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आम आदमी के साहित्यकार थे मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद ने फिल्म इंडस्ट्री में भी किस्मत आजमाने का प्रयास किया था किन्तु वहां वे असफल रहे। हालांकि 1934 में उनकी पहली फिल्म ‘मिल मजदूर’ रिलीज भी हुई, जिसमें कामकाजी वर्ग की समस्याओं को इतनी मजबूती से उठाया गया था कि अंग्रेज सरकार ने घबराकर फिल्म के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Oct 8, 2024, 02:57 pm IST
in भारत
मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद

उत्तर प्रदेश में वाराणसी के लमही गांव के डाक मुंशी अजायबलाल के घर 31 जुलाई 1880 को जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ मुंशी प्रेमचंद को ‘आम आदमी का साहित्यकार’ कहा जाता है। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लगभग सभी कहानियां आम जीवन और उसके सरोकारों से ही जुड़ी हैं, इसीलिए उनके सबसे ज्यादा पाठक आम लोग ही रहे हैं। उन्होंने अपने सम्पूर्ण साहित्य लेखन में एक आम गरीब आदमी की पीड़ा को न केवल समझा बल्कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के जरिये उसका निदान बताने का प्रयास भी किया। उन्होंने अपनी लगभग सभी रचनाओं में आम आदमी की भावनाओं, उनकी परिस्थितियों, समस्याओं तथा संवेदनाओं का मार्मिक शब्दांकन किया। ‘उपन्यास सम्राट’ के विशेषण से उन्हें शरद चंद्र चट्टोपाध्याय ने नवाजा था लेकिन यह उपाधि मिलने के बाद भी पाठकों के बीच वर्तमान में भी उनका कहानीकार का रूप ही स्वीकारा और सराहा जाता है। प्रेमचंद ऐसे कहानीकार और साहित्यकार थे, जिन्हें आज भी सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। उन्हें ‘हिन्दी साहित्य का माइलस्टोन’ भी कहा जाता है। आज भी हिन्दी भाषी दिग्गज लेखकों और साहित्यकारों का यही मानना है कि मुंशी प्रेमचंद जैसा कलमकार हिन्दी साहित्य में न आज तक कोई हुआ है और न होगा। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने समाज को सदैव रूढि़वादी परम्पराओं और कुरीतियों से निकालने का प्रयास किया।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से न सिर्फ दासता के विरुद्ध आवाज उठाई बल्कि लेखकों के उत्पीड़न के विरुद्ध भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने उपन्यासों और कहानियों के अलावा नाटक, समीक्षा, लेख, संस्मरण इत्यादि कई विधाओं में साहित्य सृजन किया। हालांकि कम ही लोग यह बात जानते हैं कि जो मुंशी प्रेमचंद हिन्दी लेखन के लिए इतने विख्यात रहे हैं, उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू से की थी। अपना पहला साहित्यिक कार्य उन्होंने गोरखपुर से उर्दू में शुरू किया था और 1909 में कानपुर के ‘जमाना प्रेस’ से उर्दू में ही उनका पहला कहानी-संग्रह ‘सोज ए वतन’ प्रकाशित हुआ था, जिसकी सभी प्रतियां ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। उस समय में वे उर्दू में ‘नबावराय’ के नाम से लिखते थे। उनका लिखा कहानी संग्रह जब्त करने के बाद ‘जमाना’ के सम्पादक मुंशी दयानारायण ने उन्हें परामर्श दिया कि भविष्य में अंग्रेज सरकार की नाराजगी से बचने के लिए नवाब राय के बजाय वे नए उपनाम ‘प्रेमचंद’ के नाम से लिखना शुरू करें। इस प्रकार वे नवाब राय से प्रेमचंद बन गए। सुमित्रानन्दन पंत ने प्रेमचंद के बारे में कहा था कि प्रेमचंद ने नवीन भारतीयता और नवीन राष्ट्रीयता का समुज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत कर महात्मा गांधी के समान ही देश का पथ प्रदर्शन किया है।

