महान पुरातत्वविद रवींद्र सिंह बिष्ट, जिन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता पर किया शोध
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महान पुरातत्वविद रवींद्र सिंह बिष्ट, जिन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता पर किया शोध

भारत सरकार द्वारा 2013 में पुरातत्व के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
Jan 3, 2023, 02:54 pm IST
in उत्तराखंड
सम्मान प्राप्त करते हुए रवींद्र सिंह बिष्ट

सम्मान प्राप्त करते हुए रवींद्र सिंह बिष्ट

रवींद्र सिंह बिष्ट सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद जिन्हें सिंधु घाटी सभ्यता पर उनकी विद्वता और भारतीय राष्ट्रीय स्मारकों के संरक्षण के प्रयासों के लिए जाना जाता है। उन्हें भारत सरकार द्वारा 2013 में पुरातत्व के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

रवींद्र सिंह बिष्ट का जन्म 2 जनवरी सन 1944 को देवभूमि उत्तराखंड में भीमताल नैनीताल में लेफ्टिनेंट एलएस बिष्ट के घर हुआ था। स्थानीय स्कूलों में स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने सन 1958 में विशारद की डिग्री उत्तीर्ण की और सन 1960 में साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण कर वह संस्कृत साहित्य के विद्वान बने। अपनी शिक्षा के क्रम को बदलते हुए उन्होंने सन 1965 में लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति में मास्टर डिग्री हासिल की थी। ​​इसके बाद उन्होंने सन 1967 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संचालित स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी से सन 2002 में पुरातत्व विषय को लेकर स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया गया था। रवींद्र सिंह बिष्ट ने अपने अकादमिक अध्ययन को पूरा करने के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय से अपनी थीसिस इमर्जिंग पर्सपेक्टिव्स ऑफ द हर्रपन सिविलाइजेशन इन द लाइट ऑफ रिसेंट एक्सकेवेशन्स इन बनावली एंड धोलावीरा के लिए डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी।

उत्तराखंड की महान विभूतियां : डॉ. घनानंद पाण्डे जिन्हें 1969 में मिला पद्म विभूषण सम्मान

रविंद्र सिंह बिष्ट ने अपने करियर की शुरुआत सन 1969 में पंजाब के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग में वरिष्ठ तकनीकी सहायक के रूप में की थी। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विभिन्न पुरातात्विक स्टेशनों में अधीक्षण पुरातत्वविद के रूप में कार्य किया था। उन्होंने अपने सेवा कार्यकाल के समय अलग-अलग क्षमताओं में कई महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया था। वह पुरातत्व विभाग के केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के सचिव, कांडला में सीमा शुल्क विभाग के लिए विशेषज्ञों की समिति के अध्यक्ष और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा अजंता और एलोरा पर बहु-विषयक अंतरिम प्रस्तुति के समन्वय निदेशक रहे। वह सेवाकाल के समय कुमाऊं विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और ज्ञान प्रवाह, सांस्कृतिक अध्ययन और अनुसंधान केंद्र वाराणसी की अकादमिक समितियों में सम्मिलित रहे। वह भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की समीक्षा समिति के पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान गोवा, डेक्कन कॉलेज स्नातकोत्तर और अनुसंधान संस्थान पुणे, अजंता की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ पैनल समिति, एलोरा संरक्षण के साथ पर्यटन विकास परियोजना, पुरातत्व विभाग–संग्रहालय–अभिलेखागार विभाग बिहार सरकार के पुनर्गठन के लिए समिति और विश्व की चार महान सभ्यताओं की स्क्रीनिंग और मूल्यांकन समितियों के सदस्य रहे।

