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तिब्बत नहीं, चीन का साथ चुना नेहरू ने

1950 में चीन के तिब्बत पर हमले के दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में चीन का समर्थन किया, जबकि सरदार पटेल और अन्य नेता तिब्बत के पक्ष में थे। इस निर्णय से तिब्बत चीन के नियंत्रण में गया, भारत की उत्तरी सीमा असुरक्षित हुई और पंचशील समझौते से क्षेत्रीय अखंडता भी कमजोर पड़ी

Written byप्रो. भगवती प्रकाश शर्माप्रो. भगवती प्रकाश शर्मा
Nov 21, 2025, 08:52 am IST
in विश्व, विश्लेषण
तत्कालीन चीनी राष्ट्राध्यक्ष माओत्से तुंग के साथ जवाहर लाल नेहरू

तत्कालीन चीनी राष्ट्राध्यक्ष माओत्से तुंग के साथ जवाहर लाल नेहरू

पवित्र तीर्थ कैलास-मानसरोवर सहित सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र, इरावती, सालवीन और मेकांग जैसी अक्षय नदियों के उद्गम-स्थल तिब्बत पर चीन के आक्रमण के समय जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में देशहित के विपरीत चीन का पक्ष लिया। इसके परिणामस्वरूप तिब्बत पर चीन का नियंत्रण स्थापित हो गया। यही नहीं, तत्कालीन मंत्रिमंडल के प्रमुख सहयोगियों के मत के विरुद्ध नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत पर चीन के आक्रमण से संबंधित प्रस्ताव पर चर्चा भी रुकवा दी थी।

प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा
समूह अध्यक्ष, पेसिफिक एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी, उदयपुर

उस समय उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल, असम के राज्यपाल श्री प्रकाश, देश के पूर्व गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी, रक्षा मंत्री बलदेव सिंह, वित्त मंत्री सी.डी. देशमुख, बाबू जगजीवन राम सहित विदेश विभाग के अनेक अधिकारी चाहते थे कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत का समर्थन करे। किंतु 24 नवंबर, 1950 को संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा में तिब्बत पर चीन के आक्रमण पर चर्चा के लिए सूचीबद्ध प्रस्ताव को नेहरू के निर्देश पर भारतीय प्रतिनिधि ने स्थगित कराने का आग्रह किया, जिसके परिणामस्वरूप वह चर्चा नहीं हो सकी।

वादे से मुकर गए नेहरू

1950 में तिब्बत पर पांच दिशाओं से चीनी सेना के आक्रमण के बाद तिब्बत ने सर्वप्रथम भारत को अपना सबसे विश्वसनीय संरक्षक और सर्वोत्तम मित्र मानते हुए अक्तू‍बर 1950 में आग्रह किया कि वह इस विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाए। किंतु उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संभवतः रूस और चीन के प्रभाव में आकर उत्तर दिया कि भारत अपनी ओर से कोई प्रस्ताव रखने में असमर्थ है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई अन्य देश तिब्बत की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रस्ताव लाता है, तो भारत उसका पूर्ण समर्थन करेगा। तब भारत 1950 से 1951 तक, दो वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य था। उस समय चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं था। कम्युनिस्ट चीन अर्थात् ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को संयुक्त राष्ट्र संघ से 1971 में औपचारिक मान्यता मिली।
यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) ने संयुक्त राष्ट्र में ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थायी सदस्यता भारत को देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन नेहरू ने इसे कम्युनिस्ट चीन की कीमत पर स्वीकार करने से मना कर दिया।

