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विरोध के बाद ‘एम्पुरान’ पर कैंची चली

मोहनलाल और पृथ्वी सुकुमारन की फिल्म ‘एल 2 एम्पुरान’ काट-छांट के बाद परदे पर आई। फिल्म में हिंदुओं को कट्टर, आतंकवादी और दंगाई के रूप में चित्रित किया गया था। हिंदू संगठनों के विरोध पर निर्माताओं को करने पड़े बदलाव

Written byटी. सतीशनटी. सतीशन
Apr 8, 2025, 08:40 am IST
inभारत, विश्लेषण, केरल

केरल में अभिनेता मोहनलाल अभिनीत और पृथ्वी सुकुमारन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘एल 2 एम्पुरान’ के विवादों में फंसने के बाद निर्माताओं को 24 दृश्यों में काट-छांट करनी पड़ी। पहले 17 दृश्य काटने की बात कही गई थी। हिंदू संगठनों के कडे़ विरोध के बाद फिल्म निर्माताओं ने कुछ दृश्यों और संवादों में बदलाव की मांग करते हुए सेंसर बोर्ड का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद इसमें संपादन हुआ। फिल्म में काट-छांट और संवादों में बदलावों के अलावा, केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने ‘धन्यवाद कार्ड’ से भी अपना नाम हटाने के लिए कहा था, उसका भी पालन किया गया है। साथ ही, ज्योति मोहन आईआरएस को धन्यवाद देने का श्रेय भी हटा दिया गया है। संपादित फिल्म गत 1 अप्रैल को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई। सुरेश गोपी ने कहा कि नए बदलाव फिल्म के निर्माताओं ने ही किए हैं।
मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल अभिनीत फिल्म ‘एल 2 एम्पुरान’ 27 मार्च, 2025 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी। यह 2019 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘लूसिफर’ का सीक्वल है। दोनों ही फिल्मों का निर्देशन पृथ्वीराज सुकुमारन ने किया है।

हिंदू संगठनों का कहना है कि यह फिल्म राष्ट्र विरोधी भावनाएं फैलाने के साथ समाज को बांटने की कोशिश कर ही थी। इसमें हिंदुओं को कट्टर, आतंकवादी और दंगाई के रूप में चित्रित किया गया था। गुजरात दंगों को विकृत रूप में दिखाया गया था, लेकिन गोधरा ट्रेन हत्याकांड की चर्चा तक नहीं की गई थी। नानावटी आयोग की रिपोर्ट को भी नजरअंदाज किया गया। बहरहाल, जब विवाद और विरोध बढ़ा, तो फिल्म के पैरोकारों के एक वर्ग ने बयान दिया कि फिल्म की पटकथा पूरी होने के बाद इसे 2022 में ही निर्देशक को सौंप दिया गया था। लेकिन मोहनलाल, गोकुलम गोपालन (फिल्म के वित्तपोषकों में से एक), कहानीकार व पटकथा लेखक मुरली गोपी को इसमें किए गए गंभीर बदलावों को लेकर अंधेरे में रखा गया। लेकिन हिंदू संगठन और आमजन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि परदे के पीछे बैठे लोगों का उद्देश्य पैसा कमाना है। मोहनलाल जैसे बड़े अभिनेता पूरी पटकथा पढ़े बिना फिल्म साइन ही नहीं कर सकते। गोकुलम गोपालन जैसे चतुर व्यवसायी पूरी कहानी और पटकथा जाने बिना किसी फिल्म में पैसा लगा ही नहीं सकते हैं।

लंबे समय से नकारात्मक रुख

एम्पुरान के विरोध के बीच, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता जॉन डिट्टो ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि जब उन्होंने 2005 में ‘एम्पुरान’ के निर्देशक पृथ्वीराज सुकुमारन से आपातकाल के दिनों (1975-1977) में राजन हत्याकांड पर एक पटकथा के साथ संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि वह केवल तभी काम करेंगे, जब निर्देशक पटकथा बदलेंगे। राजन इंजीनियरिंग का छात्र था, जिसकी पुलिस यातना के कारण मौत हो गई थी।

आज तक उसके शव का पता नहीं चला। जाहिर तौर पर पटकथा के अनुसार राजन को फिल्म का नायक होना चाहिए था। लेकिन पृथ्वीराज को माओवादी नेता की भूमिका ऑफर की गई थी। वह चाहते थे कि निर्देशक माओवादी को फिल्म का नायक बनाकर पटकथा फिर से लिखें। लेकिन जॉन डिट्टो ने पटकथा में बदलाव करने से इनकार कर दिया तो दूसरे अभिनेता को इस भूमिका के लिए चुना गया। जॉन का कहना है कि पृथ्वीराज को ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की आदत लंबे समय से है। वह कहते हैं, ‘अगर मैंने पृथ्वीराज की सनक और कल्पनाओं के अनुसार समझौता किया होता, तो मैं एक ब्लॉकबस्टर फिल्म बना सकता था, लेकिन मैंने इतिहास के साथ न्याय करना पसंद किया। वे ऐतिहासिक तथ्यों का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते हैं।’

