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पाकिस्तान की आतंकी रणनीति बेनकाब

पहलगाम नरसंहार से आतंकियों के साथ पाकिस्तान का सैन्य-खुफिया गठजोड़ उजागर हुआ। पर्यटकों पर हमला समाज में खौफ पैदा करने, इसे बांटने और रक्तपात के ऐतिहासिक चक्रव्यूह का हिस्सा

Written byअजमल शाहअजमल शाह
Apr 28, 2025, 03:24 pm IST
inविश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर

पहलगाम की बैसरन घाटी में हुआ आतंकवादी हमला हाल की आतंकी घटनाओं में सबसे बर्बर है। जम्मू-कश्मीर में होने वाली आतंकी घटनाएं आतंकी संगठनों और पाकिस्तान के सैन्य-खुफिया गठजोड़ का परिणाम है। छद्म युद्ध की पाकिस्तानी रणनीति वर्षों से भारत को अस्थिर करने में जुटी है। टीआरएफ उसका सबसे नया और घातक हथियार है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर का हालिया बयान एक सुनियोजित षड्षंत्र का एक हिस्सा है। जब भी पाकिस्तानी नेता, सेना के जनरल या सैन्य अधिकारियों ने कश्मीर पर अपनी बयानबाजी तेज की है, वह आतंकी हमलों के रूप में ही सामने आयी है।

चाहे संयुक्त राष्ट्र में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का भाषण हो या कश्मीरियों के हित का दावा करने वाले जनरल मुनीर के हालिया विष भरे बोल, उनमें कश्मीरी संस्कृति और कश्मीर के लोगों के प्रति भाईचारे की भावना नहीं, बल्कि उनकी सैन्य-खुफिया एजेंसियों के सुनियोजित आतंकी कुकृत्यों को छिपाने के लिए पहना हुआ एक कूटनीतिक नकाब होता है। पाकिस्तान बार-बार कश्मीरियों के लिए ‘नैतिक और कूटनीतिक समर्थन’ की बात करता है, जो वास्तव में शतरंज की एक घातक चाल होती है। इसकी आड़ में वह जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देता आ रहा है।

2019 में पुलवामा आतंकी हमला, जिसमें 40 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए, 2024 का रियासी बस नरसंहार, जिसमें 10 तीर्थयात्री मारे गए और अब पहलगाम में हिंदुओं की नृशंस हत्या, सभी पाकिस्तान की कपटी मंशा से जन्मे हैं। रावलपिंडी या इस्लामाबाद की हर भड़काऊ बयानबाजी कश्मीर के वातावरण में विष घोल देती है और हिंसा के लिए आमादा स्थानीय लोग उग्र हो जाते हैं। बयानबाजी और आतंक का यह चक्र पाकिस्तान की दोहरी नीति को उजागर करता है।

एक तरफ वह कश्मीरियों की आकांक्षाओं और सरोकारों के प्रति चिंता और उन्हें समर्थन देने का नाटक करता है, दूसरी तरफ उसके आतंकी कश्मीरियों, पर्यटकों और अल्पसंख्यकों का बेरहमी से कत्ल करते हैं। पाकिस्तान ने वैश्विक मंच पर हमेशा शब्दों की आड़ में अपने कुरूप और आतंकी चेहरे को छिपाने का प्रयास किया है और वह भारत को अस्थिर करने की किसी भी साजिश से इनकार करता रहा है। जनरल मुनीर की बयानबाजी और पहलगाम आतंकी हमले के बीच का संबंध आईएसआई की साजिश की ओर इशारा करता है।

पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने दिया हमले का आदेश

पहलगाम नरसंहार में पाकिस्तान के इशारे पर हुआ है। पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार आदिल राजा ने यह दावा किया है। आदिल का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए नरसंहार के पीछे पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का हाथ है। इसके पीछे वजह अपनी कुर्सी (जनरल का पद) बचाना है। आदिल के मुताबिक मुनीर ने पहले विदेशी पाकिस्तानियों को बुलाकर भड़काऊ बयान दिया और फिर इस तरह का हमला करवाया। मुनीर के इस गलती का खामियाजा सारे पाकिस्तानी भुगतेंगे। शहबाज तुरंत मुनीर को हटाएं, नहीं तो मामला और बिगड़ेगा।आदिल ने एक्स पर लिखा है, ‘’मुनीर ने खुद इस हमले को अंजाम देने के आदेश दिए थे, ताकि अपने खिलाफ चल रही आलोचनाओं और जांचों से ध्यान भटकाया जा सके। यह हमला जानबूझकर, सुनियोजित और मजहबी कट्टरता से प्रेरित था।’’ पाकिस्तानी पत्रकार ने आगे लिखा है, “पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के वरिष्ठ सूत्रों ने पुष्टि की है कि सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने आईएसआई को कश्मीर के पहलगाम में घटना को अंजाम देने का आदेश दिया था। मुझे पता है कि यह जानकारी साझा करने के लिए भारतीय एजेंट कहलाएंगे, लेकिन यह एक तथ्य है। आसिम मुनीर का हिसाब कौन देगा? विशेष रूप से एक ऐसी प्रणाली में जहां वह सुपर किंग है! हमें अतीत की तरह मनगढ़ंत कहानियों को लेकर सावधान रहना चाहिए। जरूरत पड़े तो आसिम मुनीर को हटा दो, क्योंकि जिनकी मानसिक स्थिति संदिग्ध हो उनकी जरूरत नहीं। बड़े लश्कर में ऐसे लोग चाहिए। नेतृत्व इनके हाथ में नहीं होना चाहिए, अन्यथा महाविपत्ति तय है।”

टीआरएफ : पाकिस्तान का नया हथियार

आज वह टीआरएफ का नकाब ओह, आतंक फैला रहा है। अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के तुरंत बाद 2019 में टीआरएफ का गठन हुआ जो ऊपरी तौर पर कश्मीरियों के हित के लिए लड़ने का दावा करता था। लेकिन उसका मंसूबा वास्तव में कश्मीर में आतंक फैलाना था। यह 2008 में मुंबई हमलों के लिए कुख्यात पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का एक मुखौटा है, जिसे गृह मंत्रालय ने 2023 में आतंकी संगठन घोषित किया था। इसे पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ छद्म युद्ध जारी रखने के लिए खड़ा किया है। यह बात जांच में सामने आ चुकी है।

लश्कर को यह नया नाम देना पाकिस्तान के डीप स्टेट की मजबूरी थी। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय जांच-पड़ताल से बचना था, विशेष रूप से वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) से, जिसने पाकिस्तान को आतंकियों का वित्तपोषण करने पर काली सूची में डालने की धमकी दी थी। टीआरएफ का संस्थापक कुख्यात आतंकवादी शेख सज्जाद गुल है, जो लश्कर का आतंकी है। उसने कश्मीर में आतंकी हमलों की योजनाएं तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई है। एक अन्य आतंकी साजिद जट्ट उर्फ साजिद डार भी लश्कर कमांडर है, जिसे पाकिस्तान के विशेष सेवा समूह (एसएसजी) ने गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया है। वह 2020 की शुरुआत से ही टीआरएफ के अभियानों में शामिल रहा है।

सीमा पार से घुसपैठ और बड़े हमलों का व्यूह रचने में सिद्धहस्त जट्ट की मौजूदगी दर्शाती है कि टीआरएफ लश्कर के अनुभवी गुर्गों पर कितना निर्भर है। टीआरएफ का वित्तपोषण करने वाली संस्थाएं, उसके हमले के तरीके और प्रचार में लश्कर की कार्यशैली की स्पष्ट झलक दिखती है। यह आईएसआई समर्थित नेटवर्क और पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर स्थित लश्कर के बुनियादी ढांचे पर निर्भर है।

