कालजयी महारथी टंट्या भील : जिनके नाम से कांपती थी ब्रिटिश सरकार, जानिए उनके शौर्य और बलिदान की गाथा
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कालजयी महारथी टंट्या भील : जिनके नाम से कांपती थी ब्रिटिश सरकार, जानिए उनके शौर्य और बलिदान की गाथा

महारथी टंट्या भील, भारत के रॉबिन हुड, ने अंग्रेजों के खिलाफ 24 युद्धों में विजय प्राप्त की और गरीबों के संरक्षक बने। जानिए उनके जीवन, संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 3, 2024, 11:00 am IST
inभारत
4 December Special tantia bhil freedom struggle

भारत के गौरवशाली इतिहास की परंपरा में भील जनजाति का अद्भुत और अद्वितीय माहात्म्य रहा है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों के आलोक में सतयुग में महादेव – बड़ा देव के पुत्र निषाद, जो तीर कमान विद्या में निपुण थे, भील जनजाति के आदि पुरुष के रूप में शिरोधार्य हैं। त्रेता में भगवान श्री राम के साथ निषादराज गुह और द्वापर युग में धनुर्धर अर्जुन की परीक्षा के लिए महादेव किरात भील के रूप में अवतरित हुए थे, वहीं वर्तमान युग के हर कालखंड में हुए स्वातंत्र्यसमर में भील जनजाति का अति विशिष्ट योगदान रहा है। प्राचीन काल में सिकंदर को शिवी जनपद के भीलों ने पराजित किया था, मध्यकाल में महाराणा प्रताप के साथ राणा पूंजा भील ने अकबर के विरुद्ध भयंकर संग्राम किया था और मेवाड़ से खदेड़ दिया था। इसी महान् परंपरा के अनुक्रम में आधुनिक भारत में महा महारथी टंट्या भील ने अंग्रेजी शासन को ध्वस्त करने के लिए 12 वर्ष तक लगातार 24 युद्ध लड़े और अपराजेय रहे, उन्हें सुनियोजित षड्यंत्र कर ही गिरफ्तार किया गया था। महारथी टंट्या महिला सशक्तिकरण के संरक्षक थे, इसलिए उन्हें टंट्या मामा के नाम से भी जाना जाता है।
महारथी टंट्या गरीबों के मसीहा थे, इसलिए उन्हें भगवान का दर्जा भी प्राप्त हुआ। कतिपय पश्चिमी लेखक और अंग्रेज अधिकारी उन्हें भारत के रॉबिनहुड के नाम से रेखांकित करते हैं।

“खंडवा की बड़दा (बडाडा ) गांव में जन्म और टंट्या का अर्थ”

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी महारथी टंट्या भील की कर्मभूमि मध्य भारत मध्य प्रांत एवं मुंबई प्रेसिडेंसी के क्षेत्र थे, जहाँ उन्होंने ब्रिटानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद किया था। महारथी टंट्या का जन्म पूर्वी निमाड़ (खंडवा जिले) के पंधाना तहसील के बड़दा (बडाडा)गांव में 1840 में हुआ था, वनवासी संगठनों का मानना है कि तिथि 26 जनवरी थी। महारथी टंट्या के पिता का नाम श्रीयुत भाऊ सिंह था और उनकी पत्नी का नाम कागज बाई था। टंट्या शब्द का अर्थ विभिन्न इतिहासकारों ने प्रकारांतर से अलग-अलग बताया है परंतु वास्तव में टंट्या का शाब्दिक अर्थ है” संघर्ष” और इसी नाम को आगे जाकर महारथी टंट्या ने सार्थक किया।

“तात्या टोपे से सीखी थी गुरिल्ला युद्ध पद्धति”

बाल्यकाल से ही महारथी टंट्या कुशाग्र बुद्धि के थे तीर कमान लाठी और गोफन में प्रशिक्षण प्राप्त कर महारत हासिल कर ली थी। दावा या फलिया उनका मुख्य हथियार था और उन्होंने बंदूक चलाना भी भली-भांति सीख लिया था। धनुर्विधा में महारत हासिल कर ली थी। महारथी टंट्या का संबंध सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी है जिसमें वे तात्या टोपे के साथ रहे और उन्हीं से उन्होंने गुरिल्ला युद्ध पद्धति में महारत हासिल की थी।

“300 निर्धन कन्याओं का विवाह कराया तो बने मामा”

