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सबक लें, ’डंप’ से बचें

अमेरिका के चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद भारत पर चीनी सामान की डंपिंग का खतरा कई गुना बढ़ा है। चीन पहले ही भारतीय उद्योगों को आघात पहुंचा चुका है। इसलिए अमेरिका से सबक लेते हुए भारत को इस दिशा में कड़ी कार्रवाई करनी होगी

Written byRajpal Singh RawatRajpal Singh Rawat
May 14, 2025, 08:32 am IST
inविश्व, विश्लेषण

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 9 अप्रैल, 2025 को 75 देशों पर ‘पारस्परिक टैरिफ’ लगाने की घोषणा की थी, लेकिन एक सप्ताह से भी कम समय में इस पर रोक लगा दी। हालांकि, चीन अपवाद रहा। बीजिंग की जवाबी कार्रवाई के बाद ट्रंप ने उस पर 125 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। व्हाइटहाउस ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने चीन पर वास्तव में कुल 145 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जिसमें 20 प्रतिशत फेंटेनाइल-संबंधित टैरिफ भी शामिल था।

डॉ. अश्वनी महाजन
राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच

ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट‍ किया कि वे चीन पर टैरिफ बढ़ा रहे हैं, क्योंकि उसने दुनिया के बाजारों के प्रति ‘सम्मान की कमी’ दिखाई है। इसमें उन्होंने लिखा था, ‘‘किसी समय, उम्मीद है निकट भविष्य में चीन को यह अहसास होगा कि अमेरिका और अन्य देशों को लूटने के दिन अब टिकाऊ या स्वीकार्य नहीं हैं।’’ हालांकि, अभी तक भारत सहित किसी भी देश ने चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ाया है। लेकिन अधिकतर देश चीन द्वारा की जा रही डंपिंग से चिंतित हैं, क्योंकि यह उनके घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचा रही है।

व्यापार की दृष्टि से डंपिंग का अर्थ है- कम कीमत पर सामान बेचना। ऐसा तब होता है, जब कोई देश या कंपनी किसी उत्पाद को विदेशी बाजार में अपने देश की तुलना में कम कीमत पर निर्यात करती है। डंपिंग को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का दुरुपयोग माना जाता है। अमेरिका के अपने दरवाजे बंद करने के बाद डर यह है कि चीन और भी आक्रामक तरीके से डंपिंग करेगा और अन्य बाजारों को भर देगा। भारत को विशेष तौर पर इस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।

चीन को भारत का जवाब

चीन ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हथियार के रूप में डंपिंग की कला में महारत हासिल कर ली है। उसका उद्देश्य आयातक देशों के घरेलू उद्योग को खत्म करना है। जब कोई देश चीनी सामग्री पर निर्भर हो जाता है, तो उसका शोषण शुरू हो जाता है। सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) का मामला चीनी डंपिंग और शोषण का एक जीवंत उदाहरण है। 2004 के बाद पेनिसिलिन जी और फोलिक एसिड सहित कई एपीआई भारतीय बाजार में बेहद कम कीमतों पर डंप किए गए। इस वजह से जब भारतीय उत्पादन में भारी कमी आई, तो शोषण का खेल शुरू हो गया। चीन ने उन्हीं सामग्रियों को 4 से 15 गुना अधिक कीमत पर बेचना शुरू किया। ऐसा करके उसने न केवल भारत के एपीआई उद्योग को नुकसान पहुंचाया, बल्कि देश की स्वास्थ्य सुरक्षा को भी खतरे में डाल दिया। इसके बाद भारत ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया और कुछ एपीआई पर डंपिंग रोधी शुल्क लगाया।

अभी मार्च 2025 में भारत ने अपने घरेलू उद्योगों को डंपिंग से बचाने के लिए 5 चीनी सामग्री-सॉफ्ट फेराइट कोर, वैक्यूम-इंसुलेटेड फ्लास्क की एक श्रेणी, एल्युमिनियम फॉयल, ट्राइक्लोरो आइसोसायन्यूरिक एसिड और पॉली विनाइल क्लोराइड पेस्ट रेजिन पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया। ये शुल्क 89 से 1,732 डॉलर प्रतिटन तक हैं। अधिकांश सामाने पर ये शुल्क पांच वर्ष के लिए हैं। एल्युमिनियम फॉयल पर छह महीने का अस्थायी शुल्क लगाया गया था। इससे पहले, 2024 में ही व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) द्वारा दायर एंटी-डंपिंग जांच में से 79 प्रतिशत चीनी उत्पादकों के खिलाफ थीं। डीजीटीआर भारत में व्यापार उपायों की जांच करने और सिफारिश करने के लिए जिम्मेदार शीर्ष निकाय है, जिसमें एंटी-डंपिंग शुल्क भी शामिल है।