…ताकि खाैफ कायम रहे

पहलगाम में पर्यटकों पर हमला समाज में भय पैदा करने, इसे बांटने और रक्तपात के ऐतिहासिक चक्रव्यूह का हिस्सा है। टीआरएफ ने जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से नागरिकों को निशाना बनाया है, ताकि लोगों के मन में आतंकियों का खौफ बना रहे। दूसरी तरफ इस आतंकी संगठन ने कश्मीर में शांति के लिए किए जा रहे राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रयासों को बाधित करने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया। जून 2020 में टीआरएफ ने बड़गाम में एक कश्मीरी पंडित सरपंच अजय पंडिता भारती की हत्या कर दी थी, ताकि अल्पसंख्यक हिंदुओं के मन में खाैफ बना रहे और वे घाटी में वापस न लाैटें। इसी मंशा से जुलाई में बांदीपोरा में भाजपा नेता शेख वसीम बारी, उनके पिता और भाई की हत्या की गई। उसने सितंबर 2020 में कश्मीरी वकील बाबर कादरी को गोली मारकर हत्या कर वकीलों और बुद्धिजीवियों को डराने की कोशिश की। इसी तरह, अक्तूबर 2021 में सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करने की मंशा से टीआरएफ ने श्रीनगर में एक कश्मीरी पंडित व्यवसायी माखन लाल बिंद्रो और दो गैर-मुस्लिम शिक्षकों (हिंदू व सिख) को मार दिया।

पहलगाम हमला हिन्दू नरसंहार है

टीआरएफ ने अल्पसंख्यकों के पुनर्वास को रोकने के लिए फरवरी 2023 में पुलवामा में एक अन्य कश्मीरी पंडित संजय शर्मा की हत्या कर दी। जून 2024 में रियासी में हिंदू तीर्थयात्रियों को ले जा रही एक बस पर हमला किया, जिसमें 10 लोग मारे गए और 33 घायल हो गए। यह हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के समय धार्मिक पर्यटन को बाधित करने और सांप्रदायिक तनाव भड़काने की मंशा से किया गया था। इसके बाद अक्तूबर 2024 में ‘गैर-स्थानीय लोगों’ की बस्ती के विरोध की आड़ में कमजोर श्रमिकों को निशाना बनाने और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से गांदरबल निर्माण स्थल पर एक कश्मीरी डॉक्टर और छह प्रवासी मजदूरों सहित सात श्रमिकों की हत्या कर दी गई। दर्जनों नागरिकों की जान लेने वाले इन हमलों ने परिवारों को तोड़ दिया है। लश्कर-ए-तैयबा प्रेरित रणनीति का अनुसरण कर टीआरएफ का मूल लक्ष्य विभिन्न समुदायों के बीच अलगाव पैदा करना, सामान्य स्थिति की ओर बढ़ते वातावरण को विषाक्त करना और सामाजिक सौहार्द को नष्ट करना है।

जिहाही जड़ों को काटना ही होगा

फाैज का प्रशिक्षण

आईएसआई समर्थित लश्कर-ए-तैयबा 1980 के दशक में अस्तित्व में आया। यह पाकिस्तान के सैन्य-खुफिया समूह के संरक्षण में काम करता है। इसके सरगना हाफिज सईद को पाकिस्तान दोषी तो ठहराता है, पर उसे सजा नहीं देता। लश्कर पीओजेके से अपनी गतिविधियां और प्रशिक्षण शिविर चलाता है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय खुफिया संस्थाओं की मानें तो पाकिस्तान इस्लामी एनजीओ और इंग्लैंड व खाड़ी में रहने वाले प्रवासियों और आईएसआई से आर्थिक सहायता हासिल कर लश्कर-ए-तैयबा को देता है। पहलगाम सहित टीआरएफ के सभी हमले सीमा पार आईएसआई प्रायोजित तस्करी के हथियारों से अंजाम दिए गए हैं। इन आतंकी गुटों को पाकिस्तान की सेना प्रशिक्षण देती है, जिसमें एसएसजी के प्रशिक्षक टीआरएफ के आतंकियों को विस्फोटकों के इस्तेमाल, जंगल युद्ध और गुरिल्ला युद्ध की तकनीक सिखाते हैं।