बहरहाल, जब नेहरू ने तिब्बत के आग्रह को अस्वीकार कर दिया, तब 15 नवंबर, 1950 को मध्य अमेरिका के एक छोटे से देश अल साल्वाडोर ने मानव नैतिकता के आधार पर तिब्बत की अपील को संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। तब अल साल्वाडोर की जनसंख्या लगभग 22 लाख और क्षेत्रफल मात्र 21,000 वर्ग किलोमीटर था। तिब्बत से 15,000 किलोमीटर से भी अधिक दूर स्थित इस छोटे राष्ट्र ने तिब्बत का समर्थन किया, परंतु भारत, जो उसका निकटतम पड़ोसी और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र था, प्रधानमंत्री नेहरू की हठधर्मिता के कारण न केवल अपने मित्र धर्म और पड़ोसी धर्म से किनारा किया, बल्कि बाद में तो तिब्बत की स्वतंत्रता पर चर्चा का विरोध कर अल साल्वाडोर के प्रस्ताव को अवरुद्ध भी कर दिया।

इंग्लैंड-अमेरिका को भी रोका

तिब्बत की स्वतंत्रता बहाल करने के मुद्दे को इंग्लैंड संयुक्त राष्ट्र में कानूनी दृष्टि से सुलझाने के पक्ष में था, परंतु नेहरू ने इंग्लैंड को यह कह कर रोका कि तिब्बत के मामले में कानूनी तर्कों का कोई औचित्य नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा को केवल इतना करना चाहिए कि वह चीन और तिब्बत, दोनों से शांति बनाए रखने की अपील करे। यह स्थिति विरोधाभासी थी, क्योंकि तिब्बत आक्रमण का शिकार होकर भी शांत बना हुआ था। ऐसे में उससे और अधिक शांति की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी। इसके विपरीत, अमेरिका का मत था कि हर संभव उपायों के माध्यम से तिब्बत की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे उसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। लेकिन तिब्बत की भौगोलिक स्थिति चीन-भारत के बीच स्थित होने के कारण अमेरिका उसकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भारत का सहयोग अनिवार्य मानता था। किंतु दुर्भाग्यवश नेहरू ने तिब्बत को अक्तूबर 1950 में दिया गया यह आश्वासन कि संयुक्त राष्ट्र संघ में यदि कोई अन्य देश तिब्बत की ओर से प्रस्ताव लाएगा तो भारत उसका समर्थन करेगा, बाद में बदल दिया और तिब्बत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र में चर्चा तक नहीं होने दी। प्रधानमंत्री नेहरू के निर्देशानुसार, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि भारत सरकार का विश्वास है कि तिब्बत की स्वायत्तता का प्रश्न आपसी शांतिपूर्ण वार्ता से ही हल हो जाएगा, इसलिए इस विषय पर वर्तमान में चर्चा स्थगित कर दी जाए।

फलस्वरूप, चीन ने मई 1951 में तिब्बत को एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया, जिससे तिब्बत पर स्थायी रूप से चीन का नियंत्रण स्थापित हो गया। इस प्रकार, भारत की उत्तरी सीमा, जो पहले शांत और सुरक्षित थी, चीन की उपस्थिति के कारण भविष्य में सबसे असुरक्षित बन गई।

मंत्रिमंडलीय मर्यादाओं की अनदेखी

अक्तू‍बर 1950 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के समय से ही उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, अधिकांश केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस के समाजवादी विचारक जयप्रकाश नारायण तथा विदेश मंत्रालय में सचिव जनरल गिरिजा शंकर बाजपेयी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी इस पक्ष में थे कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत का पूर्ण समर्थन करे। सरदार पटेल तो प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा चीन के पक्ष में झुकाव दिखाने से अत्यंत अचंभित और उद्वेलित थे, क्योंकि उससे भारत के राष्ट्रीय हितों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा था। प्रधानमंत्री नेहरू ने विदेश मंत्रालय को प्रभावहीन करने के लिए ही इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय के सचिव गिरिजा शंकर बाजपेयी सहित अन्य अधिकारियों की राय को दरकिनार किया तथा सीधे चीन में भारतीय राजदूत के.एम. पन्निकर को निर्देश देना शुरू कर दिया, जो वामपंथी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे।

