बलूचिस्तान में अशांति, चीन की कठपुतली अस्थिर पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी
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बलूचिस्तान में अशांति, चीन की कठपुतली अस्थिर पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी

भारत के विभाजन से पाकिस्तान बना और बलूचिस्तान के मुख्य नेता, कलात के खान ने एक स्वतंत्र राज्य के गठन की घोषणा की, जिसे पाकिस्तान ने पसंद नहीं किया

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Sep 2, 2024, 04:25 pm IST
inविश्लेषण
बलूचिस्तान में अशांति पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी

बलूचिस्तान में अशांति पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी

पाकिस्तान के आंतरिक हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। गत दिनों (26 अगस्त) बलूचिस्तान प्रांत में दो अलग-अलग हमले हुए और भारी हथियारों से लैस बलूच बंदूकधारियों ने कम से कम 40 लोगों (बलूच रिपोर्ट के अनुसार 56) को मार डाला। खूनी हमलों ने एक बार फिर अफगानिस्तान की सीमा से लगे अशांत बलूचिस्तान क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया। अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद, अफगानिस्तान की सीमा से लगे क्षेत्रों यानी बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति अधिक अस्थिर बनी हुई है। बलूचिस्तान में अशांति पाकिस्तान सरकार द्वारा गंभीर उपेक्षा की कहानी है, जबसे 1948 में पाकिस्तान का हिस्सा बना था। अब चीन भी सीपीईसी और ग्वादर पोर्ट के सौजन्य से इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से शामिल है।

ब्रिटिश शासन के तहत बलूचिस्तान अविभाजित भारत का हिस्सा था। भारत के विभाजन से पाकिस्तान बना और बलूचिस्तान के मुख्य नेता, कलात के खान ने एक स्वतंत्र राज्य के गठन की घोषणा की। इसे पाकिस्तान ने पसंद नहीं किया, क्योंकि महाराजा हरि सिंह ने अक्टूबर 1947 में भारत के साथ कश्मीर के विलय पर हस्ताक्षर किए थे। पाकिस्तान द्वारा कलात के खान पर बहुत दबाव डाला गया और उन्होंने अंततः 1948 में बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत बनाने के लिए विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। उस समय, ग्वादर बंदरगाह ओमान का हिस्सा था और लंबी बातचीत के बाद, पाकिस्तान ने 1958 में ओमान सल्तनत से ग्वादर बंदरगाह खरीदा।

बलूचिस्तान प्रांत का सामरिक महत्व है। पाकिस्तान के दक्षिण पश्चिम में स्थित, यह क्षेत्रफल के मामले में पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है (लगभग 44%), लेकिन सबसे कम आबादी वाला (लगभग 7%, 1.5 करोड़)। यह उत्तर पूर्व में खैबर पख्तूनख्वा, पूर्व में पंजाब प्रांत और दक्षिण पूर्व में सिंध प्रांत से घिरा है। यह पश्चिम में ईरान और उत्तर में अफगानिस्तान के साथ अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है। अरब सागर इसके दक्षिण में है, जिसमें दुनिया का सबसे बड़ा गहरे समुद्र का बंदरगाह, ग्वादर बंदरगाह है। उबड़-खाबड़ भूभागों, पहाड़ियों, पर्वतों एवं घाटियों का विस्तृत पठार है। अत्यंत शुष्क रेगिस्तानी जलवायु के साथ, केवल 5% भूमि कृषि योग्य है और फिर भी अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है। राजधानी क्वेटा और पड़ोसी इलाकों को छोड़कर, अधिकांश प्रांत विकास के किसी भी मानकों से पिछड़े हुए हैं।

बलूचिस्तान तांबा, सोना, कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इन संसाधनों के दोहन से स्थानीय आबादी के जीवन में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। प्रांत में पाकिस्तान में सबसे अधिक गरीबी दर बनी हुई है और इस प्रकार पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के साथ यहां के लोगों में गंभीर असंतोष है। इस्लामाबाद की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ उपेक्षा और निराशा की भावना है और इस प्रकार मौजूदा परिस्थितियों ने प्रांत में अलगाववादी आंदोलन को हवा दी है।

इस क्षेत्र में कई संघर्ष कारक रहे हैं, लेकिन पंजाबी वर्चस्व वाले प्रतिष्ठान के साथ बलूचों की प्रतिद्वंद्विता सबसे तीव्र रही है। प्रांतीय विधानसभा को अतीत में कई बार बर्खास्त किया गया है और लोगों के पास बहुत कम संघीय स्वायत्तता है। पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) सबसे बड़ा आतंकवादी समूह है और यह एक स्वतंत्र बलूचिस्तान और उनकी धरती से चीनियों के निष्कासन के लिए पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के साथ विद्रोह से लड़ रहा है। बीएलए को पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है। वर्ष 2000 के बाद से, बीएलए ने पाकिस्तानी सेना, पुलिस और अन्य पाकिस्तानी समर्थक तत्वों पर कई हमले किए हैं।

