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व्यक्ति छोटा, अपराध बड़ा

यूट्यूबर व पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया ने बहुत बड़ी गलती की है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है, पर उसे कहा गया है कि वह अगले आदेश तक सोशल मीडिया में कोई भी सामग्री न डाले

Written byप्रो. बृज किशोर कुठियालाप्रो. बृज किशोर कुठियाला
Feb 27, 2025, 12:39 pm IST
inभारत, विश्लेषण, सोशल मीडिया

सर्वोच्च न्यायालय की एक सुनवाई में माननीय न्यायाधीश ने टिप्पणी की, ‘‘इसके (अभियुक्त के) मन में तो गंदगी भरी पड़ी है जिसकी उसने अपने ‘शो’ में उल्टी कर दी। इसके माता-पिता व समाज लज्जित है।’’ सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख यह विषय आया था कि अभियुक्त के खिलाफ मुंबई, गुवाहाटी व जयपुर में जो आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, उनके संबंध में अभियुक्त को गिरफ्तार होने से बचाया जाए और सभी दर्ज मामले एक साथ एक ही न्यायालय में सुने जाएं। सर्वोच्च न्यायालय ने अभियुक्त को गिरफ्तार न करने की राहत तो दी, पर साथ ही उसे कड़ी फटकार भी लगाई।

प्रो. बृज किशोर कुठियाला
अध्यक्ष, पंचनद शोध संस्थान

यह मुकदमा था यूट्यूबर व पोडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया के खिलाफ, जिसने यूट्यूब के एक ‘शो’ में ‘जज’ होने के नाते एक प्रतिभागी से माता-पिता के संदर्भ में अत्यंत अश्लील, अशिष्ट, अभद्र व भौंडा प्रश्न पूछ लिया। विचार आता है कि उस व्यक्ति की सोच कैसी विकृत है, जो एक सार्वजनिक प्रसारण मंच पर ऐसा प्रश्न पूछ सकता है। आंकड़ों के अनुसार, संभावना है कि कुछ लाख लोग तो इस भौंडेपन को किसी न किसी स्क्रीन पर देख ही रहे होंगे और बड़ी संख्या में बाद में भी काफी समय तक अन्य लोगों के देखने की संभावना रहती है।
गनीमत है कि जैसे ही इस मामले ने तूल पकड़ा, ‘शो’ के ‘होस्ट’ ने अपने यूट्यूब चैनल की सभी सामग्री मिटा दी।

रणवीर इलाहाबादिया 31 वर्ष का इंजीनियरिंग पढ़ा हुआ युवक है, जिसने सोशल मीडिया में स्वास्थ्य संबंधी यूट्यूब चैनल से प्रवेश किया और ‘बियरबायसैप’ के नाम से युवाओं में प्रसिद्ध है। अब वह मनोरंजन के कई यूट्यूब चैनल चलाता है। वह अन्य सोशल मीडिया में भी सक्रिय है। हास्य अभिनेता के रूप में भी जाना जाता है। कुछ ही वर्षों में करोड़पति हो गया है। चिंता की बात यह है कि सोशल मीडिया में वह ‘इन्फ्लूएंसर’ अर्थात् समाज में ‘प्रभावी व्यक्तित्व’ की श्रेणी में माना जाता है। लिंक्डइन में उसने बताया है कि दूसरों को उत्साहित व शिक्षित करना उसका जुनून है। भगवान ही बचाए ऐसे जुनून से!

जिस संवाद पर उसके खिलाफ अभियान छिड़ा है, वह उसकी एक ही अभद्रता नहीं हो सकती। उसने न जाने क्या-क्या कहकर बच्चों और युवाओं के मन-मस्तिष्क को प्रदूषित किया है। उसके माता-पिता दोनों डॉक्टर हैं। अपने ही कहे अनुसार इलाहाबाद या प्रयागराज से उसका कोई लेना-देना नहीं है। उसी के कहे अनुसार, पाकिस्तान में रहने वाले उसके किसी बुजुर्ग को विद्वान होने के नाते इल्मदार (इल्म अर्थात् ज्ञान, विद्या) की उपाधि मिली, जो बिगड़ कर इलाबादिया बन गई। इस बात को सहज ही मानना कठिन है। रणवीर ने ही एक बात और बताई है कि उसके पूर्वजों में से कोई एक कवि थे और उसने यह उपनाम अपनाया। कुछ लोगों का यह कहना कि यह उपनाम विशेष वर्ग को लुभाने के लिए रखा गया है। परन्तु इसका भी कोई प्रमाण नहीं है।

यह बात तो तय है कि रणवीर आज के सोशल मीडिया के उन सक्रिय लोगों का एक उदाहरण है, जिनका नैतिकता से कोई लेना-देना नहीं है। किसी भी तरह से अधिक से अधिक ‘लाइक्स’, ‘सब्सक्राइबर’ और ‘फालोअर’ बटोरना लक्ष्य है, जिससे एक तरफ तो धन की वर्षा हो, दूसरी ओर प्रसिद्धि दिन पर दिन बढ़ती जाए। इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का यह दुरुपयोग विश्वव्यापी है। अमेरिका में कामेडियन सैंडी ने ‘लाइव शो’ में ऐसा ही एक भद्दा मजाक किया तो एक दर्शक ने मंच पर चढ़ कर उसकी पिटाई कर दी। मुकदमा पीटने वाले पर हुआ। अमेरिकी समाज अभी भी 400-500 साल पुराना है। इसलिए नैतिकता के विकास में कमजोर है, परंतु भारतीय समाज ने हजारों वर्षों में उचित व अनुचित के मापदंड बनाए हैं। भारत इन मामलों में अधिक समाजोपयोगी दृष्टि रखता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने रणवीर को लताड़ा तो है ही, अगले आदेश तक उसे व उसके अन्य सहयोगियों को सोशल मीडिया के किसी भी मंच पर कुछ भी डालने से रोक भी दिया है। सजा तो है पर बहुत कम। न्यायालय ने रणवीर को आदेश दिया है कि वह अपना पासपोर्ट पुलिस में जमा करवा दे, यह इसलिए कि कई अन्य अपराधियों की तरह वह देश छोड़ कर भगोड़ा न बन जाए।

