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चुनौती कड़ी, जीत बड़ी

ओडिशा में 21 में से 20 लोकसभा सीट जीतते हुए विधानसभा में भी पहली बार सरकार, तमिलनाडु की सनातन विरोधी राजनीति में गहरी थर्राहट और केरल के अभेद्य कहे जाने वाले वामपंथी गढ़ में स्पष्ट दरार पैदा करना राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के प्रदर्शन की दृष्टि से अभूतपूर्व घटना है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jun 9, 2024, 12:06 pm IST
inभारत, सम्पादकीय

वर्ष 2024 की दूसरी तिमाही में आम चुनाव के नतीजे कई दृष्टि से असाधारण रहे। यह केवल राजनीतिक प्राप्तियों, उत्साह या निराशा की बात नहीं है, बल्कि इन परिणामों के गहरे राष्ट्रीय निहितार्थ भी हैं। पहले बात चुनाव, राजनीतिक गठबंधन और उनके अग्रणी दल के प्रदर्शन की। परिणामों ने साफ कर दिया कि भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना रहा है। राजग और नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार तीसरी बार देश की कमान संभालना कोई छोटी बात नहीं है। अब तक यह कीर्तिमान पहले प्रधानमंत्री के नाम दर्ज था।

हितेश शंकर

यह सच है कि भाजपा ने इस बार अपने लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था और यही कारण है कि उसके प्रदर्शन को उसी आंकड़े से आंकने पर समर्थक कुछ उदास और विरोधी कुछ ज्यादा ही प्रसन्न दिख रहे हैं। परंतु समझने वाली बात यह है कि भाजपा के लिए यह चुनाव ऐसा रहा जिसने पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण तक भगवा संकेतों और पदचिन्हों की ऐसी लहर खड़ी कर दी, जो पहले कहीं नहीं थी। ओडिशा में 21 में से 20 लोकसभा सीट जीतते हुए विधानसभा में भी पहली बार सरकार, तमिलनाडु की सनातन विरोधी राजनीति में गहरी थर्राहट और केरल के अभेद्य कहे जाने वाले वामपंथी गढ़ में स्पष्ट दरार पैदा करना राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के प्रदर्शन की दृष्टि से अभूतपूर्व घटना है।

अब बात दूसरे (इंडी) गठबंधन की, जिसकी अगुआई कांग्रेस कर रही थी। भाजपा को लक्ष्य न भेद सकने का ताना देने वाली कांग्रेस भूल गई कि उसने अपने प्रदर्शन के बारे में क्या घोषणा की थी। अपने बूते 295 सीट लाने की ताल ठोकने वाला अगर 99 पर अटक जाए और इस पर भी 240 वाले की खिल्ली उड़ाए तो मजाक किसका उड़ेगा! यह ऐसा ही है जैसे ‘कम्पार्टमेंट’ लाने वाला कोई छात्र ‘डिस्टिंगशन’ लाने वाले विद्यार्थी की हंसी उड़ाए।

इस गठबंधन की उलटबांसी यह है कि मतदाता को बांटने की रणनीति बुनते-बुनते यह स्वयं बुरी तरह बंटा हुआ है। स्वीकारने से ज्यादा एक-दूसरे को नकारने की स्थिति यह थी कि केरल में वामपंथी राहुल को ललकार रहे थे, बंगाल में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता रहे अधीर रंजन चौधरी को ममता बनर्जी ने हराने की शर्त लगा रखी थी। और दिल्ली… यहां तो परिणाम के अगले ही दिन आम आदमी पार्टी ने साथ छोड़ने का सार्वजनिक ऐलान कर दिया।
अब बात गठबंधनों से परे, चुनाव परिणाम और राष्ट्रीय निहितार्थों की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्र के तौर पर पिछला एक दशक भारत के लिए विलक्षण उपलब्धियां वाला दौर रहा है। चाहे बात वैश्विक महामारी के दौरान विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश को सुरक्षित रखने की हो या आधारभूत ढांचे के अभूतपूर्व विकास की, चाहे आतंकवाद के विरुद्ध विश्व को चेताने और एकजुट करने का प्रयास हो या जी-20 का अत्यंत सफल आयोजन, इन सब घटनाओं ने विश्व फलक पर भारत की प्रतिष्ठा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्थापित किया है।

अपने बूते 295 सीट लाने की ताल ठोकने वाला अगर 99 पर अटक जाए और इस पर भी 240 वाले की खिल्ली उड़ाए तो मजाक किसका उड़ेगा! यह ऐसा ही है जैसे ‘कम्पार्टमेंट’ लाने वाला कोई छात्र ‘डिस्टिंगशन’ लाने वाले विद्यार्थी की हंसी उड़ाए।