नवीनतम हमलों के लिए बीएलए को भी जिम्मेदार ठहराया गया है और इस बार, मारे गए लोग पंजाब प्रांत के थे क्योंकि यात्रियों को उतार कर और पहचानने के बाद मारा गया। ये हमले पाकिस्तानी सेना के एक सैन्य अभियान में मारे गए बलूच नेता नवाब बुगती की 18वीं बरसी के मौके पर हुए हैं। लक्षित हत्याओं के मौजूदा झटके के बाद, पाकिस्तानी सेना ने बीएलए के खिलाफ एक आक्रामक अभियान शुरू किया है और 21 बीएलए विद्रोहियों को मारने का दावा किया है। हिंसा का मौजूदा सिलसिला कुछ समय तक जारी रहने की संभावना है।

मौजूदा अशांति चीन के लिए चिंताजनक है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में चीन में भारी निवेश किया है। बीएलए धीरे-धीरे बलूचिस्तान में कई राजमार्गों पर नियंत्रण हासिल कर रहा है जो स्पष्ट रूप से सीपीईसी पर खतरा बन रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमलों को “पाकिस्तान और चीन के बीच दूरी बनाने” का प्रयास कहा। चीन ने भी बयान जारी कर कहा, “चीन क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा को संयुक्त रूप से बनाए रखने के लिए पाकिस्तानी पक्ष के साथ आतंकवाद-रोधी सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने के लिए तैयार है”। बीएलए के हमले से और शर्मिंदगी बढ़ गई क्योंकि ये हमले ऐसे समय में हुए हैं जब पीएलए के ग्राउंड फोर्सेज के कमांडर जनरल ली कियाओमिंग पाकिस्तान के दौरे पर थे, जहां उन्हें निशान-ए-इम्तियाज के शीर्ष सैन्य सम्मानों में से एक से सम्मानित किया गया था।

चीन चिंतित है क्योंकि वह बीएलए को सीपीईसी के लिए एक बड़ा खतरा मानता है। 3000 किलोमीटर लंबी यह बुनियादी ढांचा नेटवर्क परियोजना पश्चिमी चीन में शिनजियांग क्षेत्र से अरब सागर में ग्वादर बंदरगाह तक फैली हुई है। यह समुद्र और भूमि आधारित गलियारा मध्य पूर्व से चीन के ऊर्जा आयात के लिए विशेष मार्ग को सुरक्षित करने के लिए है। चीन को डर है कि मलक्का जलडमरूमध्य से मौजूदा मार्ग युद्ध के दौरान अवरुद्ध हो सकता है और इस प्रकार इस गलियारे का रणनीतिक महत्व है। चीन की 62 अरब डॉलर की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। दरअसल ऐसा माना जा रहा है कि अब चीन ने अपने कामगारों और चीनी हितों की रक्षा के लिए अपनी लष्करी और सुरक्षा यंत्रणा तैनात करने का प्रस्ताव दिया है। यदि यह सचमुच होता है तो भारत के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।

चीन और पाकिस्तान को पसंद नहीं आया भारत का सौदा

भारत सीपीईसी के पक्ष में नहीं है क्योंकि यह गलियारा पीओके से होकर गुजरता है और इसके इलाके पाकिस्तान द्वारा चीन को सौंप दिए गए हैं। लंबे राजनयिक प्रयासों के बाद, भारत ने इस साल मई में 10 वर्षों के लिए अपने चाबहार बंदरगाह को संचालित करने के लिए ईरान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह बंदरगाह दक्षिणी ईरान में अरब सागर पर स्थित है और ग्वादर बंदरगाह के आसपास के क्षेत्र में है। चाबहार बंदरगाह का भारत के लिए वाणिज्यिक और सामरिक दोनों महत्व है और यह सौदा चीन और पाकिस्तान को पसंद नहीं आया है। यह सौदा भारत के ऊर्जा हितों की रक्षा करता है और अरब सागर में हमारे समुद्री हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है। यह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान के लिए एक सीधा पारगमन मार्ग भी देता है। इस सौदे पर ऐसे समय में विचार किया गया था जब भारत ने अगस्त 2021 के तालिबान काल से पहले अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भारी निवेश किया था। बदले हालात में भी, बंदरगाह इस क्षेत्र में भारत के आर्थिक हितों के लिए काफी क्षमता रखता है।

गंदी हरकतों से बाज नहीं आ रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान अपनी गंदी हरकतों से बाज नहीं आता है। उसने बलूचिस्तान में मौजूदा अशांति और अस्थिरता के लिए भारत पर आरोप मढ़ा, लेकिन नई दिल्ली ने उसके दावों को तार-तार कर सिरे से खारिज कर दिया है। पाकिस्तान में मौजूदा आर्थिक संकट को देखते हुए, बलूचिस्तान में अशांति एक ऐसे देश के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो आधिकारिक तौर पर ‘राज्य प्रायोजित आतंकवाद’ का समर्थन करता है। एक अस्थिर पाकिस्तान भारत के हित में नहीं है, लेकिन भारत को अपनी सीमाओं और क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा करनी होगी। दिवालिया पाकिस्तान चीन का कठपुतली देश बन गया है और भारत के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां हैं: पश्चिम में पाकिस्तान से और अब पूरब से भी, बांग्लादेश के रूप में। दोनों पड़ोसी देश अब चीन के साये तले हैं और भारत को कुशाग्र कूटनीति और आवश्यक सैन्य ताकत के साथ संतुलन कायम करना होगा।

 

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