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भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है राखीगढ़ी‌‌ का‌ पुरास्थल?

राखीगढ़ी हरियाणा का सबसे बड़ा सिंधु घाटी स्थल है, 350 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला। डीएनए अध्ययन से कोई स्टेप जीन नहीं, स्वदेशी सभ्यता सिद्ध। बजट में 500 करोड़ आवंटित।

Written byडॉ शुभम केवलियाडॉ शुभम केवलिया — edited by कुलदीप सिंह
Feb 27, 2026, 12:24 pm IST
inभारत, विश्लेषण
Rakhigarhi

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत के प्राचीन इतिहास के प्रति वर्तमान सरकार का झुकाव कोई अचंभित करने वाला विषय नहीं है। इसी कड़ी में आगामी वित्त वर्ष का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री महोदया ने 15 पुरातात्विक स्थलों को उत्खनित व विकसित करने हेतु विशेष राशि आवंटित की है। इन पुरास्थलों में राखीगढ़ी, लोथल, धोलावीरा, आदिचिन्नलूर आदि प्रमुख हैं। इन सभी पुरास्थलों में से एक राखीगढ़ी के लिए विशेष तौर पर 500 करोड़ की राशि आवंटित की गई है। राखीगढ़ी की ऐसी क्या महत्वता है जो सरकार का झुकाव इस ओर अधिक है।

सिंधु सभ्यता से है गहरा संबंध

राखीगढ़ी हरियाणा के हांसी जिले में अवस्थित है। भारत की प्राचीनतम सरस्वती सिंधु सभ्यता का यह पुरास्थल ऋग्वेद में वर्णित दृष्दवति नदी के किनारे पर स्थित था। इस पुरास्थल की 1997 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा समय समय पर खुदाई की गई है। हाल ही में हुए सघन पुरातात्विक सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ है की राखीगढ़ी नगर का कुल क्षेत्रफल 350 हेक्टेयर से अधिक था। यह विस्तार राखीगढ़ी को सरस्वती सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर होना सिद्ध करता है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि राखीगढ़ी से कुछ दूरी पर ही सरस्वती नदी व दृष्दवति नदी ता संगम अवस्थित था। यही कारण है कि सभ्यता का सबसे बड़ा नगर यहां स्थित था।

राखीगढ़ी का पुरास्थल कुल 11 टीलों में विभाजित है। यहां हुए पुरातात्विक उत्खननों के फलस्वरूप सरस्वती सिंधु सभ्यता के प्रारंभिक व विकसित काल के पुरावशेष प्रकाश में आए हैं। यहां से प्राप्त वैज्ञानिक तिथियों के अनुसार वर्तमान समय ले 8000 वर्ष पूर्व से लेकर 4000 वर्ष पूर्व तक यहां मानव बसाहट विद्यमान थी। सरस्वती सिंधु सभ्यता के परवर्ती काल के पुरावशेष हमें राखीगढ़ी से प्राप्त नहीं होते।

राखीगढ़ी से मिलने वाले पुरावशेष भारतीय इतिहास में रचे गए आर्य आगमन के कुचक्र को धराशायी करने में सहायक सिद्ध होते हैं। यहां हुए पुरातात्विक उत्खनन में उत्खननकर्ता डॉ अमरेन्द्र नाथ को विभिन्न आकार कि यज्ञवेदियां प्राप्त हुईं थी। यह यज्ञोवेदियां योनी व चित्ती आकार कि हैं जो सरस्वती सिंधु सभ्यता के विकसित काल के दौरान की हैं । यह इस बात की द्योतक हैं कि राखीगढ़ी में रहने वाले लोग वर्तमान समय से 4500 वर्ष पूर्व वैदिक परंपराओं का अनुसरण करते थे । यहां इस तथ्य का उल्लेख भी आवश्यक है कि ऋग्वेद में दृष्दवती नदी के किनारे रहने व यज्ञ संपादित करने की उल्लेख आता है । इस प्रकार राखीगढ़ी के उपरोक्त पुरातात्विक साक्ष्य ऋग्वेद के विवरणों से साम्यता रखते हैं । इस आधार पर वैदिक जनों का 1500 ईसा पूर्व बाहर से आने के मत पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं ।

