रानी अवंतीबाई लोधी: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला बलिदानी और वीरांगना 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला बलिदानी और वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी
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रानी अवंतीबाई लोधी: 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला बलिदानी और वीरांगना

रानी अवंती बाई, जिला मंडला क्षेत्रांतर्गत रामगढ़ की रानी थी, जो जबलपुर कमिश्नरी के अंतर्गत था।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Mar 19, 2025, 05:36 pm IST
inभारत
रानी अवंतीबाई लोधी

रानी अवंतीबाई लोधी

सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संपूर्ण भारत में किसी भी देशी राजघराने से “स्वदेश” के लिए प्रथम महिला बलिदान 20 मार्च 1858 को वीरांगना क्षत्राणी, रानी अवंतीबाई लोधी का रहा है। उल्लेखनीय है कि सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब की दत्तक पुत्री वीरांगना मैना बाई का बलिदान 13 वर्ष की आयु में 3 सितंबर 1857 को हुआ था,जब अंग्रेजों ने उन्हें पेड़ से बाँध के जला दिया था, परंतु वे प्रथम बाल बलिदानी के रुप में दर्ज हैं, इसलिए प्रथम महिला बलिदानी रानी अवंती बाई को माना गया है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान 18 जून 1858 को और बेगम हजरत महल की मृत्यु 7 अप्रैल 1879 को हुई थी। अतः यह स्पष्ट है कि रानी अवंती बाई देश में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला सेनानी थी, जिन्होंने 26 वर्ष की आयु में युद्ध लड़ते हुए स्वदेश के लिए आत्मोत्सर्ग कर अपनी पूर्णाहुति दी।

रानी अवंती बाई, जिला मंडला क्षेत्रांतर्गत रामगढ़ की रानी थी, जो जबलपुर कमिश्नरी के अंतर्गत था। रामगढ़ रियासत के संस्थापक गोंड साम्राज्य के वीर सेनापति मोहन सिंह लोधी थे। रियासत में 681 गांव और सीमाएं अमरकंटक, सुहागपुर, कबीर चौंतरा, घुघरी, भुआ – बिछिया, रामनगर तक थीं।

सन् 1817 से सन् 1851 तक रामगढ़ राज्य के शासक लक्ष्मण सिंह थे। उनके निधन के बाद विक्रमजीत सिंह ने राजगद्दी संभाली उनका विवाह किशोरावस्था में ही मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह की रुपसी कन्या अवंतीबाई से हुआ था। विक्रमजीत सिंह बचपन से ही वीतरागी प्रवृत्ति के थे। अतः राज्य के संचालन का काम उनकी पत्नी रानी अवंती बाई ही करती रहीं। उनके दो पुत्र अमान सिंह और शेर सिंह हुए। अंग्रेजों ने सन् 1818 तक मंडला को हस्तगत कर लिया था अब उनकी कुदृष्टि रामगढ़ की रियासत की ओर थी।

वीरांगना रानी अवंतीबाई का जन्म 16 अगस्त सन् 1831 को ग्राम – मनकेहणी, जिला – सिवनी, के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था। बाल्यकाल से ही रानी दुर्गावती उनकी आदर्श बन गई थीं। नियति भी साथ दे रही थी, रानी अवंती बाई ने तलवारबाजी और घुड़सवारी में दक्षता प्राप्त कर ली थी।

वीरांगना रानी अवंती बाई ने तत्कालीन समय के जाने-माने मालवा के पिंडारी तलवारबाज कादर बक्श को एकल द्वंद्व युद्ध में पराजित कर दिया था, तभी से उनके शौर्य और साहस के किस्से फैलने लगे थे। इसलिए रामगढ़ रियासत से विवाह का प्रस्ताव आया था और स्वीकृत भी कर लिया गया था। विक्रमजीत वीतरागी थे, इसलिए प्रशासन की बागडोर रानी अवंतीबाई के हाथों में आ गई थी।
रानी के प्रशासकीय सुधारों से लोकप्रियता बढ़ने लगी थी।

बरतानिया सरकार को नागवार गुजरा इसलिए राज्य हड़प नीति के अंतर्गत रामगढ़ के राजा विक्रमाजीत सिंह को विक्षिप्त और अमान सिंह तथा शेर सिंह को नाबालिग घोषित कर रामगढ़ राज्य को हड़पने की दृष्टि से अंग्रेजों ने कोर्ट ऑव वार्ड्स की कार्यवाही की।