उच्चतम न्यायालय में रणवीर का बचाव अधिवक्ता अभिनव चंद्रचूड़ कर रहे हैं, जो पूर्व मुख्य न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ के बड़े पुत्र हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत के पूछने पर अभिनव ने यह तो माना कि रणवीर ने जो किया, वह उसका बचाव नहीं कर रहे, परंतु यह आपराधिक मामला नहीं है। बचाव का यह तर्क नैतिकता से तो परे लगता ही है, परंतु आम समझदारी में भी अश्लीलता की हद पार करता लगता है। सरसरी तौर पर देखें तो यह भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 294 व 292 के अंतर्गत स्पष्ट होता है। अश्लीलता की जो परिभाषा इस कानून में दी गई है, उसके अनुसार भी रणवीर ने जो कहा है वह पूरी तरह से अश्लील है। दंड संहिता के अनुसार पहली बार यह अपराध करने पर दो वर्ष की जेल व रु. 5,000 का जुर्माना है।

सुनवाई के समय न्यायाधीश महोदय ने भारत सरकार के महाधिवक्ता के प्रतिनिधि से कहा कि भारत सरकार को सोशल मीडिया की सामग्री से संबंधित नियमों को बनाना चाहिए। अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि यदि सरकार यह काम नहीं करती तो न्यायालय यह काम करेगा। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यह (यानी सोशल मीडिया व ओटीटी के मंचों का नियमन) खाली व बंजर क्षेत्र हैं।
चिंता का विषय यह है कि पिछले कई वर्षों से ऐसे अनेक मामले उठे हैं, जहां सोशल मीडिया का दुरुपयोग, अश्लीलता, अफवाहों, चरित्रहनन, देशद्रोह व आर्थिक अपराधों के लिए किया गया। फिल्मों के लिए वर्षों से भारतीय सेंसर बोर्ड कार्यरत है पर बहुत प्रभावी नहीं है। विज्ञापन के व्यापार में भी विज्ञापन स्स्टैन्डर्डस काउंसिल का कार्य विज्ञापन जगत में अधिक सुधार नहीं ला पाया है। एडिटर्स गिल्ड तो लगता है, अपने ही मामलों में फंसी रहती है, हालांकि उन्होंने न्यूज मीडिया के लिए कुछ दिशा निर्देश बनाए हैं, जिनका पालन कम और उल्लंघन अधिक होता है।

ओटीटी मंचों पर अवांछनीय सामग्री के मामले बढ़ते जा रहे हैं, उन पर रोक लगाने के लिए नियम बनाने में ढिलाई है। विलंब के दो मुख्य कारण हैं, पहला तो यह तर्क दिया जाता है कि सभी सोशल मीडिया व ओटीटी मंच आत्मनियंत्रण व स्वनियमन से इस समस्या का हल निकालें और जहां कुछ गंभीर अपराध होता है, उसके लिए भारतीय न्याय संहिता में प्रावधान है। दूसरा यह कि किसी भी मीडिया पर नियंत्रण लगाने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता है। हालांकि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उचित प्रतिबंधों के अधीन है, जिसमें अश्लीलता को रोकना और सामाजिक नैतिकता को बनाए रखना शामिल है।

वास्तव में यह विषय केवल राज्य व न्यायपालिका का नहीं है। बड़े स्तर पर प्रसारित होने वाली आडियो व वीडियो सामग्री को लेकर नियम बनाने के लिए समाज की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य है। कल के भारत का समाज कैसा बनेगा और उसमें जनसंवाद, समाचार व मनोरंजन की भूमिका कैसी हो, यह तो समाज ही औपचारिक व अनौपचारिक तरीकों से तय करेगा। रणवीर अल्लाहवादिया को कुछ तो सीख मिल गई है। आशा है, अन्य हास्य अभिनेता व अभिनेत्रियां भी नैतिकता की सीमा में रह कर व्यंग्य की विधा का विस्तार करेंगे। परंतु समय-समय पर नैतिकता व नियम-कानून का उल्लंघन भी होगा। समाज जितना सजग होगा और उल्लंघन करने वालों को जितनी प्रताड़ना व कड़ी सजा भुगतनी पड़ेगी, उतना ही सात्विक हमारे मीडिया का संसार बनेगा।

Topics: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताओटीटी मंचyoutuberयूट्यूबरपाञ्चजन्य विशेषCorte Supremapodcaster Ranveer Allahabadiaabogado Abhinav Chandrachudplataforma OTTlibertad de expresiónसर्वोच्च न्यायालयपॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादियाधिवक्ता अभिनव चंद्रचूड़
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