आगरा से बीकानेर जा रही एक बस 22 मई 1996 को दौसा जिले के पास पहुंची थी। यात्रियों को शायद यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि अगले कुछ क्षणों में उनका जीवन हमेशा के लिए बदल जाएगा। बस में हुए बम विस्फोट ने 14 लोगों की जान ले ली और कई अन्य घायल हो गए। यह एक ऐसा आतंकवादी हमला था, जिसने हमेशा की तरह निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया।
अब लगभग तीन दशक बाद इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है। अब्दुल हमीद की मौत की सजा रद्द कर नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया गया है, जबकि उम्रकैद की सजा काट रहे पप्पू उर्फ सलीम को बरी कर दिया गया है। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा छह अन्य आरोपितों को बरी किए जाने के फैसले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप नहीं किया।
30 साल बाद भी न्याय की प्रक्रिया पर उठे सवाल
वस्तुतः सवाल यहीं से खड़े होते हैं और अनेक चिंताएं भी! बेशक! यह फैसला न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, किंतु सभ्य समाज से यह पूछता है कि क्या आतंकवाद जैसे जघन्य अपराधों के मामलों में न्याय की प्रक्रिया इतनी कमजोर, इतनी लंबी और इतनी असुरक्षित होनी चाहिए कि घटना के 30 वर्ष बाद भी पीड़ित परिवारों को यह स्पष्ट न हो कि उनके प्रियजनों की हत्या के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार है? क्या आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई सिर्फ पुलिस, जांच एजेंसियों और अदालतों की जिम्मेदारी है? या फिर समाज का भी कोई दायित्व है? ऐसे मामलों को लेकर वह इतनी जल्दी उदासीन क्यों हो जाता है?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूसरा पक्ष
कहने को कहा जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अब्दुल हमीद की मौत की सजा इसलिए रद्द की है क्योंकि प्रथम मुकदमे के दौरान उसे प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल सकी थी। किसी भी व्यक्ति को, चाहे उस पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न हो, निष्पक्ष सुनवाई और सक्षम कानूनी सहायता का अधिकार है, किंतु यहीं से इस मामले का दूसरा और अधिक असहज पक्ष सामने आता है।
पीड़ित परिवारों के तीन दशक का इंतजार
यदि किसी आतंकवादी हमले में 14 निर्दोष लोग मारे जाते हैं और वर्षों बाद भी मामला अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाता, तो इस देरी का उत्तरदायित्व किसका है? पीड़ितों के परिवारों ने इन तीन दशकों में क्या-क्या सहा होगा? उनके घरों में जिन लोगों की हत्या हुई, उनके बच्चे बड़े हो गए होंगे, कुछ के माता-पिता बूढ़े होकर संसार से विदा हो गए होंगे और कई परिवारों की पूरी पीढ़ी इस प्रतीक्षा में बीत गई होगी कि आखिर उनके अपनों की हत्या का न्याय मिलेगा!
न्याय में देरी और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल
अब यहां कह सकते हैं कि न्याय में देरी एक प्रशासनिक समस्या है, पर आतंकवाद के मामलों में यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक मनोविज्ञान से जुड़ा हुआ प्रश्न है, जिसे नहीं भुलाया जाना चाहिए। जब किसी बड़े आतंकी हमले के बाद जांच वर्षों तक चलती है, मुकदमे दशकों तक खिंचते हैं और अंततः आरोपित साक्ष्यों के अभाव में बरी हो जाते हैं, तब सबसे बड़ा संकट आखिर क्या हो सकता है? वास्तव में यह इसी तरह के निर्णयों से दिखता है। स्वाभाविक तौर पर ऐसे मामलों में संकट यह होता है कि समाज का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होने लगता है।
जांच एजेंसियों और अभियोजन की जवाबदेही
ऐसे में प्रश्न यह भी उठता है कि जब जांच एजेंसियां पर्याप्त साक्ष्य एकत्र नहीं कर पातीं, अभियोजन पक्ष यदि मामले को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाता, गवाह यदि वर्षों तक सुरक्षित नहीं रह पाते और न्यायिक प्रक्रिया यदि पीढ़ियों तक चलती रहती है, तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? न्यायालय वही देख सकता है, जो उसके सामने प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। फिर कौन ऐसे प्रकरणों के लिए जिम्मेदार है?
