अफगानिस्तान भेजा गया। फिर सोवियत रूस के वहां से जाने और अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड टावरों पर हमले के बाद पाकिस्तान को उन्हीं मुल्लों पर बमबारी में मदद करनी पड़ी। ट्रेड टावरों पर हमले के जवाब में अफगानिस्तान पर हमले और अमेरिका समर्थित राष्ट्रपति अशरफ गनी के पतन के बाद आज दोनों एक-दूसरे पर गलत मुल्ला को समर्थन के आरोप लगा रहे हैं। लेकिन जब बात भारत की आएगी तो अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के लिए अच्छे आतंकी और बुरे आतंकी का फर्क बना रहेगा। अच्छे आतंकी वे हैं जो पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के मददगार हैं। आज भी अमेरिका जब बुरे आतंकियों के खिलाफ और सख्त कदमों की मांग करता है तो पाकिस्तान जवाब में और पैसों की मांग करता है। सिलसिला दशकों पुराना है।
‘डर्टी जॉब’ कराता है पश्चिम
पश्चिम के लिए पाकिस्तान हमेशा वो आज्ञाकारी बच्चा है जो उनके इशारे पर उनका ‘डर्टी जॉब’ यानी वो काम जो वे खुद के बजाय पाकिस्तान से कराना चाहते हैं, करता है। ख्वाजा आसिफ चंद दिनों पहले एक इंटरव्यू में कबूल कर चुके हैं कि ये काम तो हम दशकों से करते आ रहे हैं।
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व्हाइट हाउस में आसिम मुनीर की खिदमत
सिलसिला अब भी जारी है। चीनी हथियारों और वायुसेना अड्डों के मलबे में बदल जाने के इनाम के तौर पर सेना प्रमुख आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल बना दिया गया और व्हाइट हाउस में उनकी खिदमत की गई। इस पूरी मुलाकात में पाकिस्तान की कथित लोकतांत्रिक सरकार का एक भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। जरूरत भी नहीं थी क्योंकि देश के सबसे लोकप्रिय नेता को जेल में बंद कर सरकार सेना ने ही बनाई थी। अमेरिका अब पाकिस्तान पर सौगातों की बौछार कर रहा है।
क्या है मुनीर की मंशा
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से भारी मदद और संयुक्त राष्ट्र में तमाम अहम ओहदे पाकिस्तान को मिल ही गए हैं लेकिन मुनीर चाहते हैं कि अमेरिका अब पाकिस्तान में खास तौर से खनिज क्षेत्र में निवेश करे। जाहिर है कि यह निवेश पाकिस्तानी फौज की कंपनियों के मार्फत ही होगा और जनरल फिर मालामाल होंगे। पाकिस्तान के जनरलों के इंग्लैंड और अमेरिका में करोड़ों के फ्लैट और मकान हैं और उनके उनके बेटे-बेटियां पश्चिमी देशों में ऐशो आराम की जिंदगी गुजार रहे हैं। लेकिन यह वो देश है जहां 25 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कभी स्कूल की शक्ल नहीं देखी। कहा जाता है कि पाकिस्तान को अल्ला, अमेरिका और आर्मी मिलकर चला रहे हैं। लोकतंत्र रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय के इशारों पर चलता है और रावलपिंडी अमेरिका के इशारों पर। यही अमेरिका की पाकिस्तान परस्ती की वजह है।
(लेखक मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)
















