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संस्कृत और संस्कृति की सरिता

नई दिल्ली के रघुबीर नगर स्थित श्री हनुमान संस्कृत महाविद्यालय में सुदूर क्षेत्रों के कमजोर वर्ग के छात्रों को संस्कृत, संस्कृति के साथ ही आधुनिक शिक्षा नि:शुल्क दी जा रही

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 28, 2024, 03:25 pm IST
in दिल्ली
महाविद्यालय की एक कक्षा का दृश्य

महाविद्यालय की एक कक्षा का दृश्य

आज संस्कृत के बारे में यह धारणा बना दी गई है, ‘संस्कृत पढ़ने वाले छात्रों का कोई भविष्य नहीं है।’ श्री हनुमान संस्कृत महाविद्यालय इस धारणा को दूर करने का कार्य कर रहा है। यह महाविद्यालय रघुबीर नगर, नई दिल्ली में स्थित है। इस महाविद्यालय का मुख्य उद्देश्य है सुदूर क्षेत्र में रहने वाले कमजोर वर्ग के बच्चों को मूल वेद एवं संस्कृत भाषा का पठन-पाठन कराना। इसके साथ ही नई पीढ़ी को हिन्दू कर्मकांड के साथ ही संस्कृत व्याकरण, संस्कृत साहित्य, दर्शन, ज्योतिष आदि का ज्ञान कराना।

यहां छठी से शास्त्री तक की पढ़ाई होती है। वर्तमान में महाविद्यालय में 140 छात्र हैं। ये सभी उत्तर प्रदेश, बिहार, मणिपुर, ओडिशा, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और नेपाल के रहने वाले हैं। समय को देखते हुए यहां संस्कृत व्याकरण, संस्कृत साहित्य, दर्शन, वेद के साथ ही हिंदी, अंग्रेजी, कंप्यूटर आदि विषयों की भी शिक्षा दी जाती है। यहां से प्रतिवर्ष लगभग 40 छात्र स्नातक तक की पढ़ाई पूरी कर बाहर निकलते हैं।

अच्छी बात यह है कि इनमें से अधिकतर छात्रों को रोजगार मिल जाता है। यहां से पढ़ कर निकले छात्र आज प्रशासनिक सेवा, सेना, शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। विशेष बात यह है कि यहां वैसे छात्र पढ़ते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। छात्रों को रहने, खाने और पढ़ने के लिए किसी तरह का शुल्क नहीं देना पड़ता। इस कारण यहां गरीब से गरीब छात्र भी पढ़ कर अपना जीवन संवार लेते हैं।

इस महाविद्यालय की स्थापना 1978 में वसंत पंचमी के दिन विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल के कर-कमलों से हुई थी। महाविद्यालय ने अपनी 46 वर्ष की इस लंबी यात्रा में अनेक उपलब्धियां प्राप्त की हैं।

यह महाविद्यालय 5-7 विद्यार्थियों एवं एक आचार्य के साथ आरंभ हुआ था। इसके चतुर्दिक विकास को देखते हुए दिल्ली प्रशासन ने 1988 में इसे अनुदान सहित मान्यता प्रदान की। इस समय यह महाविद्यालय केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (पहले राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान) से संबद्ध है। पहले इसे मध्यमा स्तर की शैक्षणिक मान्यता मिली थी।

मान्यता प्राप्ति के पश्चात् महाविद्यालय का तीव्र गति से विकास होने लगा। महाविद्यालय के छात्र केवल पढ़ाई ही नहीं, विभिन्न शैक्षणिक और खेल-कूद प्रतियोगिताओं में भी आगे रहते हैं। श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता, प्रश्न मंच, संस्कृत भाषण, वेदमंत्र अंत्याक्षरी, सूत्र अंत्याक्षरी, श्लोक अंत्याक्षरी, भाषण, कबड्डी, खो-खो, फुटबॉल, रस्साकस्सी जैसी प्रतियोगिताओं में भी यहां के छात्र उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रहे हैं।

इन सबको देखते हुए दिल्ली संस्कृत अकादमी ने दो बार इस महाविद्यालय को सर्वोत्कृष्ट संस्कृत महाविद्यालय का सम्मान प्रदान किया है। महाविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था को देखते हुए राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ने 1996 में इसे शास्त्री स्तर तक की मान्यता प्रदान की। इसके बाद यह महाविद्यालय निरंतर आगे बढ़ रहा है।

प्रसन्नता की बात है कि शहरी कोलाहल के बीच भी यह महाविद्यालय आज भी भारतीय संस्कृति, भारतीय ज्ञान, भारतीय परंपरा, भारतीय धरोहर को संरक्षित और संवर्धित कर रहा है।

Topics: विश्व हिंदू परिषदसंस्कृत भाषाvhpपाञ्चजन्य विशेषदिल्ली संस्कृत अकादमीसामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोरमूल वेदNational Sanskrit Institute
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