राखीगढ़ी की महत्वता इस वैज्ञानिक तथ्य में भी निहित है कि यहां मौजूद सरस्वती सिंधु सभ्यता के कंकालों के डीएनए अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि इन कंकालों में कोई मध्य एशियाई जीन मौजूद नहीं था। इस प्रकार जिन विद्वानों का यह मत था कि संभवतः सरस्वती सिंधु सभ्यता के लोग बाहरी थे इस पर पूर्ण विराम लग गया है तथा यह सभ्यता पूर्णतः स्वदेशी सभ्यता थी। आर्य आगमन के मिथक को सिद्ध करने के लिए सरस्वती सिंधु सभ्यता में घोड़े की अनुपस्थिति का मुद्दा उठाया जाता है। परन्तु राखीगढ़ी में हुए पुरातात्विक उत्खनन से घोड़े की मृण्मूर्ति प्रकाश में आई है। उत्खननकर्ता डॉ अमरेन्द्र नाथ ने अपने शोध पत्र में इस विषय का उल्लेख किया है । यह इस बात की द्योतक है कि इस सभ्यता में घोड़ा पहले से ही विद्यमान था।

इसे भी पढ़ें: भोजशाला: ASI रिपोर्ट में उजागर हुआ वाग्देवी मंदिर से मस्जिद बनने का क्रम! छेनी-हथोड़े से मंदिर के अवशेष मिटाए गए 

राखीगढ़ी उत्खनन से विभिन्न अर्ध कीमती पत्थर जैसे कार्नेलियन, अगेट, जैस्पर, लाजवर्द आदि के मनके प्राप्त होते हैं। यह पत्थर गुजरात व अफगानिस्तान से यहां लाए जाते थे। यह पुरावशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं की यहां रहने वाले लोग दूरस्थ इलाकों तक व्यापार करते रहे होंगे। राखीगढ़ी में इन अर्ध कीमती पत्थरों का उपयोग कर मनके व आभूषण भी बनाए जाते थे। यहां ये तांबे की छेनियां भी प्राप्त हुई हैं, गौरतलब है कि तांबे की खदाने राखीगढ़ी के आसपास विद्यमान नहीं हैं। वर्ष 2023-24 में डॉ संजय मंजुल के नेतृत्व में हुए पुरातात्विक उत्खनन में राखीगढ़ी में एक स्टेडियम के होने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। सरस्वती सिंधु सभ्यता में इसके पूर्व केवल गुजरात स्थित धोलावीरा से ही स्टेडियम के प्रमाण मिले हैं।

4000 वर्ष पहले क्यों वीरान हो गया राखीगढ़ी

जहां तक विषय है कि राखीगढ़ी वर्तमान समय से 4000 वर्ष पूर्व वीरान क्यों हो गया तो उसका उत्तर दृष्दवती नदी के सूखने व वर्षा में होने वाली कमी मे निहित है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया व के.एस. वल्दिया जैसे वैज्ञानिकों की रिपोर्ट्स में इन प्राकृतिक बदलावों का पर्याप्त उल्लेख विद्यमान है।

वर्तमान समय में भी राखीगढ़ी में उत्खनन जारी है। यह उत्खनन टीला क्रमांक1,2 व 3 पर किया जा रहा है, यह उत्खनन अगले 3 वर्षों तक होना है। टीला संख्या 3 में पूर्व उत्खनित स्थल को शेड लगा आम जनता के लिए खोला गया है। सरकार का भी यही विचार है की आगामी समय में यहां के सभी उत्खनित टीलों को शेड‌ लगाकर आम जनता के लिए देखने हेतु खुला ही रखा जाए जिससे वे अपने गौरवशाली अतीत व राखीगढ़ी के प्राचीन नगर को अपनी आंखों से देख सकें। इस प्रकार राखीगढ़ी की महत्वता को देखते हुए सरकार का उसपर विशिष्ट ध्यान न्यायसंगत है।

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