पुरी (ओडिशा)। विश्व प्रसिद्ध पुरी श्री क्षेत्र में नौ दिवसीय रथयात्रा के द्वितीय चरण के अंतर्गत गुंडिचा मंदिर में आयोजित ‘आडप मंडप दर्शन’ (Adap Mandap Darshan) के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को गुंडिचा मंदिर में महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है. स्थानीय परंपरा एवं संस्कृति में इस पावन तिथि को ‘हेरा पंचमी’ के नाम से जाना जाता है.
पतित-पावन जनों का उद्धार करने तथा संपूर्ण विश्व को शांति, प्रेम और विश्व बंधुत्व का अमूल्य संदेश देने के उद्देश्य से महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी श्री मंदिर के रत्न सिंहासन को छोड़कर स्वयं रथ पर सवार होकर जनकपुरी यानी गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं.
मानवीय लीला का अनोखा रूप: जब रोष में गुंडिचा मंदिर पहुंचीं माता लक्ष्मी
हेरा पंचमी की यह परंपरा महाप्रभु की मानवीय लीलाओं का एक अत्यंत जीवंत और भावुक उदाहरण है. पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी अपने भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्री मंदिर से गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं, तब माता लक्ष्मी पीछे अकेली रह जाती हैं.
“मानवीय लीला के अंश स्वरूप, भाई-बहन को साथ लेकर गुंडिचा मंदिर गए भगवान के इस आचरण से रुष्ट होकर माता लक्ष्मी अपनी सखियों के साथ रात में गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। वहां महाप्रभु के दर्शन करने के उपरांत, वापस लौटते समय वे अपने स्वाभिमानी रोष को प्रकट करने के लिए भगवान जगन्नाथ के ‘नंदीघोष’ रथ के एक हिस्से को प्रतीकात्मक रूप से खंडित (तोड़कर) कर वापस श्री मंदिर लौट आती हैं।”
महाप्रभु की इस दिव्य एवं मानवीय लीला ‘हेरा पंचमी’ का साक्षी बनने और आडप मंडप पर भगवान के दर्शन प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं.

पारिवारिक मधुरता और अटूट संबंधों का जीवंत चित्रण
गुंडिचा मंदिर में विराजमान महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी का रथ तोड़कर महालक्ष्मी का अपना गुस्सा जाहिर करना और पुनः श्री मंदिर लौट जाना, वास्तव में गृहस्थ जीवन की मीठी तकरार और अटूट पारिवारिक संबंधों का ही सुंदर चित्रण है.
हेरा पंचमी उत्सव की मुख्य परंपराएं:
- विमान यात्रा: श्री मंदिर के सेवायतों द्वारा माता लक्ष्मी जी की उत्सव प्रतिमा को एक विशेष सुसज्जित पालकी (विमान) में बैठाकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है.
- गुप्त सेवा एवं मोहाज्ञा: मंदिर में महाप्रभु की ओर से माता लक्ष्मी को ‘आज्ञामाला’ (स्वीकृति माला) भेंट की जाती है, ताकि उनका रोष शांत किया जा सके.
- प्रतीकात्मक रथ भंजन: इसके पश्चात माता लक्ष्मी के सेवक नंदीघोष रथ की लकड़ी का एक छोटा सा हिस्सा तोड़कर सांकेतिक विरोध दर्ज कराते हुए गुप्त मार्ग से मुख्य मंदिर लौट जाते हैं.
आडप मंडप में बिराजे महाप्रभु के इस अलौकिक दर्शन का लाभ उठाने के लिए मंदिर प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं की सुरक्षा एवं सुगम दर्शन हेतु कड़े इंतजाम किए गए हैं.











