वट पूजन पर्व पर लें वृक्ष संरक्षण का संकल्प
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होम भारत

वट पूजन पर्व पर लें वृक्ष संरक्षण का संकल्प

वट सावित्री व्रत महासती सावित्री की निष्ठा और वट वृक्ष की महत्ता का पर्व है। यह न केवल पति की दीर्घायु का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण चेतना का संदेश भी है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
May 26, 2025, 06:00 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

शास्त्र कहते हैं कि वैदिक भारत की एक महान नारी पात्र महासती सावित्री ने  अपनी अनूठी ईश निष्ठा और अद्भुत वाक् कौशल के बल पर मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न कर वट वृक्ष के नीचे प्राण त्यागने वाले अपने पति सत्यवान का  पुनर्जीवन प्राप्त किया था। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार वह शुभ तिथि ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी। कहा जाता है कि तभी से वट वृक्ष हिन्दू समाज में देव वृक्ष के रूप में पूज्य हो गया। अक्षय वट के समान अपने सुहाग को अक्षय रखने की भारतीय नारी का यह उच्चतम आदर्श हमारे उत्कृष्ट सनातन जीवन मूल्यों की पोषक परिचायक है। उत्तर भारत में बरगदाही के नाम से लोकप्रिय हिन्दू सुहागिनों का यह प्रमुख व्रत पर्व गहन ईश निष्ठा व पतिव्रत धर्म की अद्भुत शक्ति का परिचायक है। इस व्रत से जुड़ी सावित्री-सत्यवान की कथा से प्रायः हर प्रबुद्ध सनातन धर्मावलम्बी भली भांति परिचित है। महासती सावित्री की उसी महाविजय के उपलक्ष्य में प्राचीनकाल से भारत की सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री का व्रत पूजन करती आ रही हैं। पर्व की पूजन परम्परा की विशिष्टता की बात करें तो वट पूजा के दौरान बरगद वृक्ष के तने के चारों ओर हल्दी से रंगा कच्चा सूत सात बार लपेटा जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और हर हिन्दू सुहागिन पूरे विश्वास और श्रद्धा से इसका पालन करती है। समझना होगा कि वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करते हुए उसके चारो ओर कच्चा सूत लपेटना केवल एक धार्मिक प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि एक गहन प्रतीकात्मक भावना है। बरगद का पेड़ जीवन की स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक है और जब निर्जल उपवास की ऊर्जा से आपूरित सुहागिनें उसके चारों ओर सूत लपेटती सात बार परिक्रमा करती हैं तो यह प्रक्रिया पति-पत्नी के सात जन्मों के अटूट बंधन की द्योतक होती है। मान्यता है कि यह प्रक्रिया पति पर आने वाले सभी संकटों व कुदृष्टियों को टाल देती है और दाम्पत्य जीवन में आनंद व माधुर्य बना रहता है। यह पर्व परंपरा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और अटूट रिश्ते का प्रतीक मानी जाती है। यही वजह है कि वर्तमान के अत्याधुनिक युग में भी वट सावित्री व्रत की लोकप्रियता बनी हुई है।

गहन दृष्टि से विचार करें तो पाएंगे कि वट पूजन के इस महाव्रत में स्त्री शक्ति की प्रबल जिजीविषा की विजय के महाभाव के साथ हमारे जीवन में वृक्षों की महत्ता व पर्यावरण संरक्षण का पुनीत संदेश भी छुपा हुआ है। हमारी अरण्य संस्कृति में वृक्षों को जीवंत देवताओं की संज्ञा यूं ही नहीं दी गयी है। वैदिक मनीषा कहती है कि हवा के झोंकों से झूमते घने छायादार वृक्ष और उनसे गले मिलती लताएं प्रकृति का श्रंगार ही नहीं, जीवन का अज्रस स्रोत भी हैं। वृक्ष-वनस्पति के प्रति गहरी श्रद्धा व लगाव भारतीय संस्कृति की अति पुरातन व संवेदनशील परंपरा है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख है कि शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, रामायण आदि के प्रणेता ऋषियों ने आरण्यकों की छांव में अपने आश्रम बनाकर देवदुर्लभ अमूल्य ज्ञान को लिपिबद्ध किया था। वैदिक भारत में लोग वनदेवी की नियमित उपासना किया करते थे। स्मृति ग्रथों में वन संपदा को नष्ट करने वालों के लिए कठोरदंड विधान मिलता है। पाराशर मुनि “वट मूले तपोवासा” कहकर वटवृक्ष की उपयोगिता प्रतिपादित करते हुए  कहते हैं कि समूची सृष्टि में एकमात्र वटवृक्ष (बरगद) ही ऐसा है जिसमें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) की समन्वित शक्ति निहित है। अकाल में भी नष्ट न होने के कारण इसे “अक्षय वट” कहा जाता है। स्वयं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) इसकी रक्षा करते हैं। वट वृक्ष की अभ्यर्थना करते हुए वैदिक ऋषि कहते हैं- मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेव च। पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते ।। अर्थात हम उस वट देवता को नमन करते हैं जिसके मूल में चौमुखी ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग में महादेव शिव का वास है। वट वृक्ष की उत्पत्ति यक्षों के राजा मणिभद्र से मानी जाती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने इसकी छाया में बैठकर दीर्घकाल तक तपस्याएं की थीं। अब तो विभिन्न शोधों से भी साबित हो चुका है कि प्रचुर मात्रा में प्राणवायु (आक्सीजन) देने वाला यह वृक्ष मन-मस्तिष्क को स्वस्थ रखने व ध्यान में स्थिरता लाने में सहायक होता है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे परम सत्य का बोध हुआ था।