ऐसे में चुनाव से ठीक पहले, अफवाह तंत्र पर आधारित निज्जर हत्याकांड का मुद्दा भारत सरकार के विरुद्ध उठाना या फिर भारतीय वैक्सीन के विषय में ‘रक्षक को भक्षक’ बताने की अंतरराष्ट्रीय कुचेष्टा, यह कोई छोटी घटना नहीं है।

यह भाजपा नहीं, बल्कि भारत का प्रश्न है और मुद्दों को सुलगाने के समय का चयन बताता है कि कई शक्तियां भाजपा के बहाने भारत पर निशाना साधने की मुहिम में लगी थीं। राजनीति में आरोप- प्रत्यारोप और भाषाई वार होते हैं। कई बार भाषा का स्तर भी गिरता है, किंतु आपसी लड़ाई में विदेशी शक्तियों से हाथ मिलाने का दुष्कृत्य भी इस लोकसभा चुनाव में देखने में आया। पहले केवल आरोप होते थे, किंतु इस बार एक विदेशी कंपनी ने कांग्रेस का नाम लेकर यह घोषणा की एक अन्य विदेशी कंपनी ने एआई तकनीक का प्रयोग करते हुए कांग्रेस के लिए ‘प्रोपेगेंडा’ या कहिए प्रपंच का पूरा जाल बुना। चुनाव में ताल ठोकना एक बात है, किंतु इसके लिए विदेशी शक्तियों को न्योतना, उनसे हाथ मिलाना-कांग्रेस अब इस खेल में खुलकर शामिल हो चुकी है।

याददाश्त पर जरा जोर डालें

कैंब्रिज एनालिटिका घोटाला कुछ साल पहले इसी तरह उजागर हुआ था। कांग्रेस के पोस्टर तब भी उस खतरनाक विदेशी कंपनी के दफ्तर में चमक रहे थे।

18वीं लोकसभा चुनाव के सातवें और अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले एक और विदेशी तकनीकी दिग्गज कंपनी ओपनएआई ने कांग्रेस से जुड़ा बड़ा खुलासा किया है। दावा है कि राजनीतिक मुहिम चलाने में विशेषज्ञ इस्राएली कंपनी STOIC ने ‘आपरेशन जीरो जेनो’ मुहिम के तहत भारत विरोधी एजेंडा चलाया, ताकि लोकसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं को प्रभावित कर चुनाव परिणाम बदला जा सके। इसके लिए सरकार के विरुद्ध नकारात्मक, जबकि कांग्रेस की प्रशंसा में कसीदे काढ़ने का काम हुआ। इस खतरनाक षड्यंत्र में STOIC ने जिस एआई को टूल बनाया, वह ओपनएआई का ही एक मॉडल था, जिसे इस षड्यंत्र का पता मई में लगा।

कुछ साल पहले इसी तरह कैंब्रिज एनालिटिका घोटाला हुआ था। कैंब्रिज एनालिटिका और उसकी मूल कंपनी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस लैबोरेटरीज ने अवैध तरीके से 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स का डेटा चुराया और उसका इस्तेमाल अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में किया था। बाद में पता चला कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने भी कैंब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थीं। उस समय पत्रकार और टेक ब्लॉगर जेमी बर्लेट की एक डॉक्यूमेंट्री वायरल हुई थी, जिसमें कैंब्रिज एनालिटिका के कार्यालय में कांग्रेस का चुनाव चिह्न दिख रहा था। उस समय तो कांग्रेस ने इस आरोप को नकार दिया था। अब ‘आपरेशन जीरो जेनो’ में भी कांग्रेस का नाम आया है। संयोग एक बार होता है, किंतु जब एक ही ‘पैटर्न’ बार-बार सामने आए तो वह सिवाय षड्यंत्र के कुछ और नहीं होता।

कैंब्रिज एनालिटिका की घटना हैरान करने वाली थी। राजनीतिक रुझान बनाने या बिगाड़ने के लिए तकनीक की इस सेंधमारी का लगभग हर फेसबुक उपयोगकर्ता में डर दिखा था। हालांकि डेटा गोपनीयता व चुनावी राजनीति पर सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर जो चिंतन-मंथन शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे मंद पड़ गया। परंतु कैंब्रिज एनालिटिका की तर्ज पर चुने हुए लोकतंत्र को तकनीक के सहारे प्रभावित करने वाली ‘एल्गोरिदम’ और षड्यंत्रकारी अपने काम में लगे रहे।

कैंब्रिज एनालिटिका की घटना पर न तो तब लोगों को सहसा विश्वास हुआ था, न अब तकनीक के माध्यम से विश्व के सबसे उन्नत, विकसित और पुराने कहे जाने वाले लोकतंत्र को लड़खड़ाने का षड्यंत्र भी रचा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई भी आसानी से इस तकनीकी षड्यंत्र का पता लगा सकता था। किंतु ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि किसी ने इस दृष्टि से न तो देखा और न ही सोच सका।