आईएसआई के आतंकी प्रश्रय का इतिहास लश्कर-ए-तैयबा से लेकर जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों तक फैला है। वैश्विक मंच पर अपने लिए सकारात्मक धारणाएं तैयार करने के लिए पाकिस्तान का डीप स्टेट अपने आतंकियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताता है। यही नहीं, पाकिस्तान कूटनीति के जरिए एफएटीएफ की शर्तों के अनुपालन में देरी कर और टीआरएफ जैसे ‘स्वदेशी’ समूहों पर दोष मढ़कर लश्कर-ए-तैयबा को बचाता रहा है। इसी आड़ में वह भारत पर होने वाले आतंकी हमलों में अपनी संलिप्तता से मुकरते हुए छद्म युद्ध को बरकरार रखता है। पहलगाम नरसंहार उसी का हालिया उदाहरण है। आतंकियों द्वारा गैर-मुसलमानों को निशाना बनाना उस विकृत विचारधारा को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य सांप्रदायिक विभाजन को गहरा करना और समुदायों को आतंंकित करना है।

जंगल का फायदा उठाते आतंकी

अनंतनाग जिले में देवदार के घने जंगलों और पीर पंजाल पर्वतमाला से घिरे पहलगाम का अपूर्व सौंदर्य जहां पर्यटकों को आकर्षित करता है, वहीं आतंकवादियों के छिपने का ठिकाना भी बन जाता है। तलहटी में स्थित पहलगाम के जंगल वाले रास्ते शोपियां, कुलगाम और राजौरी को जोड़ते हैं। अनुच्छेद-370 की समाप्ति के बाद कश्मीरी जनता शांति, आर्थिक विकास, पर्यटन और स्थिरता की ओर बढ़ रही है। आज आतंकी समूहों द्वारा स्थानीय युवाओं को फुसला कर अपने गुट में भर्ती करना उतना आसान नहीं रहा, क्योंकि स्थानीय लोग आतंकवाद के खात्मे के लिए सुरक्षा बलों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं। लिहाजा, टीआरएफ की निर्भरता एसएसजी द्वारा जंगल युद्ध में प्रशिक्षित पाकिस्तानी आतंकियों पर बढ़ने लगी है।

कश्मीरियत का कत्ल

टीआरएफ के आतंकी जंगल में छिपकर निगरानी करते हैं और मौका मिलते ही हमला करते हैं। पहलगाम हमले में ऐसा ही हुआ। आतंकी संभवतः राजौरी से घुसे और शोपियां व कुलगाम के घने जंगल का फायदा उठाते हुए अनंतनाग पहुंचे। ये जंगल इतने घने और विस्तृत हैं कि हवाई निगरानी और जमीनी अभियान संभव नहीं हैं। इन जंगलों में आतंकियों की तलाशी के लिए अधिक जनशक्ति और तकनीक की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि 2023 के कोकरनाग मुठभेड़ में टीआरएफ के आतंकी कई दिनों तक पकड़े नहीं जा सके थे। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, यूरोपीय संघ, इस्राएल, यूएई सहित दुनिया के सभी देश भारत के साथ खड़े हैं। इस क्रूर आतंकी हमले पर पूरा विश्व आक्रोश से भर उठा है। न्याय और मजबूत आतंकवाद विरोधी उपायों की मांग उठ रही है।

टीआरएफ के आतंकियों को मारना काफी नहीं होगा, भारत को उसकी जड़ पर प्रहार करना होगा। लश्कर और टीआरएफ के लिए पीओजेके लॉन्च पैड बन गया है। इसलिए इस क्षेत्र से पाकिस्तान का अवैध कब्जा हटाने पर विचार करने का समय आ चुका है। अब निर्णय की जरूरत है, चाहे वह कूटनीतिक हो या आर्थिक। आवश्यकता पड़े तो सैन्य बल का इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए। भारत 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक या 2019 में पुलवामा के बाद आईएसआई की मशीनरी को नष्ट करने के लिए आतंकी शिविरों पर किए गए हवाई हमलों की तर्ज पर पीओजेके में चल रहे आतंकी ढांचे को खत्म करने का प्रयास कर सकता है।

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