इसी तरह हिन्दू दर्शन में पीपल के वृक्ष की भी विशेष पूज्य है।  श्रीमद्भगवदगीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “मैं वृक्षों में पीपल हूं।”    ज्योतिष विज्ञानी शनि के प्रकोप से बचने के लिए पीपल के पेड़ की पूजा का विधान बताते हैं। वट और पीपल ही नहीं; हिन्दू संस्कृति में तुलसी, अशोक, नीम, बेल, आम, पलाश, शमी व केला आदि की भी भारी मान्यता है। हरिप्रिया तुलसी की महिमा का तो क्या ही कहना। तुलसीपत्र के बिना पंचामृत पूर्ण ही नहीं हो सकता। इसकी रोग निवारक व पर्यावरण शुद्धि क्षमता वैज्ञानिक प्रयोगों से साबित हो चुकी है। इसी तरह “जो शोक निवारे सो अशोक”। इस वृक्ष की महत्ता बताने के लिए सिर्फ सीता माता का ही उदाहरण काफी है जिन्होंने रावण की स्वर्णनगरी में अशोक वाटिका को अपना आश्रय बनाया था। ज्योतिषीय मान्यता है कि घर में अशोक वृक्ष लगाने से वास्तु दोष समाप्त हो जाता है। नीम के पेड़ की उपयोगिता भी कुछ कम नहीं है। इसे मां दुर्गा का वृक्ष माना जाता है। इस वृक्ष के औषधीय गुणों से हम सब भलीभांति वाकिफ हैं। इसे नीमारी देवी के नाम से भी पुकारा जाता है तथा देवी मंदिर के पास इसका रोपण शुभ माना जाता है। ग्राम्यांचलों में आज भी चेचक निकलने (आम देशज भाषा में माता आने) पर नीम की पत्तियों का उपयोग किया जाता है। शिव प्रिय बिल्व वृक्ष यानी बेल के पेड़ की प्रशस्ति में तो “विल्वाष्टक” स्त्रोत तक रचा जा चुका है। सनातनधर्मियों की प्रगाढ़ आस्था है कि बिल्वपत्र चढ़ाने से भगवान शिव सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं। आम को तो फलों का राजा माना जाता है और इसका पेड़ भी उतना ही पवित्र व उपयोगी है। मांगलिक कार्यों व नवरात्र साधना में कलश स्थापना में आम्र पल्लवों का ही इस्तेमाल होता है। पर्व-त्योहारों घर के प्रवेशद्वार पर आम के पत्तों के बंदनवार सजाए जाते हैं। हवन में भी आम की लकड़ी प्रयुक्त होती है। बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की आराधना के लिए आम के फूलों का इस्तेमाल होता है। ऐसे ही केले के फल व पत्तों का भी विशेष महत्व है। इसे भगवान विष्णु का पेड़ माना जाता है। इसके पत्तों का सत्य नारायण की पूजा में विशेष तौर पर इस्तेमाल होता है। सुख-समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा शुभ मानी जाती है।

सार रूप में कहें तो वृक्ष-वनस्पतियां माँ प्रकृति का ऐसा दिव्य वरदान हैं जो हमें प्राणवायु, हरियाली और फल-फूल देने के साथ सेहत भी देती हैं। न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण वरन ग्रह व वास्तुदोष निवारण में भी इनकी अद्वतीय भूमिका है। समूचे पर्यावरण की सेहत इन्हीं मूक देवताओं की कृपा पर टिकी है। हमारी समूची आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली भी वृक्ष वनस्पतियों पर ही आधारित है। मगर दुर्भाग्यवश आज परिस्थितियां विपरीत हैं। वनों के प्रति प्यार व श्रद्धा चिह्न पूजा मात्र रह गयी है। आइए भूल सुधारें और वट पूजन के इस पावन पर्व पर वृक्ष-वनस्पतियों की महत्ता को सही ढंग से पहचानकर अन्तर्मन से उनको संरक्षित व सम्वर्धित करने का प्रण लें।

Topics: अक्षय वटपर्यावरण संरक्षणIndian Tree Worshipवट सावित्री व्रतसावित्री व्रत की कहानीVat Savitri Vrat 2025Hindu Ecology Traditionसत्यवान सावित्री कथाBanyan Tree Festival Indiaबरगद का पूजनवट पूजा विधिBanyan Tree Significanceव्रत कथाHindu Festivals 2025पीपल पूजा महत्व
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