एकताल गांव : शिल्पकला को समर्पित
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एकताल गांव : शिल्पकला को समर्पित

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का एक छोटा सा गांव एकताल अपनी अनोखी कला परंपरा के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहां लगभग हर घर में पीतल की मूर्तियां बनाई जाती हैं और हर निवासी किसी न किसी रूप में मूर्तिकला से जुड़ा है।

Written byप्रमोद कुमारप्रमोद कुमार
Mar 18, 2026, 03:42 pm IST
inविश्लेषण, छत्तीसगढ़

पीढ़ियों से चली आ रही ढोकरा कला ने इस गांव को भारतीय पारंपरिक शिल्प का जीवंत केंद्र बना दिया है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक गांव है, जहां लगभग हर निवासी मूर्तिकार है। गांव का नाम है एकताल। यहां हर घर में पीतल की मूर्तियां बनाने और शिल्पकारी का परंपरागत काम होता है। गांव का लगभग हर व्यक्ति पीतल से ढोकरा कला बनाने में माहिर है।

इस गांव में सिंधु घाटी सभ्यता के समय से चली आ रही पुरानी पद्धति का उपयोग करते हुए जनजातीय देवी-देवताओं और लोक पात्रों की कलाकृतियां बनाई जाती हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। एकताल गांव में झारा शिल्पकारों के लगभग 200 परिवार रहते हैं। ओडिशा राज्य से लगा होने की वजह से गांव की भाषा, रहन-सहन और खान-पान में ओड़िया संस्कृति का प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।
केलो नदी के किनारे बसे एकताल ग्राम में लॉस्ट वैक्स तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इसमें सबसे पहले मिट्टी का ढांचा तैयार किया जाता है। इस ढांचे पर मोम से बारीक कलाकारी की जाती है और फिर उसे सूखने के लिए रखा जाता है। मोम के सूखने के बाद उस पर नदी की चिकनी मिट्टी का लेप चढ़ाया जाता है और उसे दोबारा सुखाया जाता है।

गांव के सभी मूल निवासी मुख्य रूप से घासी समुदाय से हैं। यह समुदाय पारंपरिक रूप से पीतल की नक्काशीदार मूर्तियां बनाने में विशेषज्ञ माना जाता है। यहां के मूर्तिकार प्रमुख रूप से सनातन परंपरा के देवी-देवताओं, नर्तकों, जानवरों और सजावटी वस्तुओं की कलाकृतियां बनाते हैं।

आज देश और विदेशों में यहां की मूर्तियों ने अपनी अलग पहचान बना ली है। हजारों साल पुरानी परंपरा, अनोखी दस्तकारी और बारीक नक्काशी के कारण इन्हें छत्तीसगढ़िया मूर्तियां भी कहा जाने लगा है। यहां के कलाकारों को इसके लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

इस गांव में 20 से अधिक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार विजेता कलाकार हैं। यहां के मिट्टी के घरों में भी अद्भुत कलात्मकता देखने को मिलती है। अपनी पारंपरिक धरोहर को संरक्षित करने और उसका संवर्धन करने के प्रति यहां का प्रत्येक ग्रामवासी विशेष रूप से सजग है। विश्व प्रसिद्ध एकताल ग्राम के निवासी अपनी मूर्तिकला और पारंपरिक पद्धति को जीवित रखने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं। निश्चित रूप से उनकी एकाग्रता और समर्पण हम सभी के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

Topics: राष्ट्रीय पुरस्कारकेलो नदीपाञ्चजन्य विशेषगुरु हमारे गांवहस्तशिल्पढोकरा कलाशिल्पकलामोम पिघलाकर मूर्तिझारा शिल्पकारपारंपरिक धरोहरएकताल गांवसांस्कृतिक विरासतशिल्प ग्रामसिंधु घाटी सभ्यताघासी समुदाय
प्रमोद कुमार
प्रमोद कुमार
पाञ्चजन्य में असिस्टेंट एडिटर। राष्ट्रीय मुद्दों और सामाजिक सरोकार में रुचि। [Read more]
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