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यूएन के मंच से गूंजा भारत का गणित ज्ञान

संयुक्त राष्ट्र में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया के सामने भारत की प्राचीन गणितीय विरासत का उल्लेख करते हुए मानव सभ्यता के बौद्धिक इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने का आह्वान किया है। “ग्लोबल डिफ्यूजन ऑफ मैथमेटिक्स” प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि विज्ञान और गणित के इतिहास को एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारत ने गणित को जन्म दिया और उसे विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाया।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
May 12, 2026, 02:18 pm IST
inविश्व

संयुक्त राष्ट्र में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया के सामने भारत की प्राचीन गणितीय विरासत का उल्लेख करते हुए मानव सभ्यता के बौद्धिक इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने का आह्वान किया है। “ग्लोबल डिफ्यूजन ऑफ मैथमेटिक्स” प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि विज्ञान और गणित के इतिहास को एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारत ने गणित को जन्म दिया और उसे विश्व के कोने-कोने तक पहुंचाया।

दरअसल, आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और कंप्यूटिंग का युग पूरी दुनिया को बदल रहा है, तब यह स्वीकार करना और भी आवश्यक हो गया है कि जिस ‘बाइनरी सिस्टम’ पर आधुनिक डिजिटल संसार आधारित है, उसकी प्रारंभिक अवधारणा भारत में तीसरी शताब्दी में आचार्य पिंगल के “छंद सूत्र” में दिखाई देती है। यह भारत की उस वैज्ञानिक चेतना का प्रमाण है, जो हजारों वर्षों से ज्ञान, तर्क और गणना की परंपरा को आगे बढ़ाती रही है।

वैदिक काल से प्रारंभ हुई गणित की धारा

भारत में गणित का इतिहास वैदिक युग तक जाता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में संख्याओं, गणना और ज्यामितीय अवधारणाओं के अनेक संदर्भ मिलते हैं। विशेष रूप से “शुल्ब सूत्र” भारतीय ज्यामिति का आधार माने जाते हैं। बौधायन, आपस्तंब और कात्यायन जैसे ऋषियों ने यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिए जो ज्यामितीय सिद्धांत दिए, वे बाद में विश्व गणित का महत्वपूर्ण हिस्सा बने।

उसी प्रमेय का आधार है जिसे आज दुनिया “पाइथागोरस थ्योरम” के नाम से जानती है। उल्लेखनीय है कि बौधायन का काल पाइथागोरस से कई शताब्दियों पूर्व माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में ज्यामिति और गणितीय चिंतन अत्यंत प्राचीन था।

शून्य : भारत की वह खोज जिसने दुनिया बदल दी

यदि भारतीय गणित की सबसे क्रांतिकारी देन की बात की जाए तो वह है- “शून्य”। आज कंप्यूटर विज्ञान से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक, हर गणना शून्य के बिना अधूरी है। भारतीय गणितज्ञ Aryabhata और बाद में Brahmagupta ने शून्य को गणितीय रूप में व्यवस्थित किया।

628 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ब्रह्मस्फुटसिद्धांत” में शून्य के साथ गणना के नियम बताए। उन्होंने पहली बार यह स्पष्ट किया कि किसी संख्या में शून्य जोड़ने या घटाने पर क्या परिणाम होगा। यह अवधारणा बाद में अरब देशों के माध्यम से यूरोप पहुंची और आधुनिक गणित का आधार बनी।

दशमलव प्रणाली भी भारत की ही देन है। 1 से 9 तक के अंकों और शून्य के संयोजन से बनने वाली यह प्रणाली इतनी वैज्ञानिक थी कि पूरी दुनिया ने इसे अपनाया। आज इसे “हिंदू-अरेबिक न्यूमेरल सिस्टम” कहा जाता है।

आर्यभट्ट और भारतीय खगोल-गणित की अद्भुत परंपरा

पांचवीं शताब्दी में जन्मे आर्यभट्ट ने गणित और खगोल विज्ञान को नई दिशा दी। उनकी पुस्तक “आर्यभटीय” में बीजगणित, त्रिकोणमिति और खगोलीय गणनाओं का अद्भुत समन्वय मिलता है। उन्होंने “पाई” का मान अत्यंत सटीक रूप में प्रस्तुत किया-