अमेरिका और राह कठिन

चीनी डंपिंग के बारे में कुछ भी नया नहीं है, लेकिन ट्रंप द्वारा चीन पर टैरिफ बढ़ाने के बाद खतरा कई गुना बढ़ गया है। भारी-भरकम टैरिफ के कारण चीन के लिए अमेरिकी बाजार में आसानी से निर्यात करना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए उसे अपने उत्पादों को दूसरे देशों में डंप करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। चीन के पास अत्यधिक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है, जिसके कारण अधिशेष पैदा हो रहा है, जिसे उसे बेचना होगा। कुछ बाजारों में अपना सामान बेचने में असमर्थता के कारण चीन को वही सामग्री कहीं और डंप करनी पड़ती है। चीन का ध्यान हमेशा निर्यात-संचालित विकास पर रहा है, जिसे चीनी सरकार का समर्थन प्राप्त है। दूसरे, चीनी कंपनियों को सब्सिडी और अन्य सरकारी सहायता मिलती है, जिससे वे कृत्रिम रूप से कम कीमत पर उत्पादों का विपणन कर पाती हैं। इसमें संदेह नहीं है कि ऐसी सब्सिडी बाजार की कीमतों को विकृत करती है और अनुचित प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। तीसरा, व्यापार तनाव ने वैकल्पिक बाजारों को नियंत्रित करने के चीन के अभियान को मजबूत किया है।

चीनी डंपिंग को लेकर आशंकाएं निराधार नहीं हैं। भारत ने पहले ही न केवल एपीआई, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और खिलौनों के विनिर्माण पर इसके हानिकारक प्रभावों को महसूस किया है। भारत सरकार का कहना है कि वह स्थिति पर कड़ी निगाह रखे हुए है, लेकिन उद्योग चीन द्वारा डंपिंग के बढ़ते प्रयासों से चिंतित हैं। ध्यातव्य कि अमेरिका लंबे समय से चीनी आयात पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रहा है। ट्रंप के शासन में ये प्रयास और तेज हो गए हैं, जिससे चीन के लिए अपने निर्यात को फिर से दिशा देने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

अमेरिकी संसद में इस बाबत दो विधेयक पेश किए गए हैं। इनमें से एक है-न तो स्थायी और न ही सामान्य व्यापार संबंध अधिनियम, जो चीन की विशेष व्यापार स्थिति को रद करके प्रत्यक्ष चीनी आयात को प्रतिबंधित करने पर केंद्रित है। दूसरा है, एक्सिंग नॉन-मार्केट टैरिफ इवेजन एक्ट (एएनटीई एक्ट), जो वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में चीनी स्वामित्व वाली फैक्ट्रियों से आने वाले सामान पर प्रतिबंध लगाएगा। इन प्रस्तावित कानूनों के माध्यम से अमेरिका उन सभी संभावित चैनलों को बंद करने की कोशिश कर रहा है, जिनके माध्यम से चीन अमेरिका में अपने उत्पाद बेचने की कोशिश कर सकता है।

और सजग रहने की जरूरत

लंबे समय से चीन से आयात भारत की विनिर्माण यात्रा को प्रभावित कर रहा है। 1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद में 19.6 प्रतिशत योगदान देने वाला यह क्षेत्र 2023-24 में घटकर 14.27 प्रतिशत रह गया। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां भारत ने डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत व्यापार उपायों का इस्तेमाल किया है, जिसमें एंटी-डंपिंग शुल्क और सुरक्षा उपाय शामिल हैं। इसके बावजूद चीनी आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में अप्रैल से फरवरी के बीच चीन से भारत का आयात एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में 10.4 प्रतिशत बढ़कर 103.7 बिलियन डॉलर हो गया। इस बीच, चीन को निर्यात 15.7 प्रतिशत घटकर 12.7 बिलियन डॉलर रह गया।

डीजीटीआर द्वारा अनुशंसित एंटी-डंपिंग उपायों की लंबी सूची के बावजूद चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। चूंकि भारत दुनिया के लिए एक विनिर्माण केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है, इसलिए वह चीन से डंपिंग के किसी भी नए दौर को बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह आत्मनिर्भर भारत के सपने को खतरे में डाल सकता है। हमें चीन को भारतीय बाजारों में अपने माल को डंप करने के अनैतिक और अवैध तरीकों को रोकने के लिए अपनी प्रशासनिक मशीनरी को मजबूत और सुव्यवस्थित करना होगा।

जब भी भारत ने एंटी-डंपिंग शुल्क या कोई अन्य सुरक्षा उपाय लागू किया है, चीन ने उसकी काट निकाली है। इसमें ‘उत्पाद संशोधन’ शामिल है, जिसमें कंपनियां एंटी-डंपिंग शुल्क से बचने के लिए उत्पादों में मामूली बदलाव करती हैं। नए उत्पादक, जो प्रतिबंधित चीनी उत्पादकों का स्थान ले लेते हैं। अवशोषण, जिसमें निर्यातक बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए शुल्क लागत को वहन करते हैं और धोखाधड़ी, जिसमें कंपनियां माल की उत्पत्ति या विशेषताओं की गलत घोषणा करती हैं।

साथ ही, चीन अपने माल को आसियान और अन्य देशों के माध्यम से सफलतापूर्वक भेज रहा है। एंटी-डंपिंग प्रयासों को विफल करने के लिए चीन ने अपने कारखानों को अन्य देशों में स्थानांतरित कर दिया है और अब उनके माध्यम से माल की आपूर्ति कर रहा है। हम अमेरिका के नए प्रस्तावित कानूनों से सीख ले सकते हैं, जो न केवल चीन से आने वाले चीनी सामान पर, बल्कि चीन के बाहर चीनी कारखानों द्वारा उत्पादित सामान पर भी अंकुश लगाने का प्रयास करते हैं।

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