सन् 1855 में राजा विक्रमजीत का देहावसान हो गया। तदुपरांत रानी अवंतीबाई ने नाबालिग पुत्रों की संरक्षिका बन राज्य संभाला। कृषकों और जनसाधारण को अंग्रेजों के निर्देश ना मानने का आदेश दिया और अनेक सुधार कार्य किए। रानी अवंतीबाई के कृत्यों को बरतानिया सरकार ने गंभीरता से लिया और रामगढ़ राज्य को कोर्ट ऑव वार्ड्स के अंतर्गत कर दिया। यहीं से रानी अवंतीबाई लोधी ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का निश्चय किया।

सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बरतानिया सरकार के विरुद्ध वीरांगना रानी अवंतीबाई का गौरवमयी इतिहास लिखने से पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि जिस तरह इतिहास लेखन के दौरान महारथी राजा शंकरशाह और उनके सुपुत्र रघुनाथशाह के साथ अन्याय हुआ है, उससे भी बड़ा अन्याय वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी के साथ हुआ है, इस षड्यंत्र में तथाकथित परजीवी और अंग्रेज़ों से भयाक्रांत बुद्धिजीवी इतिहासकार,अंग्रेजी पैटर्न और उनके स्रोतों को ब्रह्म वाक्य मानकर कैम्ब्रिज विचारधारा के इतिहासकार, मार्क्सवादी इतिहासकार और एक दल विशेष के इतिहासकार शामिल रहे हैं, जबकि रानी अवंतीबाई लोधी का कद और बलिदान किसी भी तरह से, झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम हजरत महल सहित अन्य वीरांगनाओं की तुलना उन्नीस नहीं रहा है, फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर लिखे गए इतिहास में तथाकथित महान् इतिहासकारों ने उनके बारे एक पृष्ठ तो छोड़िये, एक पंक्ति नहीं लिखी है। और तो और एक उद्भट विद्वान और जाने-माने इतिहासकार राय बहादुर हीरालाल जी ने अपने गजेटियर “मंडला मयूख” में रानी अवंतीबाई लोधी के पलायन कर जाने का उल्लेख किया है क्योंकि वे अंग्रेजों के प्रभाव में थे। भारत में सन् 1857 में बरतानिया सरकार के विरुद्ध महारथी मंगल पांडे ने स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया था। अविलंब ही स्वतंत्रता संग्राम का विस्तार होने लगा था।

मध्य प्रांत में जबलपुर कमिश्नरी केंद्र बिंदु बन गया था, यहाँ गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने के लिए बैठक आयोजित की थी, जिसमें रानी अवंतीबाई लोधी सहित विभिन्न क्षेत्रों के जमींदार और मालगुजार एकत्रित हुए थे।

यहीं रानी अवंतीबाई ने सभी रियासतों को एकत्रित करने हेतु काली चूड़ियों की पुड़िया भेजने का प्रस्ताव रखा था जिसे स्वीकृत कर लिया गया। इसके अनुसार जो भी रियासत, मालगुजार और जमींदार इसे स्वीकार कर लेते थे, उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित माना जाता था।

दुर्भाग्यवश धोखा हो गया तथा एक भेदिए गिरधारी लाल दास ने तत्कालीन कमिश्नर इरेस्किन को सारी जानकारी दे दी।अचिरात् कमिश्नर इरेस्किन ने डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट क्लार्क को भेजकर 14 सितंबर सन् 1857 को गढ़ा पुरवा से राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह को गिरफ्तार करवा लिया।

18 सितंबर सन् 1857 को राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह को ब्रिटानिया सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने के आरोप में तोप के मुंह से उड़ा दिया गया। इस जघन्य घटना से क्रोधित होकर 52 वीं नेटिव इन्फेंट्री के सैनिकों ने सूबेदार बलदेव तिवारी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया।

रानी अवंतीबाई लोधी ने राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह की सहधर्मचारणियों क्रमशः वीरांगना फूलकुंवर और मानकुंवर के साथ मिलकर राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह का अंतिम संस्कार किया।

अविलंब ही विजयराघवगढ़ के राजा सरजू प्रसाद शाहपुर के मालगुजार ठाकुर जगत सिंह, शहपुरा के ठाकुर बहादुर सिंह लोधी, हीरापुर के मेहरबान सिंह लोधी भी आ मिले। सितंबर सन् 1857 में रानी अवंतीबाई लोधी ने नेतृत्व संभालते हुए बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता बिगुल बजा दिया।