π≈3.1416

यह उस समय के लिए आश्चर्यजनक वैज्ञानिक उपलब्धि थी। आर्यभट्ट ने पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने की बात भी कही थी, जबकि उस समय विश्व के अनेक भागों में पृथ्वी को स्थिर माना जाता था। इसके साथ ही त्रिकोणमिति में “साइन” (ज्या) और “कोसाइन” जैसी अवधारणाओं का विकास भी भारत में हुआ। बाद में यही शब्द अरबी और लैटिन अनुवादों के माध्यम से यूरोप पहुंचे।

भास्कराचार्य और कैलकुलस की पूर्वपीठिका

12वीं शताब्दी के महान गणितज्ञ Bhaskara II, जिन्हें भास्कराचार्य कहा जाता है, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “लीलावती” और “बीजगणित” में जटिल गणनाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। “लीलावती” केवल गणित की पुस्तक नहीं थी, बल्कि गणित को रोचक बनाने का अद्भुत प्रयास भी इसे कहा जा सकता है। इसमें प्रश्नों को कविताओं और पहेलियों के माध्यम से समझाया गया है। भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण जैसी अवधारणाओं का उल्लेख न्यूटन से कई शताब्दियों पहले किया था।

उनके कार्यों में कैलकुलस के प्रारंभिक संकेत भी मिलते हैं। केरल स्कूल के गणितज्ञ माधवाचार्य ने बाद में अनंत श्रेणियों पर कार्य किया, जिसे आधुनिक कैलकुलस की पूर्वपीठिका माना जाता है।

पिंगल और बाइनरी सिस्टम की प्राचीन जड़ें

आज पूरी डिजिटल दुनिया बाइनरी सिस्टम पर आधारित है- 0,1, लेकिन इसकी प्रारंभिक संरचना भारत में आचार्य पिंगल के “छंद सूत्र” में दिखाई देती है। उन्होंने लघु और गुरु वर्णों के संयोजन से जो गणनात्मक पद्धति विकसित की, वही आगे चलकर बाइनरी लॉजिक का आधार बनी। यही कारण है कि विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में इसे आधुनिक एआई और डिजिटल युग की जड़ों से जोड़ा।

वैदिक गणित : गति, सरलता और वैज्ञानिकता

भारतीय ज्ञान परंपरा में “वैदिक गणित” विशेष स्थान रखता है। जगद्गुरु भारती कृष्ण तीर्थ द्वारा पुनर्प्रकाशित वैदिक गणित में 16 सूत्र और 13 उपसूत्र दिए गए हैं, जिनसे जटिल गणनाएं अत्यंत सरल हो जाती हैं।

जैसे प्रसिद्ध सूत्र- “एकाधिकेन पूर्वेण” और “निखिलं नवतश्चरमं दशतः”। इन सूत्रों के माध्यम से बड़ी संख्याओं का गुणा, भाग और वर्ग कुछ ही क्षणों में किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, 99 × 99 जैसी गणना को वैदिक पद्धति से तुरंत हल किया जा सकता है। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक देशों में वैदिक गणित को तेज मानसिक गणना की प्रभावी तकनीक के रूप में पढ़ाया जा रहा है।

भारत से विश्व तक ज्ञान का प्रवाह

आज इसके अनेक प्रमाण मौजूद हैं कि समय के साथ भारतीय गणित नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से कैसे अरब जगत तक पहुंचा। बगदाद के “हाउस ऑफ विजडम” में भारतीय ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हुआ। बाद में यही ज्ञान स्पेन के टोलेडो होते हुए यूरोप पहुंचा। अरबी विद्वानों ने भारतीय अंकों को अपनाया और यूरोप में फैलाया। यही कारण है कि आधुनिक वैज्ञानिक क्रांति की नींव में भारतीय गणित का अप्रत्यक्ष योगदान मौजूद है, इसलिए आज संयुक्त राष्ट्र में भारत का यह संदेश सिर्फ अपने लिए गौरवगान करना न होकर इतिहास को संतुलित दृष्टि से देखने की मांग थी, जिसकी अपेक्षा विश्‍व के सभी देशों से भारत ने की है।

भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने विश्‍व के देशों के सामने स्‍पष्‍ट कहा है कि सदियों तक वैज्ञानिक उपलब्धियों का श्रेय सीमित भूभागों तक केंद्रित रहा, जबकि वास्तविकता यह है कि ज्ञान मानव सभ्यता की साझी विरासत है। भारत ने कभी ज्ञान को सीमित नहीं किया। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना के साथ यहां ज्ञान को विश्व कल्याण का माध्यम माना गया। आज “ओपन सोर्स” की जिस अवधारणा की चर्चा होती है, उसकी चेतना भारतीय ज्ञान परंपरा में सदियों पहले से मौजूद थी।

कहना होगा कि आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग और डेटा विज्ञान के नए युग में प्रवेश कर रही है, तब भारत की प्राचीन गणितीय विरासत और अधिक प्रासंगिक हो उठी है। शून्य से अनंत तक, बीजगणित से कैलकुलस तक और बाइनरी सिस्टम से आधुनिक कंप्यूटिंग तक आप शोध एवं अध्‍ययन के आधार पर देख सकते हैं कि भारत ने विश्व को सिर्फ गणित ही नहीं दिया, बल्कि सोचने और तर्क करने की नई दृष्टि भी दी है।

संयुक्त राष्ट्र में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एसएएमएचआईटीए प्रोग्राम के तहत इंटरैक्टिव एग्जिबिशन, ‘ग्लोबल डिफ्यूजन ऑफ मैथमेटिक्स’ के रूप में लगी यह प्रदर्शनी आज बता रही है कि इस दिशा में भी भारत की विरासत बहुत व्‍यापक है। यह विरासत मेडिसिन, गणित, आर्किटेक्चर, फिलॉसफी, एस्थेटिक्स और लिटरेचर जैसे फील्ड्स में सर्वत्र फैली हुई है।

डिजिटल पैनल्स की एक सीरीज भारत की पुरानी मैथमेटिकल ताकत को दिखाती है, जिसमें बेसिक बाइनरी न्यूमेरिकल सिस्टम से लेकर अलजेब्रा और कैलकुलस तक शामिल हैं। यहां डिस्प्ले पर मैथमेटिकल लैंडमार्क थे जिनका जिक्र विदेश मंत्री जयशंकर ने किया ही है। बाइनरी सिस्टम जिसकी जड़ें पिंगला के तीसरी सदी के छंद सूत्र में हैं; पुराने श्लोकों की रिदम जो असल में एल्गोरिद्मिक थी; पाई के लिए इनफिनिट सीरीज और जिसे अब पाइथागोरस थ्योरम कहा जाता है, उसके प्रिंसिपल्स उनके भी बारे में विदेशमंत्री द्वारा यहां बताया गया।

डॉ. जयशंकर ने कहा है कि प्रतिनिधियों के प्रवेश द्वार पर लगाई गई यह प्रदर्शनी, जो संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों के शीर्ष राजनयिकों के लिए एक प्रमुख मार्ग है, आज के दौर में तकनीक को अपनाने को लेकर मौजूद पूर्वाग्रहों और धारणाओं को दूर करने में भी मददगार साबित होगी। वहीं, संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश का यहां कहना रहा है कि “यह प्रदर्शनी शून्य, दशमलव प्रणाली, बीजगणित, त्रिकोणमिति और अनंत जैसी मूलभूत अवधारणाओं की यात्रा को दर्शाती है, जिनकी शुरुआती सोच भारत में विकसित हुई और जो बगदाद तथा टोलेडो जैसे ज्ञान केंद्रों के माध्यम से विभिन्न संस्कृतियों तक पहुंचते हुए पूरी दुनिया में फैली।”

उन्होंने कहा, “भारत ने हमेशा अपना ज्ञान पूरी दुनिया को दिया है। आज की भाषा में ओपन सोर्स, यह बहुत पुराने समय से एक भारतीय मंत्र रहा है।” वस्तुतः उस ऐतिहासिक सत्य की पुनर्पुष्टि है कि भारत प्राचीनकाल से ही सिर्फ आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, वैज्ञानिक और गणितीय चेतना में भी कभी विश्‍व के तमाम देशों के बीच सबसे अधिक शक्‍तिशाली रहता रहा है।

Topics: संयुक्त राष्ट्रएस जयशंकरवैदिक युगभारत का गणित ज्ञानभारत गणितबाइनरी सिस्टमभारत वेद
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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