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हिंदू महिलाओं के साथ हो रही हिंसा पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की घातक चुप्पी

मात्र हिन्दू लड़कियों के साथ हुई मजहबी हिंसा पर ही नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कियां जो मजहबी कट्टरता का शिकार होती हैं, उनपर भी बात करने से उन दिनों में भी मीडिया कतराता है जो दिन महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा का प्रतिकार करने के लिए निर्धारित हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Nov 25, 2023, 09:47 am IST
in विश्लेषण
मजहबी कट्टरता का शिकार हो रही महिलाएं क्या बन पाएंगी अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा?

मजहबी कट्टरता का शिकार हो रही महिलाएं क्या बन पाएंगी अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा?

25 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस का आयोजन करता है। संयुक्त राष्ट्र वीमेन की वेबसाइट के अनुसार यह एक 16 दिनों का अभियान होता है, जिसमें महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा का विरोध किया जाता है। इस आयोजन में महिलाओं पर की जा रही हर प्रकार की हिंसा पर बात होती है। फिर चाहे वह घरेलू हिंसा हो, यौन हिंसा हो या हत्या।

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा महिलाओं के प्रति हो रहे हर प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन के लिए कन्वेंशन को अपनाया था, मगर महिलाओं के प्रति हिंसा में अधिक कमी नहीं आई। अत: महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा का उन्मूलन करने के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए और कदम उठाए गए और वर्ष 1981 से 25 नवम्बर को महिला अधिकार कार्यकर्ता महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन के लिए इस दिवस को मनाते हैं। इस दिन का चयन उन्होंने डोमिनिकन रिपब्लिक की तीन राजनीतिक महिला कार्यकर्ताओं की याद में किया, जिनकी हत्या डोमिनिकन रिपब्लिक के शासक राफेल ट्रूजिलो ने कर दी थी।

20 दिसंबर 1993 को महासभा ने 48/104 के संकल्प माध्यम से महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन पर घोषणा पत्र को अपनाया। इससे दुनिया भर में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

क्या यह दिन मात्र एक रस्म अदायगी है?

अब हर वर्ष 25 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक महिलाओं के प्रति हिंसा उन्मूलन को लेकर एक रस्म अदायगी होती है। रस्म अदायगी इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आज जब यूएन वीमेन महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन दिवस मनाएगा, विमर्श चलाएगा तो यह देखना होगा कि वह भारत की उन असंख्य महिलाओं पर हो रही हिंसा पर क्या बात करता है, जो मजहबी कट्टरता का शिकार हो रही हैं।

आए दिन भारत में हिन्दू लड़कियां और महिलाएं ऐसी हिंसा का शिकार हो रही हैं, जिसपर संवाद ही नहीं होता। दिनदहाड़े कोई उस पर चाकू से वार कर देता है तो कहीं कोई आफताब किसी श्रद्धा के टुकड़े-टुकड़े कर के रख देता है। कहीं कोई रकीबुर आता है जो रंजीत कोहली बनकर और एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी के जीवन के साथ खेल जाता है। तारा शाहदेव को इस्लाम न अपनाने को लेकर कुत्ते से कटवाया जाता है, उसे प्रतिबंधित मांस खिलाया जाता है, उसे इस सीमा तक प्रताड़ित किया जाता है कि शायद उसके जीवन में कोई आस ही न रहे। मगर फिर भी वह लड़ती है और भाग्य उसका साथ देता है कि वह उस प्रताड़ना से बाहर आती है और हाल ही में भारत के न्यायालय द्वारा रकीबुर को सजा सुनाई गयी है।

सोलह दिनों के विमर्श का हिस्सा बनेंगे?

मगर क्या इस प्रकार के उदाहरण इन सोलह दिनों के विमर्श का हिस्सा बनेंगे? इस विषय में संदेह है। यह संदेह इसलिए और गहरा हो जाता है क्योंकि पाकिस्तान में आए दिन हिन्दू लड़कियों का अपहरण और जबरन निकाह के मामले सामने आ रहे हैं, मगर अंरराष्ट्रीय विमर्श में यह पीड़ा भी गायब है। बांग्लादेश में मरती हुई हिन्दू लड़कियां भी विमर्श से गायब हैं, फिर हिंसा की बात मात्र रस्म अदायगी ही रह जाती है।

चूंकि यह अंतरराष्ट्रीय दिवस है, तो यह स्पष्ट है कि भारत में भी यूएन की ओर से आयोजन होते ही होंगे। मीडिया में विमर्श तो होता ही होगा, मगर कितने शर्म की बात है कि हिन्दू महिलाओं के साथ हो रही हिंसा के आंकड़ों पर मीडिया भी मौन रह जाता है। मात्र हिन्दू लड़कियों के साथ हुई मजहबी हिंसा पर ही नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कियां जो मजहबी कट्टरता का शिकार होती हैं, उनपर भी बात करने से उन दिनों में भी मीडिया कतराता है जो दिन महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा का प्रतिकार करने के लिए निर्धारित हैं। कश्मीर में कट्टरपंथियों के हाथों मारी गयी अमरीन भट की हत्या पर कोई बात नहीं होती है। फकीर आरिफ और सैय्यद महजबी की प्रेम कहानी सैय्यद महजबी के घरवालों को पसंद नहीं आती है और वह उन दोनों की हत्या कर देते हैं, मगर यह हत्या कोई विमर्श पैदा नहीं करती है और मीडिया से लेकर इन दिनों में आयोजन कराने वाले संगठन भी कहीं न कहीं मौन साध जाते हैं।

इस पर बात क्यों नहीं होती?

बलात्कारियों को फांसी देने की बात की जाती है, मगर जब लड़कियों के साथ दुष्कर्म करने वाले मजहब विशेष के होते हैं तो एक वर्ग विशेष द्वारा आरोपी का नाम न लेने की अपील कहकर एक प्रकार से बचाव किया जाता है। झारखण्ड में शाहरुख अंकिता को जलाकर मार डालता है तो अंकिता के मरने के बाद अंकिता को बदनाम करने के लिए मोर्फ की गयी तस्वीरें सोशल मीडिया में प्रचारित करके एक और तरीके की हिंसा को जन्म दिया जाता है। मगर फिर भी इन दिनों में कोई भी इस प्रकार की हिंसा पर बात नहीं करता। यह विमर्श ही नहीं आता कि क्यों निकिता तोमर को दिनदहाड़े गोली मार दी गयी या फिर क्यों दिनदहाड़े साक्षी की साहिल द्वारा की गयी हत्या पर बात नहीं होती?

निकिता तोमर से लेकर अंजू दोरजी तक

हाल ही में असम में अंजू की हत्या का भी मामला सामने आया है जिसमें उसके लिव इन साथी मानी खान का हाथ बताया जा रहा है। निकिता तोमर से लेकर अंजू दोरजी तक कई लड़कियां एक ऐसी सनक का शिकार हो चुकी हैं, जिसमें उनकी धार्मिक पहचान से जुड़ी हिंसा शामिल है, मगर इन हत्याओं पर इस पूरे पखवाड़े में बात होगी? इसमें संदेह है!

काश यूएन वीमेन द्वारा महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के लिए उन्मूलन दिवस पर इन महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा भी शामिल होती। काश कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों के जबरन निकाह पर बात होती! परन्तु यह काश मात्र काश तक ही सीमित रह जाते हैं, काश से आगे बात नहीं बढ़ पाती! महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के उन्मूलन पर तमाम विमर्श तब तक बेमानी और रस्म अदायगी हैं, जब तक इन हत्याओं पर बात नहीं होती, विमर्श नहीं होता!

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