देशहित के विरुद्ध नेहरू के इस कदम से चिंतित होकर विदेश सचिव सर गिरिजा शंकर बाजपेयी ने उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को पूरी स्थिति की जानकारी दी। तब सरदार पटेल ने 7 नंवबर, 1950 को नेहरू को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी गंभीर चिंता प्रकट की। असम के राज्यपाल ने भी प्रधानमंत्री को इस बदलते रुख के प्रति आगाह किया। तिब्बत को पूर्व में दिए गए समर्थन के आश्वासन के बावजूद, जब नेहरू ने अचानक चीन में भारत के राजदूत के. एम. पन्निकर के साथ मिलकर तिब्बत को चीन की आंतरिक समस्या बताना आरंभ किया, तो पटेल अत्यधिक व्यथित हो उठे। इस अप्रत्याशित नीति परिवर्तन पर सरदार पटेल ने देश के पूर्व गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) से भी चर्चा की। फलस्वरूप, 2 नवबर, 1950 को राजाजी और नेहरू के बीच इस विषय पर तीखी बहस हुई।

तिब्बत की स्वाधीनता के मुद्दे पर सरदार पटेल, देश के गवर्नर जनरल रह चुके राजाजी, रक्षा मंत्री बल्देव सिंह, वित्त मंत्री सी.डी. देशमुख, बाबू जगजीवन राम, श्री प्रकाश (असम राज्य के राज्यपाल) आदि सहित कई प्रमुख मंत्री व विदेश विभाग के कई अधिकारी भी देश हित को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत का समर्थन किए जाने के पक्ष में थे। इसके विपरीत, केवल एन. गोपालस्वामी अय्यंगर (जिन्होंने संविधान सभा में अनुच्छेद 370 का प्रस्ताव रखा था), रफी अहमद किदवई और मौलाना अबुल कलाम आजाद ही स्पष्ट रूप से नेहरू की नीति का समर्थन कर रहे थे।

उसी वर्ष 12 दिसंबर को नेहरू ने पटेल के स्वास्थ्य का हवाला देकर बिना किसी मंत्रिमंडलीय चर्चा के उन्हें सभी प्रशासनिक दायित्वों से एकतरफा रूप से मुक्त कर दिया। राज्यों का प्रभार गोपालस्वामी अय्यंगर को सौंपा गया, जबकि गृह मंत्रालय नेहरू ने अपने पास रखा। यह परिस्थिति सरदार पटेल के लिए अत्यंत पीड़ादायक सिद्ध हुई। संभवतः इस मानसिक आघात और गहरे अवसाद के प्रभाव में ही 15 दिसंबर, 1950 को उनका देहांत हुआ। इस प्रकार, देशहित और लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी कर नेहरू ने शांत एवं सुरक्षित भारत-तिब्बत सीमा को अशांत भारत-चीन सीमा में परिवर्तित कर दिया।

देश के रक्षा हितों की अनदेखी

यदि 1950 में तिब्बत पर चीनी आक्रमण के समय भारत ने तिब्बत का समर्थन किया होता, तो तिब्बत भारत और चीन के बीच एक स्वतंत्र तथा परस्पर संतुलनकारी राज्य, अर्थात् ‘बफर स्टेट’ के रूप में स्थापित हो सकता था। ऐसी स्थिति में भारत की उत्तरी सीमा पूर्णतः सुरक्षित रहती। उस समय भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य था, इसलिए वह इस मामले में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभा सकता था।

