Tilka Manjhi Birth anniversary : अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के एक गुमनाम नायक तिलका मांझी
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Tilka Manjhi Birth anniversary : अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के एक गुमनाम नायक तिलका मांझी

कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि तिलका मांझी के नेतृत्व में हुआ विद्रोह विदेशी शासन के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई थी

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2024, 03:03 pm IST
in भारत

तिलका मांझी 18वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के एक गुमनाम नायक हैं। पूर्वी भारत के वनवासी संथाल समुदाय से संबंधित, तिलका मांझी भारत को विदेशी चंगुल से मुक्त कराने के लिए आम लोगों की मजबूत भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया था। हालांकि, तिलक मांझी के बलिदान के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

तिलका मांझी पक्षपातपूर्ण इतिहास का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जो आजादी के बाद लोगों को पढ़ाया गया। तिलका मांझी का बलिदान प्रेरणादायक है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से लगभग 100 साल पहले, अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। तिलका मांझी उस आम आदमी का प्रतिनिधित्व करते थे, जो किसी भी विदेशी आक्रमण के खिलाफ मजबूती से लड़ने को तैयार था। कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि तिलका मांझी के नेतृत्व में हुआ विद्रोह विदेशी शासन के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई थी।

तिलका मांझी का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू यह तथ्य है कि वह संथाल समुदाय, एक वनवासी समुदाय से हैं। संथाल समुदाय अभी भी पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। तिलका मांझी का संघर्ष इतना प्रेरणादायक है कि प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ने उनके जीवन पर एक उपन्यास भी लिखा था।

तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी, 1750 को सुल्तानगंज, जो वर्तमान में बिहार में है, के तिलकपुर नामक गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुन्दर मुर्मू था। सुंदरा ने अपने बेटे का नाम जबरा रखा, जो बाद में ग्राम प्रधान बना। पहाड़िया भाषा में ग्राम प्रधान को मांझी कहा जाता है जबकि “तिलका” का अर्थ गुस्से में लाल आंखों वाला व्यक्ति होता है। जबरा आगे चलकर ग्राम प्रधान बना और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को “मांझी” कहकर संबोधित करने की प्रथा है। यही कारण है कि जबरा को तिलका मांझी के नाम से जाना जाने लगा। ब्रिटिश रिकॉर्ड में उनका वर्णन जबरा पहाड़िया के रूप में किया गया है।

तिलका मांझी का बचपन घने जंगलों में बीता। वह शारीरिक व्यायाम के शौकीन थे और कुश्ती खेलना पसंद करते थे। पेड़ों पर चढ़ना और पहाड़ियों पर चलना उनके जीवन का हिस्सा था। उनकी जीवनशैली ने उन्हें निडर बना दिया। तिलका मांझी एक जन्मजात सेनानी थे और दमनकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ भागलपुर के आसपास छोटी-छोटी बैठकें आयोजित करते थे। वे ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किये जा रहे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से बेहद नाराज थे। वह वनवासियों में देशभक्ति की भावना जगाते थे और उनसे ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ संघर्ष में भाग लेने की अपील करते थे। इस प्रक्रिया में, तिलका मांझी ने वनवासियों को संगठित किया और उन्हें विदेशी प्रभुत्व के खिलाफ तीर और धनुष चलाने के लिए प्रशिक्षित किया।

वर्ष 1770 में जब संपूर्ण संथाल क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। लोग भूख से मर रहे थ। तिलका मांझी ने ईस्ट इंडिया कंपनी का खजाना लूटकर स्थानीय निवासियों में बांट दिया। उनके इस कार्य से अनेक वनवासी प्रेरित होकर तिलका मांझी की सेना में शामिल हो गए। तिलका मांझी विदेशी सत्ता की मदद करने वाले अधिकारियों और जनता को लूटते रहे। दमनकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ उनका संघर्ष 1771 में शुरू हुआ और 1784 तक जारी रहा। तिलका मांझी ने लोगों के बीच लोकप्रिय अशांति का प्रतिनिधित्व किया क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूखे की स्थिति के दौरान भी उनका शोषण जारी रखा। तिलका मांझी इतने बहादुर सेनानी थे कि उन्होंने 1778 में ईस्ट इंडिया कंपनी को रामगढ़ कैंप से खदेड़ दिया था। उस समय, वॉरेन हेस्टिंग्स इस क्षेत्र के सैन्य शासन का नेतृत्व कर रहे थे। हेस्टिंग्स ने तिलका के नेतृत्व वाले विद्रोह को दबाने के लिए कैप्टन ब्रुक की कमान में 800 ब्रिटिश सैनिकों को भेजा। ब्रुक ने अगले दो वर्षों तक संथाल विद्रोह का दमन जारी रखा। जेम्स ब्राउन उनके उत्तराधिकारी बने।

