जिस दिन मणिपुर में दुनिया को चौंकाने वाला सुमन उत्सव- शिरोई लिली-अपने चरम पर था, दिल्ली में उत्तरपूर्वांचल उदय सम्मलेन में प्रधानमंत्री कह रहे थे-‘बंद, बन्दूक और ब्लॉकेड से परे उत्तरपूर्वांचल प्रगति और विकास की नयी गाथा रच रहा है।’ कितना सत्य था यह कथन-क्योंकि जब-समस्त मीडिया वहां की केवल त्रासदी और वेदना पर ध्यान केंद्रित किये था, पाञ्चजन्य अंधेरों को चीरते हुए चुनौतियों को पार कर मणिपुर की नवीन चैतन्य गाथा का साक्षी बनने इम्फाल और उखरूल पहुंचा।

पूर्व राज्य सभा सांसद
मणिपुर प्राकृतिक सौंदर्य एवं ईश्वरीय दैवी आभा से परिपूर्ण स्वर्गिक मनोरमा का प्रदेश है। यहां गोविन्द जी हैं, पूरे देश में सनातन धर्म की अनोखी- शुद्ध-निर्मल परिपाटियों को संचित-संजोये हुए मैतेई हिन्दुओं के उत्सव हैं, मंदिरों में अनोखी मंत्रमुग्ध करने वाली-अन्यत्र दुर्लभ सनातन पद्धतियों का पूर्ण बारीकियों के साथ अनुपालन करने वाले समर्पित पुजारी हैं, पहाड़ियों पर नागा एवं अन्य जनजातियों का वैभव है। वे ईसाई हैं किन्तु उनके प्राचीन जनजातीय त्योहार- संस्कार आज भी मन मोहते हैं। परन्तु हम उनको कितना जानते हैं? क्या कामाख्या से परे हम अपने अवकाश मनाने का मन बनाते हैं? क्या इस क्षेत्र के बारे में, यहां के महापुरुषों, पर्वों, वेदनाओं, अभीप्साओं, उपलब्धियों, राष्ट्रनायकों के वृत्त लिखने का हृदय रखते हैं?
इम्फाल से डेढ़ घंटे की दूरी पर उखरुल है, पहाड़ी-तांगखुल नागा बहुल। वहां शिरोई नमक पहाड़ी पर कमल प्रजाति का सुन्दर पुष्प आज से 75 वर्ष पूर्व मिला था जिसे लंदन पुष्प प्रदर्शनी 1950 में विशेष दुर्लभ लिली (कुमुदिनी) का सम्मान मिला। यह शिरोई लिली नाम से विख्यात पुष्प उखरुल पहाड़ी पर ही उगता है अन्यत्र कहीं नहीं। इसे लेकर कुछ वर्ष पूर्व शिरोई लिली वार्षिक उत्सव प्रारम्भ हुआ जो गत दो वर्ष से अशांति के कारण नहीं हो पाया था। इस वर्ष राज्यपाल श्री अजय भल्ला (पूर्व गृह सचिव) ने इसे पुनः प्रारम्भ करने का निर्णय लेकर राज्य की सभी एजेंसियों को इसकी तैयारी में लगा दिया। बहुत कठिन चुनौती थी। उखरूल का दस किलोमीटर का हिस्सा ऐसा है जो कुकी बहुल है- उससे होकर मैतेई समाज के लोग गुजर पाएं, इसके लिए पूरी लामबंदी जरूरी थी। उत्सव सारे मणिपुर का है, इसमें सभी की सहभागिता सुनिश्चत करना ही इसकी सफलता का आधार था।

