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मध्य प्रदेश के माथे पर सजा मुकुट

मांधाता पर्वत पर विकसित होने वाला ‘एकात्म धाम’ आदिगुरु शंकराचार्य को समर्पित होगा। इस परियोजना में ‘अद्वैत लोक’, शोध केंद्र के अतिरिक्त एक संग्रहालय का निर्माण भी शामिल है, जिसमें अद्वैत वेदांत के संदेशों को दर्शाते हुए आदिगुरु के जीवन और दर्शन को प्रदर्शित किया जाएगा

Written byविजय मनोहर तिवारीविजय मनोहर तिवारी
Oct 4, 2023, 06:47 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, मध्य प्रदेश

आचार्य शंकर, जिन्हें भारतीय परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से पहचाना जाता है। गुरुकुल परंपरा में उन्हें श्रद्धा से भगवान् भाष्यकार भी कहते हैं।

‘एकात्म धाम’ का निर्माण मध्य प्रदेश के माथे पर सजाया गया एक मुकुट है। यह किसी तीर्थ क्षेत्र के परंपरागत विकास जैसा प्रकल्प नहीं है। आजादी के अमृतकाल में भारत ने अपने विस्मृत नायकों का स्मरण किया। ‘एकात्म धाम’ भी भारतीय संस्कृति के एक विस्मृत नायक का पुण्य स्मरण है। यह सनातन का सम्मान करने वालों की ओर से एक कृतज्ञता ज्ञापन है। इसके केंद्र बिंदु हैं आचार्य शंकर, जिन्हें भारतीय परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से पहचाना जाता है। गुरुकुल परंपरा में उन्हें श्रद्धा से भगवान् भाष्यकार भी कहते हैं।

एकात्म धाम एक विराट स्वप्न है, जो शिल्प में उतर रहा है। अष्टधातु की 108 फीट ऊंची आचार्य शंकर की प्रतिमा की स्थापना इस स्वप्न का प्रथम चरण ही है, किन्तु अपने आकार के कारण यह अभी से ही देश-दुनिया की दृष्टि में आ गया है। हजारों वर्षों के समृद्ध अतीत में भारत में जाने कितने महान राजवंश और कितने यशस्वी सम्राट हुए। भारत का आकाश अनगिनत जगमगाते नक्षत्रों से भरा है।

भारत की सभ्यता-संस्कृति पर अतीत में अनगिनत आघात हुए, इसके बावजूद न केवल संस्कृति अक्षुण्ण रही, बल्कि अध्यात्म की जीवंत धारा वैदिक युग से निरंतर प्रवाहमान रही है। संसार की अनेक सभ्यताएं वक्त के अंधड़ों में खो गईं, या खंडहर में बदल गईं, किन्तु भारत ने अपने हिस्से की हर अमावस को सुरक्षित पार किया। ऐसे ही एक कठिन दौर में देश के दक्षिणी राज्य केरल के कालड़ी में आचार्य शंकर के रूप में एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया था। महज आठ वर्ष की छोटी उम्र में मां से संन्यास की आज्ञा लेकर गुरु की खोज में वह ओंकारेश्वर आए। यहां उन्हें गुरु गोविंदपाद मिले, जो अपने समय के अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रतिष्ठित विद्वान थे।

जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि कहते हैं, ‘‘मध्य प्रदेश गुरुओं की भूमि है। यहां भगवान को भी गुरु मिले। भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि से शिक्षा ली और आचार्य शंकर ओंकारेश्वर आए।’’ जब आचार्य शंकर यहां आए थे, तब उनके पास समय कम था और उन्हें जो करना था, उसकी राह में पर्वत जैसी चुनौती थी। सदियों के दोष गंभीर रोग की तरह भारत की चेतना में समाए हुए थे। सनातन धर्म और महान सांस्कृतिक विरासत का ह्रास हो रहा था और हजारों वर्ष की सभ्यता और संस्कृति के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा था। सब कुछ बिखरा हुआ था। भारत भयंकर बाहरी भटकाव और आंतरिक टकराव से जूझ रहा था। ऐसी विकट परिस्थिति में आचार्य शंकर के पास साधन भी नहीं थे और उन्हें राष्ट्र की सोई हुई शक्ति को जाग्रत और संगठित भी करना था। मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में आचार्य शंकर ने देश को असीमित आध्यामिक बल और आत्मविश्वास से सराबोर कर दिया था।