अंततः ऑगस्टस क्लीवलैंड को बंगाल प्रांत में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासक नियुक्त किया गया। इस प्रकार वह राजस्व के कलेक्टर और भागलपुर, मुंगेर और राजमहल जिलों में दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) के न्यायाधीश बन गए। क्लीवलैंड संथालों के प्रति शत्रुतापूर्ण था। दुर्भाग्य से, क्लीवलैंड भारी प्रयासों के बाद कुछ वनवासियों को अपनी मदद के लिए मनाने में सफल रहा। हालांकि, तिलका मांझी को स्थानीय निवासियों का भारी समर्थन मिलता रहा। तिलका मांझी ने अपने समर्थकों को संदेश भेजने के लिए पत्तों का इस्तेमाल किया। वह पत्तों पर “वी मस्ट यूनाइट” लिखते थे। तिलका मांझी और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष भयंकर हो गया। कंपनी के सैनिकों को तिलका मांझी सेना ने निशाना बनाया, जिन्होंने तीर और धनुष का इस्तेमाल किया। तिलका मांझी खुद इस संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे। 13 जनवरी, 1784 को तिलका ने भागलपुर पर हमला कर दिया। वह एक पेड़ पर चढ़ गये और क्लीवलैंड को जहर बुझे तीर से मार डाला। यह कंपनी के लिए बहुत बड़ा और अप्रत्याशित झटका था।

कंपनी के सैनिकों ने तिलका मांझी का पीछा किया, लेकिन सफल नहीं हो सके। कंपनी के अधिकारियों ने तिलका मांझी का पता जानने के लिए वनवासियों को लालच देना शुरू कर दिया। दुर्भाग्य से वनवासियों में से एक ने तिलका मांझी को धोखा दे दिया। ब्रिटिश कमांडर आयर कूट ने तिलका के ठिकाने पर हमला कर दिया। उस रात, तिलका और उनकी क्रांतिकारी सेना नृत्य और गीतों के साथ जश्न मना रही थी और अचानक हमले से बच गई। तिलका तो किसी तरह बच गये, लेकिन उनके कई साथी सैनिक बलिदान हो गए। बाकियों को बंदी बना लिया गया। उन्होंने सुल्तानगंज के पहाड़ों में शरण ली और कंपनी सेना पर अपने गुरिल्ला हमले जारी रखे।

कंपनी ने सुलतानगंज और भागलपुर के पहाड़ी इलाकों को घेर लिया। पहाड़ की ओर जाने वाले सभी मार्गों को अवरुद्ध कर दिया गया, जिससे किसी भी खाद्यान्न या अन्य सहायता को पहाड़ों तक पहुंचने से रोक दिया गया। गुरिल्ला सेना अस्त-व्यस्त थी। उसकी सेना भूख से मरने लगी। तिलका ने ब्रिटिश सेना से मुकाबला करने का निर्णय लिया। संथालों ने कंपनी सेना पर हमला किया, लेकिन युद्ध के दौरान तिलका मांझी को पकड़ लिया गया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने उसे चार घोड़ों से बांध दिया और उसे पूरे रास्ते घसीटते हुए भागलपुर ले गए। मीलों तक घसीटे जाने के बावजूद तिलका मांझी जीवित थे। 1785 में जनवरी के मध्य के आसपास, भागलपुर में, जब हजारों लोग देख रहे थे, तिलका मांझी ने फांसी का फंदा चूम लिया और उन्हें एक विशाल बरगद के पेड़ से लटका दिया गया। उस वक्त उनकी उम्र महज 35 साल थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी को लगा कि तिलका मांझी को फाँसी देने से किसी भी प्रकार का विरोध या विद्रोह रुक जायेगा। लेकिन तिलका मांझी तो अभी शुरुआत ही कर रहे थे। भागलपुर न्यायालय परिसर में तिलका मांझी की प्रतिमा स्थापित की गई है। उनके सम्मान में भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर तिलका मांझी के नाम पर रखा गया।

Topics: तिलका मांझी का योगदानतिलका मांझी का जीवनTilka ManjhiContribution of Tilka ManjhiLife of Tilka ManjhiFreedom Fighter Tilka Manjhiपाञ्चजन्य विशेषस्वतंत्रता संग्राम सेनानीFreedom Fighterतिलका मांझी
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