दौसा बस बम विस्फोट मामला क्यों बना बड़ी चिंता
एक तरह से देखें तो दौसा बस बम विस्फोट का मामला इस प्रश्न को और तीखा बनाता है। एक ओर 14 लोगों की हत्या हुई। दूसरी ओर, एक आरोपित की मौत की सजा पर सर्वोच्च न्यायालय ने इसलिए रोक लगाई कि उसे प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिली थी। पप्पू उर्फ सलीम का बरी होना भी इसी व्यापक प्रश्न को सामने लाता है। क्या वह वास्तव में निर्दोष था? क्या अभियोजन पक्ष उसके विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं कर पाया? क्या जांच में कोई कमी रही? आम नागरिक के मन में उठने वाले ये प्रश्न स्वाभाविक हैं।
यदि किसी आतंकी घटना में इतने लोग मारे गए, तो वास्तविक अपराधी कौन थे? और यदि किसी को दोषी ठहराने योग्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तो जांच व्यवस्था ने उन प्रमाणों को सुरक्षित क्यों नहीं रखा?
समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण
यहीं समाज की भूमिका भी सामने आती है। हम आतंकवादी हमले के बाद कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त करते हैं। मोमबत्तियां जलती हैं, बयान आते हैं, समाचार चैनलों पर बहस होती है, सोशल मीडिया पर भावनाएं उमड़ती हैं। फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। पीड़ित परिवार अकेले रह जाते हैं। मुकदमे अदालतों में चलते रहते हैं। तारीखें पड़ती रहती हैं। आरोपी जेलों में रहते हैं या कभी-कभी लंबे मुकदमे के बाद बरी हो जाते हैं। और समाज अपनी अगली खबर की ओर बढ़ जाता है। क्या यह सभ्य समाज की संवेदनहीनता नहीं है?
आतंकवाद के मामलों में समयबद्ध न्याय क्यों जरूरी
इसे समझ लें कि आतंकवाद का सबसे बड़ा उद्देश्य समाज में भय पैदा करना और राज्य की क्षमता को चुनौती देना है, इसलिए आतंकवाद के मामलों में न्याय की प्रक्रिया भी उतनी ही दृढ़, वैज्ञानिक और समयबद्ध होनी चाहिए। अतः इस मामले से सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई कठोर कानून बनाने से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए पेशेवर जांच, आधुनिक फोरेंसिक व्यवस्था, सुरक्षित गवाह प्रणाली, सक्षम अभियोजन और समयबद्ध न्याय आवश्यक है।
साथ ही यह भी कि आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच में किसी प्रकार की लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक भूल मानकर छोड़ न दिया जाए। एक छोटी-सी जांच संबंधी चूक कभी-कभी पूरे मामले को कमजोर कर सकती है और वर्षों की मेहनत को निष्फल बना सकती है।
पीड़ित परिवारों को अभी और करना होगा इंतजार
अब कहना यही होगा कि आज दौसा बस बम विस्फोट के पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला एक नए अध्याय की शुरुआत है। उन्हें फिर प्रतीक्षा करनी होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने नए ट्रायल को एक वर्ष में पूरा करने का प्रयास करने को कहा है। अब यह देखना होगा कि तीन दशक पुराना यह मामला फिर से उसी अंतहीन कानूनी यात्रा में न फंस जाए।
एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह पीड़ित के न्याय के अधिकार को कितनी गंभीरता से लेता है। आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिलनी चाहिए, भले ही यह लोकतंत्र का अनिवार्य सिद्धांत हो, लेकिन कहीं अधिक जरूरी है कि 14 निर्दोष नागरिकों की हत्या का सच सामने आए। यह समाज और राज्य का नैतिक दायित्व है।
आतंकवाद के मामलों में न्याय व्यवस्था के सामने चुनौती
यदि आतंकवादी हमले के बाद आतंकवादी बच निकलें, दोषी और निर्दोष के बीच अंतर स्पष्ट न हो पाए और पीड़ित परिवार दशकों तक न्याय की प्रतीक्षा करते रहें, तो यह केवल एक मुकदमे की विफलता नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए चेतावनी है।
और समाज? समाज को भी अपनी नींद से जागना होगा। क्योंकि आतंकवाद तब तक जीवित रहता है, जब तक आतंकवादी सक्रिय रहते हैं। वह तब भी जीवित रहता है, जब समाज पीड़ितों को भूल जाता है, न्याय में देरी को सामान्य मान लेता है और हर बड़े अपराध के बाद कुछ दिनों के आक्रोश के बाद फिर अपनी सुविधाजनक नींद में लौट जाता है।
दौसा की वह आग की लपटों और बम से चीथड़े हो चुके मानव अंगों से लिपटी वह बस आज भी हमसे पूछ रही है— 14 निर्दोष लोगों की मौत का सच आखिर कब पूरी तरह सामने आएगा?