आदिगुरु शंकराचार्य ऐसे समय में अवतरित हुए, जब भारत पर बर्बर इस्लामी आक्रमण शुरू हुए थे, जो भारत को एक गहरे अंधकार की ओर धकेल रहे थे। 1,000 वर्ष तक भारत भूमि पर हमले कर आततायी बहुमूल्य संपदा को लूटते रहे और यहां की ज्ञान परंपरा, सभ्यता और संस्कृति को मिटाते रहे। सनातन की बहती धारा को सुखाने के तमाम प्रयास हुए, लेकिन आचार्य शंकर के अद्वैत का विचार भीतर-भीतर प्रवाहमान रहा। दक्षिण भारत के एक अत्यंत साधारण परिवार में उनका जन्म हुआ था।

उन्होंने न तो अधर्म के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र उठाए और न ही सत्य की खोज में संसार से विमुख हुए। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे मध्य भारत में आए और उत्तर भारत में ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषदों पर अमूल्य भाष्य लिखे। वे लगातार देशाटन करते रहे और सनातन धर्म की रक्षा के लिए देश के चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। वह एक सक्रिय संन्यासी थे और भविष्य के भारत के लिए एक सुदृढ़ आधार निर्मित कर रहे थे। आज भारत में यदि परंपराएं जीवंत हैं, तो इसके मूल में आचार्य शंकर ही हैं। भारत के पर्वतों, वनों, ग्रामों और दूरस्थ अंचलों में निरंतर भ्रमण करने वाले लाखों दस नामधारी संन्यासी उन्हीं के उत्तराधिकारी हैं और शताब्दियों से जीवंत गुरु-शिष्य परंपरा में उन्हें हृदय की गहराई से स्मरण करते हैं।

सर्वज्ञ पीठ खंडहर रूप में आज मुजफ्फराबाद के पास नीलम नदी की घाटी में पड़ती है, जहां शास्त्रार्थ में विजयी होने पर आदिगुरु शंकराचार्य के लिए दक्षिण का द्वार खोला गया था। ओंकारेश्वर में एकात्मधाम भारत की कोख से जन्मे अपने उसी महान सपूत की अमर स्मृतियों को समर्पित समाज का एक विनम्र प्रयास है। यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की वेला में मध्य प्रदेश की ओर से भेंट स्वरूप स्मृतियों की एक स्वर्णिम शिला है। 

2017 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओंकारेश्वर में एक धर्मसभा में एकात्म धाम की स्थापना का विचार व्यक्त किया था। आज वह विचार साकार स्वरूप ले रहा है। एकात्म धाम में दिव्य अद्वैत लोक, अंतरराष्ट्रीय स्तर का अद्वैत वेदांत संस्थान भी होगा, जिसमें पांडुलिपियों और पुस्तकों के आधुनिक और प्रेरक संदर्भ होंगे। इसका हर कोना हर आयुवर्ग के पर्यटकों, जिज्ञासुओं और श्रद्धालुओं को संबोधित होगा। इस धाम के हर कोने में देश में हजारों वर्षों के दौरान विकसित स्थापत्य परंपराओं की झलक दिखाई देगी।

पाक अधिक्रांत कश्मीर में आचार्य शंकर से संबंधित सर्वज्ञ पीठ की प्रतिकृति का निर्माण भी इस प्रकल्प का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सर्वज्ञ पीठ खंडहर रूप में आज मुजफ्फराबाद के पास नीलम नदी की घाटी में पड़ती है, जहां शास्त्रार्थ में विजयी होने पर आदिगुरु शंकराचार्य के लिए दक्षिण का द्वार खोला गया था। ओंकारेश्वर में एकात्मधाम भारत की कोख से जन्मे अपने उसी महान सपूत की अमर स्मृतियों को समर्पित समाज का एक विनम्र प्रयास है। यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की वेला में मध्य प्रदेश की ओर से भेंट स्वरूप स्मृतियों की एक स्वर्णिम शिला है।

Topics: भारतीय संस्कृतिओंकारेश्वर‘एकात्म धामआदिगुरु शंकराचार्यगुरुकुल परंपराभगवान् भाष्यकार
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