बाल्यकाल में ही में ही उनके पिता भाऊ सिंह ने आमजा माता के समक्ष महारथी टंट्या को शपथ दिलाई थी, कि वह बेटियों बहुओं और बहनों की सदैव रक्षा करेगा, आगे चलकर टंट्या भील ने 300 निर्धन कन्याओं का विवाह कराया और महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए इसलिए उन्हें टंट्या मामा भी कहा जाता है। महारथी टंट्या के पिता की जल्दी मृत्यु हो गई। सारी जिम्मेदारी महारथी टंट्या पर आ गई फसल ठीक से आने के कारण वे 4 साल का लगान जमा नहीं कर सके, इसलिए उन्हें मालगुजार ने बेदखल कर दिया इस मामले को लेकर वह अपने पिता के मित्र शिवा पाटिल के पास गए क्योंकि वह जमीन शिवा पाटिल और भाऊ सिंह दोनों ने मिलकर खरीदी थी, परंतु शिवा पाटिल ने जमीन पर अधिकार देने से मना कर दिया। महारथी टंट्या ने अंग्रेजी अदालत में मुकदमा दायर किया परंतु अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने झूठे साक्ष्यों के आधार पर महारथी टंट्या का प्रकरण समाप्त कर दिया। न्याय न मिलने के कारण महारथी टंट्या के पास संग्राम के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था इसलिए एक दिन उन्होंने अपने साथियों के साथ शिवा के सभी आदमियों हमला बोल दिया और अपनी भूमि को कब्जे से मुक्त कराया। इसी समय अंग्रेज सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1 साल की कठोर सजा मिली जहां उन्होंने कैदियों पर अंग्रेजों के अत्याचार को देखा और उनके मन में स्वतंत्रता संग्राम की इच्छा बलवती हुई।

सन 1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और सन् 1858 में भारत का शासन ब्रिटिश क्रॉउन के अधीन आ गया इसके उपरांत ब्रिटिश सरकार का अत्याचार और अनाचार बढ़ गया ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर मालगुजार और साहूकारों ने भी जनसाधारण का विभिन्न प्रकार से शोषण करना आरंभ किया तो महारथी टंट्या ने वनवासियों और पीड़ितों को एकत्रित कर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया।

“1700 गांव में चलाई समानांतर सरकाऱ”

सन् 1876 से महारथी टंट्या भील का ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विधिवत् स्वतंत्रता संग्राम का शुभारंभ हुआ 20 नवंबर 1878 को उन्हें धोखे से पकड़कर खंडवा जेल में डाल दिया गया परंतु 24 नवंबर 1878 को रात में वह अपने साथियों के साथ दीवार लांघकर कर मुक्त हो गए। इसके बाद उन्होंने संगठन को मजबूत किया जिसमें जिसमें बिजानिया भील, दौलिया, मोडिया और हिरिया जैसे साथी मिले और उसी के साथ महारथी टंट्या ने ब्रिटिश सरकार के समानांतर 1700 गांव में सरकार चलाना आरंभ कर दी।

“टंट्या पुलिस की दहशत में अंग्रेजों ने बनाई टंट्या भील पुलिस और टंट्या ने नाक काटी”

महारथी टंट्या ने एक विशेष दस्ता “टंट्या पुलिस” के नाम से गठित किया और साथ ही चलित न्यायालय बनाए जिसमें न्याय किया जाता था। महारथी टंट्या का 12 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम रहा है जिसमें अंतिम 7 वर्ष बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ब्रिटिश सरकार को स्पेशल टास्क फोर्स, टंट्या भील पुलिस, गठित करनी पड़ी थी, इस स्पेशल टास्क फोर्स के कमांडर एस. ब्रुक की एक हमले में वेश बदलकर महारथी टंट्या ने नाक काट दी थी।

“भूख से किसी को मरने नहीं दिया और बरतानिया सरकार से 24 बार संघर्ष में विजय प्राप्त की”

महारथी टंट्या ने ब्रिटिश सरकार से 24 बार संघर्ष किया और वह विजयी रहे इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार के खजाने और जमीदारों तथा माल गुजारों से सभी निर्धन वर्गों के लिए के लिए 400 बार धनराशि हस्तगत कर उन्हें वितरित की।अकाल के समय भी उन्होंने किसी को भूख से मरने नहीं दिया इसके उन्होंने कई बार अंग्रेजी सरकार द्वारा रेल से भेजे जा रहे अनाज को हस्तगत किया। यह बात प्रचलित हो गई थी, कि महारथी टंट्या के राज में कोई भूखा नहीं सो सकेगा।