वाराणसी के एक छोटे से गांव में जब प्रेमचंद का जन्म हुआ था, उन दिनों उनके परिवार के पास केवल छह बीघा जमीन ही थी लेकिन बड़ा परिवार होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। कायस्थ कुल के धनपत राय का बचपन खेत-खलिहानों में ही बीता। हालांकि प्रेमचंद एक वकील बनना चाहते थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते उनका वह सपना पूरा नहीं हो सका। जब वे केवल आठ वर्ष के थे, तभी उनके सिर से मां का साया उठ गया था। पिता ने कुछ वर्षों बाद दूसरी शादी कर ली और महज 15 साल की आयु उनका विवाह भी करा दिया गया।

मुंशी प्रेमचंद विधवा विवाह के पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने पहली पत्नी के निधन के बाद समाज के विरुद्ध जाकर वर्ष 1905 में 25 साल की आयु में शिवरानी नामक एक बाल विधवा से विवाह किया, जिसके बाद उनकी आर्थिक और पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया। वैसे तो उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था लेकिन उनके लेखन में परिपक्वता शिवरानी से विवाह के बाद ही आई थी, जिससे उनके लेखन की मांग बढ़ने लगी। उनकी दूसरी पत्नी शिवरानी ने ही बाद में उनकी जीवनी लिखी थी। उस समय जिस विद्यालय में वे शिक्षक की नौकरी करते थे, शिवरानी के उनके जीवन में आते ही उन्हें प्रमोशन मिला और वे शिक्षक से स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए। एक दिन वे बालेमियां मैदान में महात्मा गांधी का भाषण सुनने गए और उनके विचारों से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और उसके बाद पूरी तरह से स्वतंत्र लेखन में जुट गए। अपने जीवनकाल में मुंशी प्रेमचंद ने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें और हजारों की संख्या में लेखों व संस्मरणों की रचना की। उनके चर्चित उपन्यासों में बाजार-ए-हुस्न (उर्दू में), गोदान, कर्मभूमि, गबन, सेवा सदन, कायाकल्प, मनोरमा, निर्मला, प्रतिज्ञा प्रेमाश्रम, रंगभूमि, वरदान, प्रेमा और कहानियों में पूस की रात, नमक का दारोगा, बूढ़ी काकी, कफन, मंत्र, नशा, शतरंज के खिलाड़ी, आत्माराम, बड़े भाईसाहब, बड़े घर की बेटी, उधार की घड़ी, जुर्माना बहुत प्रसिद्ध रही। अपना अंतिम कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ उन्होंने वर्ष 1936 में लिखा, जो बेहद चर्चित रहा और आज भी आधुनिक क्लासिक माना जाता है।

प्रेमचंद ने फिल्म इंडस्ट्री में भी किस्मत आजमाने का प्रयास किया था किन्तु वहां वे असफल रहे। हालांकि 1934 में उनकी पहली फिल्म ‘मिल मजदूर’ रिलीज भी हुई, जिसमें कामकाजी वर्ग की समस्याओं को इतनी मजबूती से उठाया गया था कि अंग्रेज सरकार ने घबराकर फिल्म के प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी थी। उसके बाद प्रेमचंद समझ गए थे कि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी दाल नहीं गलने वाली, इसीलिए वे निराश होकर 1935 में वापस वाराणसी लौट आए। प्रेमचंद की कुछ कहानियों पर उनके निधन के बाद फिल्में भी बनीं। 1938 में उनके एक उपन्यास ‘सेवासदन’ पर फिल्म बनी। 1963 में ‘गोदान’ और 1966 में ‘गबन’ उपन्यास पर फिल्में बनी। 1977 में उनकी कहानी ‘कफन’ पर फिल्मकार मृणाल सेन द्वारा ‘ओका ऊरी कथा’ नामक तेलुगू फिल्म बनाई गई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। उनकी दो कहानियों 1977 में उनकी एक कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और 1981 में ‘सद्गति’ पर बॉलीवुड फिल्मकार सत्यजित राय ने फिल्में बनाई। 1980 में उनके उपन्यास ‘निर्मला’ पर एक टीवी धारावाहिक बना, जो काफी लोकप्रिय हुआ था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में प्रेमचंद जलोदर नामक बीमारी से ग्रसित हो गए थे और 8 अक्तूबर 1936 को हिन्दी साहित्य जगत में अटल शून्य छोड़ चिरनिद्रा में लीन हो गए।

 

Topics: मुंशी प्रेमचंदउपन्यास सम्राटपाञ्चजन्य विशेष
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