हिमालय धरती की महान वीरांगना तीलू रौतेली, जिन्हें कहा जाता है उत्तराखंड की लक्ष्मीबाई
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हिमालय धरती की महान वीरांगना तीलू रौतेली, जिन्हें कहा जाता है उत्तराखंड की लक्ष्मीबाई

15 से 20 वर्ष की आयु के मध्य सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली सम्भवतः विश्व की एकमात्र वीरांगना नारी थीं, जिन्होंने युद्ध यात्रा का यह कीर्तिमान स्थापित किया।

Written byपंकज चौहानपंकज चौहान
May 15, 2023, 11:16 am IST
inभारत, उत्तराखंड

प्राचीन काल से ही वीरभूमि उत्तराखण्ड वीरों और वीरांगनाओं की जन्मभूमि तथा कर्मभूमि रहा है। भारत की महान वीरांगनाओं के इतिहास में रानी कर्णावती और तीलू रौतेली का नाम बड़े ही आदर और सम्मान से लिया जाता है, इन महान वीरांगनाओं ने अपने अदम्य साहस और रणकौशल से दुश्मन के पाँव उखाड़ दिए थे। तीलू रौतेली उत्तराखंड की नारी का वह शक्ति स्वरूप था, जिसे “उत्तराखंड की झांसी की रानी” और “गढ़वाल की लक्ष्मीबाई” से आज भी सम्मान से याद किया जाता है। केवल 15 से 20 वर्ष की आयु के मध्य सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली सम्भवतः विश्व की एकमात्र वीरांगना नारी थीं, जिन्होंने युद्ध यात्रा का यह कीर्तिमान स्थापित किया।

उत्तराखंड की रानी लक्ष्मीबाई “तीलू रौतेली” चौंदकोट के थोकदार भूपसिंह की पुत्री तथा भगतु और पत्वा नाम के दो बहादुर जुड़वा भाइयों की बहन थी और उनका वास्तविक नाम तिलोत्तमा देवी था। तीलू रौतेली के बहादुर भाई गढ़वाल नरेश की आज्ञा पर आक्रमणकारी आक्रान्ता का सिर काटकर ले आए थे। उनकी वीरता पर उन्हें गढ़वाल नरेश द्वारा गढ़वाल की खाटली और गुजडू पट्टियों में 42-42 गाँवों की थोकदारी दी गई थी। 15 वर्ष की आयु में तीलू की मंगनी ईड़ा गाँव, पट्टी मौदांड्स्यूँ के भुप्पा नेगी के सुपुत्र के साथ हो गई थी, लेकिन नियति के क्रूर हाथों से तीलू के पिता, मंगेतर और दोनों भाइयों को युद्ध भूमि से उठा लिया था। प्रतिशोध की ज्वाला ने तीलू को घायल सिंहनी बना दिया था। दृढ़ संकल्प के साथ उसने आक्रमणकारी कत्यूरियों के विनाश की रणभेरी बजा दी थी।

उन्याल, डंगवाल, असवाल, गोर्ला, सजवाण, खूँटी, बंगारी, जसतोड़ा, खंद्वारी और खुगसाल क्षत्रियों और ढोडियाल, पोखरियाल, ध्याणी, बौड़ाई, जोशी, भदूला और सुन्दरियाल ब्राह्मणों को शस्त्रों से सुसज्जित कर अपनी बचपन की दो सहेलियों बेल्लू और देवली को साथ लेकर तीलू रौतेली ने शत्रु विनाश के संकल्प के साथ युद्ध के लिए कूच किया। सबसे पहले उसने खैरागढ़ को, जो वर्तमान कालागढ़ के समीप था, कल्यूरियों से मुक्त कराया। इस युद्ध में तीलू रौतेली के दो विश्वस्त सहयोगी बलिदान हुए। युद्ध की थकान भी नहीं मिटी थी कि टकोली खाल में आक्रमणकारी कत्यूरियों के पहुंचने की खबर मिली। गढ़ सेना ने तत्काल वहां पहुंचकर शत्रु का विनाश कर दिया। टकोली खाल पर गढ़ राज्य का झण्डा फहराने लगा था। वहां से तीलू रौतेली ने उमटागढ़ पर धावा बोला, युद्ध में शत्रु के अनेक सैनिक मारे गए और शेष बन्दी बना लिए गए। युद्ध विजय के उपलक्ष्य में उस स्थान पर ‘बूँगी देवी’ मंदिर की स्थापना की गई। उमटागढ़ी के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ सल्ट महादेव पहुँची। वहां से भी शत्रु दल को मार भगाया, विजय उपलक्ष्य में वहां शिव मंदिर की स्थापना की, मंदिर की पूजा अर्चना का एकाधिकार ‘सन्तू उन्याल’ के नाम कर दिया था।