‘आपरेशन जीरो जेनो’ को कैंब्रिज एनालिटिका की अगली कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह न मानने का कोई भी स्पष्ट कारण नहीं है कि भारतीय राजनीति के पुराने खिलाड़ी और कांग्रेस के कद्दावर नेता तकनीक के इस अंतरराष्ट्रीय हित पोषक षड्यंत्र पर काम नहीं कर रहे हैं। आज कनाडा की शह पर पंजाब में खालिस्तानी अलगाववादी शक्तियां फिर से सिर उठा रही हैं। यह कांग्रेस की देन है। कांग्रेस ने ही खालिस्तानियों को खड़ा कर पंजाब को अलगाववाद की आग में झोंका।

भारत-कनाडा के बीच विवाद का एक कारण खालिस्तानी अलगाववाद की राजनीति भी है। याद कीजिए कनाडा ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को कब मुद्दा बनाया था? कनाडा ने निज्जर की हत्या का आरोप भारतीय अधिकारियों पर उस समय लगाया, जब भारत जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा था। खालिस्तानी आतंकी कनाडा में भारतीय राजनयिकों, उनके परिसरों, दूतावासों और पूजास्थनों को निशाना बनाते हैं, तोड़फोड़ करते हैं, मानव तस्करी, ड्रग सिंडिकेट और संगठित अपराध को अंजाम दे रहे हैं, लेकिन भारत के बार-बार कहने पर भी कनाडा उन पर कार्रवाई नहीं कर रहा है।

भारत के विरुद्ध विमर्श के इस जाल को समझने के लिए वापस ‘आपरेशन जीरो जेनो’ पर लौटें। यह एक बड़ा तकनीकी षड्यंत्र था, जो लोकसभा चुनाव में जनता की राय को प्रभावित करने के लिए रचा गया। रळडकउ ने एआई का इस्तेमाल कर ‘नैरेटिव’ गढ़े, जो राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता था। उसका उद्देश्य एक राजनीतिक पार्टी को दूसरी पार्टी की तुलना में बेहतर दिखाना था, ताकि जन धारणा और विमर्श को मनचाहे तरीके से मोड़ा जा सके।

आपने शायद ध्यान दिया होगा। सोशल मीडिया पर शुरू से लेकर अंतिम चरण के मतदान तक खास तरह के ‘नैरेटिव’ तैर रहे थे, जिसमें सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को निशाना बनाया जा रहा था। दूसरी तरफ कांग्रेस और सपा के पक्ष में ‘कंटेंट’ परोसा जा रहा था। इस मुहिम में घरेलू राजनीति के साथ गाजा संघर्ष जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी शामिल किए गए, ताकि मतदाता इससे प्रभावित होकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाएं। ‘कंटेंट’ एआई की मदद से तैयार किए गए, फिर उन्हें विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैलाया गया। लेकिन अंतिम चरण के मतदान के बाद अचानक ऐसे पोस्ट दिखने बंद हो गए।

‘आपरेश जीरो जेनो’ ने डिजिटल युग की कमजोरियों को उजागर किया, जो सूचना-युद्ध और लोकतांत्रिक चुनावों की पवित्रता को कम कर सकते हैं। यह घटना चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और मतदाताओं को सतर्क रहने का संकेत देती है। साथ ही, यह विमर्श भी खड़ा करती है कि राजनीति में एआई के नैतिक उपयोग और तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून होना चाहिए।

बहरहाल,एआई के इस हस्तक्षेप ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को डिजिटल खतरों से आगाह किया है। इन घटनाओं ने चुनावी प्रकिया में पारदर्शिता और नैतिकता की गंभीर चिंताओं को जन्म दिया है। तकनीक का इस प्रकार इस्तेमाल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकता है और जनता के विश्वास को हिला सकता है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार नियामक संस्थाओं के अतिरिक्त राजनैतिक दल भी भविष्य में ऐसे दुरुपयोग को रोकने के उपाय करें।

इन घटनाओं के बाद यह आवश्यक हो गया है कि चुनावी प्रक्रियाओं की सुरक्षा के लिए कड़े नियम और निगरानी तंत्र बनाए जाएं। साथ ही, जनता को भी जागरूक किया जाना चाहिए ताकि वे ‘फेक न्यूज’ और दुष्प्रचार से प्रभावित न हों। तकनीक के नैतिक उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सख्त नियमों के बिना विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में रहेगी।

कैंब्रिज एनालिटिका घोटाला और ‘आपरेशन जीरो जेनो’ ने यह स्पष्ट किया है कि तकनीक का दुरुपयोग करके राजनीति को प्रभावित करने के प्रयास हो रहे हैं। कांग्रेस का नाम दोनों विवादों से जुड़ा होने के कारण उनकी चुनावी रणनीतियों पर गंभीर सवाल उठे हैं।

@hiteshshankar

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