केंद्र की रणनीति बनी आधार
लगभग तीस लाख की जनसंख्या और 75 प्रतिशत से अधिक साक्षर मणिपुर विश्व में गोविन्द जी मंदिर, राधाकृष्ण की मनभावन रास लीला पर आधारित नृत्य, नियुद्ध-थंग-ता (खड्ग- भाला), खेल जगत का सम्राट-क्रीड़ा विश्वविद्यालय, पराक्रमी सैनिक वीरों के लिए जाना जाता है। घाटी और पर्वतीय क्षेत्र में विभक्त मणिपुर में मैतेई वैष्णव हिन्दू घाटी में हैं, उनमें सनामाई, ईसाई भी हैं। मैतेई अनुसूचित जनजातीय दर्जा प्राप्त करने हेतु दशकों से संघर्ष करते रहे, और जब उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया तो कुकी समाज ने उसके विरोध में हिंसक उपद्रव किये। अशांति का वर्तमान माहौल कुछ कुछ वहीं से शुरू हुआ। पर्वतीय भाग में अधिकांश तांगखुल नागा, कुकी निवास करते हैं जिन्हें अनुसूचित जनजाति होने का दर्जा प्राप्त है और वे प्रायः सभी ईसाई संप्रदाय से हैं। जिस मणिपुर में गृह मंत्रालय द्वारा तेरह से अधिक आदेशों के माध्यम से भारत विरोधी अराजक संगठनों को प्रतिबंधित किया गया हो, और जिनमें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जैसे नाम वाले हिंसक कम्युनिस्ट आतंकवादी विद्रोही संगठन भी हों, वहां शांति पथ की खोज एक दुष्कर कार्य ही कहा जायेगा। चुनौतियां तीन प्रकार की थीं-नशीले पदार्थों की तस्करी में संलग्न गुटों का सफाया, विदेशी धन और हथियारों की तस्करी और आमद पर पूर्ण रोक, सभी गुटों के साथ मिलकर बात करने का प्रयास।
नशीले पदार्थों के लिए मणिपुर में कुकी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अफीम के अलावा म्यांमार से होकर गुजरने वाले नशीले पदार्थों के कुख्यात ‘स्वर्णिम त्रिकोण’ का बड़ा असर है। एक मणिपुरी शोधार्थी के अनुसार 42 प्रतिशत जनसंख्या नशीले पदार्थों की गिरफ्त में है। पिछले चार वर्ष से गृह मंत्री अमित शाह के कठोर आदेश के बाद नशीले पदार्थों की तस्करी और विस्तार के तानेबाने पर युद्ध छेड़ा गया फलतः आतंकवादी संगठनों और उनके समर्थक तंत्र में बौखलाहट होना स्वाभाविक ही था।
इस परिदृश्य में पूर्व गृह सचिव श्री अजय कुमार भल्ला को वहां का राज्यपाल बनाया जाना अमित शाह की ‘कंटकों में शांतिपथ’ बनाने की नीति का परिचय देता है। अजय भल्ला ने आते ही सभी गुटों और विभिन्न समुदायों के संगठनों को अपनी निष्पक्षता और सभी के प्रति सामान व्यवहार का परिचय दिया। इस वर्ष वहां याओ शांग (होली) का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया गया और फिर तांगखुल नागा क्षेत्र में होने वाले शिरोई लिली उत्सव को दो वर्ष के अंतराल के बाद पुनः बड़ी तैयारी से मनाने का फैसला किया गया। तांगखुल नागा म्यांमार क्षेत्र से सदियों पहले आये थे। पहले 1894 में ब्रिटिश मिशनरी, ब्रिटिश सेना द्वारा इस क्षेत्र पर अधिपत्य के प्रयासों के बीच आये। तब से तांगखुल समाज ईसाइयत को स्वीकार कर चुका है। उनमें अभी भी अपनी धरोहर और प्राचीन हथकरघे के बने वस्त्रों के प्रति बहुत अभिमान है।
कैसे उत्सव और एकता का आधार बना लिली
शिरोई लिली उत्सव का उद्घाटन राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने किया। वे शिरोई पहाड़ी (समुद्र तल से प्रायः तीन हज़ार फ़ीट ऊंची) पर चढ़े तथा शिरोई सुमन की सुंदरता को निहारा। वे इम्फाल से हेलीकाप्टर द्वारा आ सकते थे, परन्तु उन्होंने सड़क मार्ग चुना और इस छोटी-सी पहल का स्थानीय समाज पर बहुत अच्छा असर पड़ा। वे शिरोई लिली उत्सव में आये सब आगंतुकों से सामान्य जन की भांति मिले, नागा व्यंजन चखे। चार दिन (22 मई से 26 मई) तक हज़ारों लोग इस उत्सव में भाग लेने आये। इम्फाल से मितेई,तांगखुल नागा तो उस क्षेत्र में रहते ही हैं, कुकी-जिनकी और मैतेई के साथ शत्रुता प्रसिद्ध है, और गुवाहाटी-तथा अन्य पडोसी प्रांतों के प्रवासी, मणिपुर के विभिन्न अंचलों में कार्यरत सरकारी कर्मचारी, सेना के उच्चाधिकारी, सामान्य जन, उनके परिवार जन-राजस्थान, ओडिशा, उत्तरप्रदेश, बिहार से विभिन्न व्यावसायिक कार्यों से मणिपुर में रहने वाले हिन्दू समाज के लोग, उन सबको उखरुल में एक साथ देखना, मिलना- जुलना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठाना-यह सब अभी तक मणिपुर के लिए असंभव जैसा माना जाता था, लेकिन यह हुआ और इन आंखों ने उन दृश्यों को समेटा।
एक दूसरे को समझने का मौका देता है लिली उत्सव
-थिंग्रेफी लुन्गार्वोशी- अध्यक्ष, तांगखुल शनाओ लॉन्ग,तांगखुल महिला संगठन


-भानु पोखरेल – अध्यक्ष हिन्दू समाज, उखरुल
हमारे यहां नस्लीय मारकाट बहुत होती रही है। इस कारण हम बड़ी संख्या में शिरोई लिली नहीं आ पाए , लेकिन फिर भी थोड़ी संख्या में आने पर भी यहां सब लोगों के साथ मिलना हुआ। यह लिली उत्सव समको एक दूसरे के साथ मिलने , बात करने और एक दूसरे को समझने का मौका देता है इसलिए हमको इसमें आकर अच्छा ही लगा। हम आशा करते हैं कि यहां की समस्याएं भी जल्दी ही सरकार समझेगी और समाधान देगी।
-हेगिन किपगेन -अध्यक्ष कुकी छात्र संगठन (के.एस.ओ) -जिला उखरुल
मैतेई लोग शिरोई लिली मेले में आये हैं। यहां आकर हमको बहुत अच्छा लगा है, कोई किसी के साथ किसी भी प्रकार का वैमनस्य या भेदभाव नहीं मिला। तरह तरह के व्यंजन बने हैं। मणिपुर के विभिन्न स्थानों से सब लोगो को एक साथ देखकर हमें मणिपुर पर अभिमान होता है। अगली बार आशा करते हैं यहां पूरी शांति होगी।
-लूवांगछा मैतेई – इम्फाल

-आशीष दास (आईएएस) – उपायुक्त, उखरुल

-पूजा इलंगबाम (आई.ए.एस.) – पर्यटन निदेशक, मणिपुर
