रानी अवंतीबाई लोधी ने अंग्रेजों से लगातार 9 माह संघर्ष किया, जिसमें 6 प्रमुख युद्ध लड़े(देवहारगढ़ के जंगलों में छापामार युद्धों के अतिरिक्त) तथा 4 माह तक मंडला डिप्टी कमिश्नरी पर बरतानिया सरकार अपदस्थ कर अपनी सत्ता स्थापित की।

रानी अवंती बाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का अपना विजय अभियान “भुआ – बिछिया के युद्ध से आरंभ किया।उसके बाद रामनगर का युद्ध, घुघरी का युद्ध और खैरी के युद्ध हुए जिसमें अंग्रेजों की भयंकर पराजय हुई। मंडला के युद्ध में डिप्टी कमिश्नर बाडिंग्टन को वीरांगना रानी अवंतीबाई और वीरांगना फूलकुंवर ने अपने सहयोगियों के साथ भयंकर पराजय दी।

मंडला का डिप्टी कमिश्नर बाडिंग्टन अपनी फौज सहित भाग निकला और सारी व्यथा जबलपुर के कमिश्नर इरेस्किन को बताई। इस भगदड़ में बाडिंग्टन का 8 वर्षीय पुत्र मंडला में ही छूट गया जिसे रानी अवंतीबाई ने बड़े जतन से अपने पास रखा और अपने विश्वस्त सैनिकों के संरक्षण में उस बालक को बाडिंग्टन के पास जबलपुर पहुँचा दिया।

नवंबर सन् 1857 को मंडला डिप्टी कमिश्नरी स्वतंत्र हो गई और रामगढ़ केन्द्र बन गया। 4 माह तक रानी अवंतीबाई और रानी फूलकुंवर ने शासन किया परंतु फरवरी सन् 1858 के अंत में बाडिंग्टन पुनः फौज के साथ आ धमका। मंडला में रानी फूलकुंवर, उमराव सिंह एवं धन सिंह पराजित हो गए।शीघ्र ही उमराव सिंह रामगढ़ पहुंचे और रानी अवंतीबाई को सारा वृतांत बताया।

मार्च 1858 के आरंभ में ही डिप्टी कमिश्नर बाडिंग्टन ने अपनी फौज के साथ रामगढ़ का घेराव किया। इस युद्ध में रामगढ़ के किले से निकलकर अकस्मात् रानी ने अंग्रेजी सेनाओं की घेराबंदी तोड़ दी और देवहारगढ़ के जंगलों की ओर निकल गईं ताकि छापामार शैली में युद्ध लड़ा जा सके। रानी अवंतीबाई ने देवहारगढ़ में मोर्चा संभाला कई बार झड़प हुई परंतु बाडिंग्टन नहीं जीत पाया। विडंबना देखिये कि 20 मार्च सन् 1858 के दिन पीछे से रीवा राज्य की सेनाएं आ जाने के कारण रानी अवंतीबाई घिर गईं।

इसलिए रानी अवंतीबाई समरभूमि में सामने आ गईं और भयानक युद्ध किया परंतु पराजय की स्थिति निर्मित होते ही उन्होंने अपनी प्रिय सखि,अंगरक्षिका गिरदाबाई (गिरधाबाई) से यह कहते हुए कि “हमारी दुर्गावती ने जीते जी बैरी के हाथ से अंग न छुए जाने का प्रण लिया था। इसे न भूलना।” 26 वर्षीय इस वीरांगना ने अपनी तलवार से 20 मार्च, सन 1858 को स्वत:आत्मोत्सर्ग कर लिया। तदुपरांत वीरांगना रानी अवंतीबाई की अंगरक्षिका गिरदाबाई ने भी प्राणोत्सर्ग कर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में स्वदेश के लिए पूर्णाहुति दी।

वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी की समाधि डिंडौरी जिले के अंतर्गत शाहपुर के पास बालपुर गांव में स्थित है। स्वाधीनता के अमृत काल के आलोक में सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राजघरानों में से प्रथम बलिदानी वीरांगना के रुप में राष्ट्रीय इतिहास में रानी अवंतीबाई लोधी का नाम दर्ज होना ही, उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Topics: भारत की वीरांगना रानी अवंतीबाईपाञ्चजन्य विशेषरानी अवंतीबाई लोधीरानी अवंतीबाई का बलिदानरानी अवंतीबाई लोधी का युद्धरामगढ़ रियासत की रानी अवंतीबाईरानी अवंतीबाई लोधी और अंग्रेजों का संघर्षरानी अवंतीबाई लोधी का इतिहास
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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