सन 1999 में सिंधु सभ्यता प्रदर्शनी, दक्षिण कोरिया प्रदर्शनी, कला और सांस्कृतिक विरासत के लिए भारतीय राष्ट्रीय ट्रस्ट के सदस्य होने के अलावा और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल के सदस्य रहे हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के विशेषज्ञ माने जाने वाले रविंद्र सिंह बिष्ट ने मानवीय सभ्यता के अध्ययन से संबंधित कई उत्खननों का नेतृत्व किया है। रविंद्र सिंह बिष्ट को दी जाने वाली एक और प्रख्यात उपलब्धि अनेकों भारतीय राष्ट्रीय स्मारकों का संरक्षण है। हरियाणा में तैनात उप निदेशक के रूप में उन्होंने नारनौल में 11 स्मारकों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। डॉ. रविंद्र सिंह बिष्ट के कार्य का एक अन्य क्षेत्र संपूर्ण देश में संग्रहालयों की स्थापना और रखरखाव करना था। वह लाल किला दिल्ली में स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय, होशियारपुर में विश्वेश्वरानंद वैदिक अनुसंधान संस्थान संग्रहालय और चंडीगढ़ में पुरातत्व और संग्रहालय विभाग में संग्रहालय की स्थापना में शामिल रहे। उन्होंने पंजाब के संगरूर में दरबार हाल, दरबार हाल, पुराना किला, पटियाला, रत्नागिरी और रोपड़ में संग्रहालयों के नवीनीकरण, पुनर्व्यवस्था और पुनर्रचना में योगदान दिया है। उन्होंने सुल्तानपुर लोधी, कुरुक्षेत्र, कामागाटामारू नगर, बनावली और धोलावीरा से खुदाई की गई सामग्री के विशेष प्रदर्शन और नवपाषाण तांबे की एक विशेष प्रदर्शनी जैसी कई प्रदर्शनियों के संचालन में भी भूमिका निभाई है।

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सन 1994 के विश्व पुरातत्व कांग्रेस के अवसर पर राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में स्वतंत्रता के बाद से भारत की कांस्य युग और मेगालिथिक संस्कृतियां उनके नेतृत्व में आयोजित की गईं थीं। रविंद्र सिंह बिष्ट को शिक्षण के क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के माध्यम से ज्ञान के प्रसार में श्रेष्ठ योगदान देने के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए कक्षा और क्षेत्र प्रशिक्षण दोनों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों को डिजाइन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने सन 1986 से सन 1997 की अवधि के समय में पुरातत्व संस्थान नई दिल्ली में भी पढ़ाया था। उन्होंने भारत के विभिन्न कॉलेजों और संस्थानों में विशेष व्याख्यान भी दिए और सन 1992 में शेरोन, कनेक्टिकट अमरीका में उन्होंने एसोसिएशन फॉर हड़प्पा स्टडीज अमरीका के निमंत्रण पर धोलावीरा पर एक विशिष्ट व्याख्यान दिया था। डॉ. रविंद्र सिंह बिष्ट के कई शोध लेख भी प्रकाशित हुए हैं।

भारत सरकार ने सन 2013 में डॉ. रवींद्र सिंह बिष्ट को भारत के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया। वह आचार्य नरेंद्र देव अलंकार के प्राप्तकर्ता भी हैं, जो उन्हें 2013 में आचार्य नरेंद्र देव शिक्षा निधि एवं जन नियोजन आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान किया गया था। डॉ. रवींद्र सिंह बिष्ट 35 साल की राजकीय सेवा के बाद संयुक्त महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के दायित्व से 31 जनवरी सन 2004 को सेवानिवृत्त हुए थे। वर्तमान में वह दिल्ली के पास साहिबाबाद, गाजियाबाद के आवासीय इलाके राजेंद्रनगर में परिवार सहित रहते हैं।

Topics: Life of Ravindra Singh BishtResearch of Ravindra Singh BishtIndus Valley Civilizationरवींद्र सिंह बिष्टArchaeologistरवींद्र सिंह बिष्ट पर लेखरवींद्र सिंह बिष्ट का जीवनरवींद्र सिंह बिष्ट का शोधसिंधु घाटी सभ्यतापुरातत्वविदRavindra Singh BishtArticles on Ravindra Singh Bisht
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