“जननायक टंट्या भील को मिला भगवान का दर्जा”

सन् 1880 के बाद मध्य प्रांत, मध्य भारत और मुंबई प्रेसिडेंसी के क्षेत्रों में महारथी टंट्या चमत्कारिक स्वरूप के रूप में स्थापित हो गए थे, इसलिए उन्हें को भगवान का दर्जा दिया जाने लगा था, और अब महारथी टंट्या जननायक बन गए थे।

“षड्यंत्र से किया गिरफ्तार जबलपुर में चला था,देश- द्रोह का मुकदमा”

तांतिया भील – हिस्ट्री ऑफ एमपी पुलिस के पृष्ठ क्रमांक 101 एवं 103 के हवाले से एक बार महारथी टंट्या और बिजानिया को गिरफ्तार करके जबलपुर सेंट्रल जेल लाया गया परंतु दोनों पुनः भागने निकले परंतु दुर्भाग्य से बिजानिया, दौलिया मोडिया और हिरिया पकड़े गए और उन्हें फांसी दे दी गई जिससे महारथी टंट्या का संगठन कमजोर हो गया परंतु फिर भी ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी।

ब्रिटिश सरकार ने महारथी टंट्या को पकड़ने के लिए उनकी मुंह बोली बहन के पति गणपत सिंह का सहयोग लिया और 11 अगस्त 1889 को रक्षा बंधन के दिन सुनियोजित षड्यंत्र के चलते जब राखी बंधवाने के लिए टंट्या अपनी बहन के यहां पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। महारथी टंट्या को पहले खंडवा जेल में रखा गया फिर उन्हें जबलपुर सेंट्रल जेल (वर्तमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस केन्द्रीय जेल) में स्थानांतरित कर दिया गया।

“जबलपुर के सत्र न्यायालय में सुनाई गई फांसी की सजा और न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा भारत का रॉबिन हुड”

जबलपुर के सत्र न्यायालय में महारथी टंट्या पर विभिन्न आपराधिक मामलों के साथ देशद्रोह का मुकदमा प्रारंभ हुआ। गौरतलब है कि जब महारथी टंट्या को जबलपुर लाया गया तो हजारों की संख्या में लोग उनके दर्शन के लिए एकत्रित हुए थे,इसलिए आगे चलकर सेंट्रल जेल क्षेत्र में कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई थी। अंततः महारथी टंट्या भील को 19 अक्टूबर 1889 में फांसी की सजा सुनाई गई। संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स समाचार पत्र में तो 10 नवंबर 1889 को टंट्या भील की गिरफ्तारी पर एक खबर प्रकाशित की जिसमें उन्हें भारत के रॉबिनहुड के रूप में रेखांकित किया गया था। किया गया था। फांसी की सजा के विरुद्ध मर्सी पिटिशन दाखिल की गई परंतु 25 नवंबर 1889 को मर्सी पिटीशन खारिज कर दी गई और 4 दिसंबर 1889 को महारथी टंट्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

“पार्थिव शरीर को कालाकुंड रेलवे ट्रैक पर फेंका गया, जहां मिलती है उन्हें सलामी”

फांसी के उपरांत उनके मृत शरीर को पातालपानी के कालाकुंड रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया ताकि ब्रिटिश सरकार की दहशत और सर्वोच्चता बनी रहे। महारथी टंट्या का पार्थिव शरीर तो नष्ट हो गया परंतु वह अमर हो गए। टंट्या मामा का मंदिर भी बनवाया गया। यह प्रचलित है कि आज भी पातालपानी से जो भी रेल निकलती है वह थोड़ा रुकती है और टंट्या मामा (भगवान् टंट्या के रुप में) को सलामी दी जाती है।

(स्वाधीनता के अमृत काल के आलोक में जननायक अमर बलिदानी टंट्या भील के बलिदान दिवस 4 दिसंबर पर सादर समर्पित )

Topics: Tantia Mama Freedom Fighterभारत का रॉबिन हुडIndia's Robin Hoodपातालपानी रेलवे सलामीPatalpani Railway SaluteIndian Freedom Struggleभील जनजाति का गौरवभारतीय स्वतंत्रता संग्रामBhil Tribe Gloryपाञ्चजन्य विशेषटंट्या भील का इतिहासTantia Bhil Historyटंट्या मामा स्वतंत्रता सेनानी
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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