ये बदलाव किए गए

  • फिल्म में 2.08 मिनट के दृश्य संपादित किए गए हैं-
  •  खलनायक का नाम बजरंगी से बदलकर बलदेव किया गया।
  •  हिंदुओं द्वारा महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न वाले दृश्य हटाए।
  • दीवार पर महिला का सिर पटकने का दृश्य हटाया गया।
  •  राष्ट्रीय ध्वज के रंग को लेकर संवाद हटा।
  •  कहानी के समय का सुझाव देने वाले क्रेडिट को बदल कर “कुछ साल पहले” किया गया।
  •  मोहसिन की हत्या का दृश्य बदला गया।
  •  धार्मिक केंद्रों के सामने ट्रैक्टरों और वाहनों के आवागमन वाले दृश्य हटाए।
  •  बलदेव और पीतांबरन जैसे पात्रों के दृश्य पर भी कैंची चली।
  • कार से एनआईए का नामपट्ट हटाया गया।
  •  टीवी समाचार वाले दृश्य भी हटाए गए।
  •  मसूद व सईद मसूद, बलदेव व मुन्ना के बीच संवाद भी हटे।

वामपंथियों और इस्लामिस्टों का खौफ

दरअसल, केरल में फिल्म और मीडिया पर वामपंथियों और इस्लामिस्टों का नियंत्रण है। इसलिए वे अपने ‘आकाओं’ को खुश करने के लिए तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने और झूठ फैलाने से गुरेज नहीं करते। फिल्म ‘एम्पुरान’ में दिल्ली के नागरिक संशोधन विधेयक विरोधी आंदोलन का एक दृश्य था। इसमें टीवी रिपोर्टर बता रहा था कि उसके पीछे एक मस्जिद जल रही है।

इस बीच, एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्माता मोइदु थजाथु द्वारा निर्देशित ‘टीपी 51’ भी चर्चा में है, क्योंकि उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर माकपा के दोहरे मापदंड का मजाक उड़ाया है। यह फिल्म कोझिकोड जिले के एक वरिष्ठ माकपा कॉमरेड टीपी चंद्रशेखरन के जीवन पर आधारित है, जिनकी 4 मई, 2012 को माकपा के गुंडों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी। माकपा के लोगों ने फिल्म की स्क्रीनिंग में बाधा डाली और निर्देशक को जान से मारने की धमकी भी दी।

इसके बावजूद, फिल्म प्रदर्शक संघ ने राज्य के 69 सिनेमाघरों में फिल्म की स्क्रीनिंग का आश्वासन दिया था। लेकिन सिनेमाघरों के मालिकों को बम से उड़ाने की धमकी मिली तो वे पीछे हट गए। मोइदु फिल्म की शूटिंग से जुड़ी एक घटना के बारे में बताते हैं, ‘‘चंद्रशेखरन का हत्यारोपी कोडी सुनी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत था। शूटिंग के दौरान कुछ लोग बिना नंबर प्लेट वाली लगभग 20 कारों में आए और मुझे धमकाया। मुझे शूटिंग रोकनी पड़ी, जबकि वहां पुलिस भी मौजूद थी। उस समय राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सरकार थी और कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला गृह मंत्री थे।’’ नतीजा, धमकी के कारण 28 कलाकारों ने फिल्म से हाथ खींच लिया। बाद में कैमरामैन, तकनीशियन और मेकअप मैन जैसे क्रू मेंबर्स भी पीछे हट गए।

जब उन्हें धमकियां मिल रही थीं, तब मोइदु कन्नूर में एक अपार्टमेंट में रहते थे। वह आगे कहते हैं, ‘‘आज तक मुझे कोई भी फीचर फिल्म या विज्ञापन फिल्म बनाने की आजादी नहीं है। ‘टीपी 51’ के निर्माता को भी मैदान में खड़े होने की इजाजत नहीं दी जाएगी।’’ उन्होंने कहा कि एक दिन वह अपनी फिल्म ‘टीपी 51’ को केरल के दर्शकों और आम जनता के सामने लाएंगे, जिसमें मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को एक आरोपी के रूप में दिखाया गया है। मोइदु कुछ वर्ष पहले कांग्रेस में थे। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी कि कांग्रेस ने उनके साथ ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ जैसा व्यवहार किया।

कांग्रेस, वामपंथी और इस्लामी ताकतों ने गुजरात दंगे को ‘मुसलमानों का नरसंहार’ साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। देश भर में हिंदुओं और भाजपा के विरुद्ध नैरेटिव गढ़े थे, आज वही शक्तियां ‘एम्पुरान’ का समर्थन कर रही हैं। कांग्रेस, वामपंथी और जिहादी ताकतें मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए फिल्म के विरोध को ‘फासीवादी’ साबित करने के लिए दुष्प्रचार कर रही हैं। लेकिन जन विरोध के आगे प्रोपेगेंडा तिकड़ी बेबस दिखी। नतीजा, फिल्म में अपमानजनक संवादों के साथ निर्माताओं को 24 दृश्यों पर कैंची चलानी पड़ी।

Topics: नानावटी आयोग की रिपोर्टगोधरा ट्रेन हत्याकांड की चर्चाआतंकवादी और दंगाईपृथ्वीराज को माओवादी नेतावामपंथी और इस्लामी ताकहिंदू संगठनपाञ्चजन्य विशेषएल 2 एम्पुरानलूसिफर
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