इस जीत के उपरान्त तीलू ने भिलण भौन की ओर कूच किया। इस युद्ध में गढ़वाली सैन्य दल ने असंख्य कत्यूरियों को मौत की नींद सुला दिया था। तीलू की दोनों सहेलियों ने भी इस युद्ध में मृत्यु का आलिंगन किया था। विजयोत्सव मनाया ही जा रहा था कि शत्रु सेना ने ज्यूँदाल्यूँ पर कब्जा कर लिया, तीलू ने तत्काल उस ओर कूच किया। आक्रमणकारी कत्यूरियों द्वारा सन्धि प्रस्ताव रखे जाने पर उस गढ़ पर भी गढ़ राज्य का कब्जा हो गया। अपने एक सरदार को वहां का गढ़पति नियुक्त कर दिया। अंततः सभी क्षेत्रों से शत्रु दल का सफाया करते तीलू रौतेली चौखुटिया पहुंची, वहाँ से भी उसने कत्यूरियों को मार भगाया। चौखुटिया तक गढ़राज्य की सीमा निर्धारित कर लेने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस आ गई थी।

कलिंकाखाल, वीरोंखाल, बूँगी और पैनों के इलाको में उसका शत्रु से जबरदस्त संग्राम हुआ, तीलू ने वहां से भी शत्रु को मार भगाया। चारों दिशाओं में विजय का डंका बजाते तीलू सरांईखेत पहुँचीं, यहीं उनके पिता भूपसिंह रावत ने युद्ध लड़ते हुए प्राण त्यागे थे, आक्रमणकारी कत्यूरी सैनिकों को मौत के घाट उतारकर उसने पिता की मृत्यु का बदला लिया था। विजय पताका फहराने के बाद वह अपने आधार शिविर काण्डा, पट्टी खाटली आईं, जहां उन्होंने अपने पित्रों का श्राद्ध और तर्पण किया था। तल्ला काण्डा शिविर के समीप पूर्वी नयार नदी में स्नान करते एक आक्रमणकारी कत्यूरी सैनिक ने अवसर पाकर महान वीरांगना तीलू रौतेली पर तलवार से प्राणघातक हमला कर दिया, उस समय वह हथियारों से विहीन थी, अतः आत्मरक्षा में कुछ कर नहीं पाईं अंततः बुरी तरह से घायल होने के कारण वह वीरबाला परम वीरगति को प्राप्त हो गईं। केवल 15 वर्ष की आयु में तीलू रौतेली ने अपनी रण यात्रा शुरू की थी और पांच वर्ष के अनवरत संग्राम के बाद जब कुशलतापूर्वक युद्ध जीतकर घर लौट रही थीं तो लगभग 20 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हो गई थीं।

तीलू रौतेली की वीरता की गाथाएँ आज सम्पूर्ण उत्तराखंड में लोकगीत जागर रूप में बेहद प्रसिद्ध हैं। महान वीरता का परिचय देने वाली इस वीरांगना को उत्तराखण्ड के इतिहास में लक्ष्मीबाई की उपाधि से सम्बोधित किया गया है। उत्तराखण्ड के कांडा और बीरोंखाल के इलाके में हर वर्ष तीलू रौतेली की स्मृति में विशाल मेले का आयोजन होता है और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ जुलूस निकालकर उनकी मूर्ति की विधिवत पूजा की जाती है। तीलू ने एक बाँज वृक्ष की ओट लेकर युद्ध क्षेत्र में गोली चलाई थी, उस वृक्ष का तना आज भी मौजूद बताया जाता है, उस वृक्ष का नाम ही “गोली बॉज” पड़ गया है। स्थानीय लोग प्रतिवर्ष उस वृक्ष की भी पूजा करते हैं। उत्तराखंड राज्य सरकार प्रति वर्ष उल्लेखनीय कार्य करने वाली स्त्रियों को तीलू रौतेली पुरुस्कार से सम्मानित करती है।

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