वास्तव में, तब चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य भी नहीं था और उसे सदस्यता दिलाने के लिए कम्युनिस्ट देशों के बाहर भारत ही उसका सबसे बड़ा समर्थक बना हुआ था। इसी कालखंड में, 25 जून, 1950 को उत्तर कोरिया ने रूस और चीन के सहयोग से दक्षिण कोरिया पर आक्रमण कर दिया। जब दक्षिण कोरिया लगभग पराजय की स्थिति में पहुंच गया, तब अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के माध्यम से प्रस्ताव पारित कराकर, संयुक्त राष्ट्र समर्थित बहुराष्ट्रीय सैन्य हस्तक्षेप किया। नतीजा, उत्तर कोरिया और चीनी सेना पीछे हटी और दक्षिण कोरिया की रक्षा संभव हो सकी।

उस समय भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य था, किंतु उत्तर कोरिया और चीन के इस आक्रमण के विरुद्ध आए प्रस्ताव पर मतदान के दौरान अनुपस्थित रहा। इसके बावजूद प्रस्ताव पारित हुआ और अमेरिकी नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र समर्थित सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से दक्षिण कोरिया को बचाया जा सका। कोरिया की तरह अमेरिका तिब्बत में भी वैसे ही संयुक्त राष्ट्र समर्थित सैन्य हस्तक्षेप का समर्थक था। चूंकि दक्षिण कोरिया सागर तट पर स्थित था, जहां सीधे अमेरिकी हस्तक्षेप संभव था। लेकिन भारत व चीन के बीच स्थित होने के कारण तिब्बत मुक्ति के लिए भारत की सहमति आवश्यक थी।

भारत ने न केवल तिब्बत के समर्थन से पीछे हटते हुए चीन का साथ दिया, बल्कि अमेरिका को भी सलाह दी कि वह तिब्बत के मुद्दे पर चीन की आलोचना से परहेज करे। यदि भारत ने उस समय तिब्बत के समर्थन में सहयोग दिया होता, तो आज तिब्बत भी दक्षिण कोरिया की तरह एक स्वतंत्र राष्ट्र होता। तिब्बती लामाओं की इच्छा थी कि तिब्बत को भारत का संरक्षित राज्य बनाया जाए। उसी प्रकार, जैसे 1949 में भूटान के साथ संधि कर भारत ने उसके रक्षा और विदेश मामलों की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली थी।

क्षेत्रीय अखंडता से भी समझौता

तिब्बत स्थित कैलास-मानसरोवर मार्ग पर लगभग 2,000 वर्ष पूर्व से स्थापित भारतीय धर्मशालाओं और सुरक्षा व्यवस्थाओं को चीन के दबाव में हटा दिया गया। हमारे डाकघर, तारघर और 12 अतिथि गृह भी 29 अप्रैल, 1954 को हुए तथाकथित पंचशील समझौते के नाम पर चीन को सौंप कर देश की क्षेत्रीय अखंडता से भी समझौता कर लिया गया।

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जहां किसी देश की सुरक्षा चौकियां, डाकघर, तारघर और शासकीय भवन विद्यमान हों, वह क्षेत्र उस देश की प्रशासनिक सीमा के रूप में मान्य माना जाता है। परंतु बिना संसदीय अनुमोदन के भारत ने उस अधिकारिक रूप से मानित क्षेत्र को चीन के पक्ष में छोड़ दिया। 29 अप्रैल, 1954 को हस्ताक्षरित भारत-चीन समझौते के ‘नोट्स एक्सचेंज’ में इस अनुचित त्याग का स्पष्ट उल्लेख है।

इस प्रकार, तिब्बत पर चीन के आक्रमण पर संयुक्त राष्ट्र में चीन का पक्ष लेना और 1954 में चीन के साथ कैलास-मानसरोवर के संबंध में किया गया समझौता तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आत्मघाती निर्णय थे, जिनका दीर्घकालिक परिणाम भारत की सुरक्षा और सीमाई स्थिरता पर गहरा पड़ा।

Topics: तिब्बतपाञ्चजन्य विशेषपंचशील समझौतापीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइनामाओत्से तुंगबफर स्टेटकैलास-मानसरोवरस्वायत्ततासंयुक्त राष्ट्रसरदार पटेलप्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू
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