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होम भारत

#संविधान : परख का समय

एक नीति-निर्देशक तत्व में और दूसरा अधिकार एवं कर्तव्य में। अधिकार वाली जो बात है, वह दरअसल कांग्रेस का जो वादा था, उसका परिपालन था लेकिन उस वादे पर कांग्रेस टिकी नहीं रही। कांग्रेस ने पहले संशोधन से ही अधिकारों को बदल दिया।

Written byरामबहादुर रायरामबहादुर राय
Nov 28, 2022, 05:00 pm IST
inभारत

संविधान देश की व्यवस्था की नींव है। इसकी प्रस्तावना में भारत के जीवन मूल्य, भारत की हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा समाहित है। संविधान बनने और लागू होने के बाद से ही इस देश ने देखा है कि इस नींव के साथ कौन खड़ा है और कौन हैं नींव खोदने वाले

संविधान की प्रस्तावना, अधिकार एवं कर्तव्य और नीति-निर्देशक तत्व, ये तीनों मिलकर संविधान की आत्मा बनते हैं। संविधान का हृदयस्थल बनता है, जिससे कि पूरे संविधान के शरीर में रक्त का संचार होता है और संविधान संचालित होता है।

रामबहादुर राय

संविधान की जो प्रस्तावना है, उसमें तीन शब्द दिए गए- उद्देशिका, प्रस्तावना, और अंग्रेजी में प्रिएंबल। भारत का जो जीवन मूल्य है, भारत की हजारों साल की जो सांस्कृतिक परंपरा है, दुनिया को देखने का हमारा जो दृष्टिकोण है, वह इस संविधान की प्रस्तावना में आ गया है। उस प्रस्तावना को दो चीजों में परिभाषित किया गया है। एक नीति-निर्देशक तत्व में और दूसरा अधिकार एवं कर्तव्य में। अधिकार वाली जो बात है, वह दरअसल कांग्रेस का जो वादा था, उसका परिपालन था लेकिन उस वादे पर कांग्रेस टिकी नहीं रही। कांग्रेस ने पहले संशोधन से ही अधिकारों को बदल दिया।

यह चित्र रामायण से लिया गया है जिसमें लंका विजय और सीता माता की वापसी को दिखाया गया है

राष्ट्र की आकांक्षा के प्राणतत्व
संविधान में प्रस्तावना सूत्र रूप में है और कह सकते हैं कि यह जटिल नहीं, बल्कि सरल है। प्रस्तावना का हर एक शब्द मंत्र जैसा है। इसको यदि हम ध्यान से समझेंगे तो इसका अर्थ प्रकट होगा। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के एक दार्शनिक आकाश सिंह राठौर ने लिखा है, ‘मूल उद्देशिका में 44 शब्द हैं, अगर उसके घोषणात्मक और उद्देश्यपरक अंश को इसमें शामिल न करें।’

जिससे संविधान का दर्शन प्रस्फुटित होता है, उद्देशिका में वे शब्द सिर्फ छह हैं- न्याय, स्वतंत्रता, समता, गरिमा, राष्ट्र और बंधुता। ये शब्द मात्र शब्द नहीं हैं। हर शब्द ने स्वाधीनता संग्राम में अपना एक अर्थ ग्रहण कर लिया। उसका एक शब्दचित्र बना। वह राष्ट्र की आकांक्षा में प्राण तत्व के रूप में स्थित है। संविधान निर्माताओं ने उसे ही इन शब्दों से उद्देशिका को सूत्र रूप दिया। उन सूत्रों से ही संविधान रूपी वृक्ष से मौलिक अधिकारों की एक टहनी निकली।

यह चित्र भारत को स्वतंत्र कराने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों द्वारा विदेशी भूमि से कोशिश किये जाने को दिखाता है

संविधान को कमजोर करने का जो सबसे पहला काम हुआ, वह जवाहरलाल नेहरू ने किया। 12 मई, 1951 को उन्होंने संविधान का जो संशोधन किया, उसे संविधान के विशेषज्ञ संविधान का पुनर्लेखन कहते हैं। उसमें उन्होंने संविधान से प्राप्त नागरिक अधिकारों में कटौती करा दी। इसी संशोधन से जिस धाराओं का इस्तेमाल अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में डालने के लिए करते थे, वे सारी धाराएं वापस आ गईं।

इसमें जो शब्द दिए गए हैं, वही हमारे जीवन को, प्रकृति को, मानवता को, दुनिया को देखने की जो वैदिक काल से लेकर अब तक की परंपरा रही है, उसे परिभाषित करते हैं। इसमें कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ये शब्द फ्रेंच शब्द से लिए गए हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने अपने पहले संशोधन में ये कहा कि ये पुराने, 19वीं सदी के जीवन मूल्य को प्रकट करते हैं।

संरक्षक कौन
यहीं पर बात आती है कि दरअसल संविधान का संरक्षण कौन करता है और संविधान को नुकसान कौन पहुंचाता है। संविधान के संरक्षण या संविधान के जीवन मूल्यों की रक्षा करने का जो सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है, वह है उस समय का, जब संविधान बना ही था। उस समय संविधान सभा में जितनी बहस थी, उससे बहुत बड़ी बहस संविधान सभा से बाहर थी।

संविधान सभा की बहस को सब जानते हैं और संविधान सभा से बाहर जो बहस हुई, उसकी तरफ ध्यान कम दिया गया या बिल्कुल नहीं दिया गया है। अब धीरे-धीरे लोग ध्यान दे रहे हैं। जैसे मैंने ही अपनी किताब में संविधान सभा की बाहर की जो बहस थी, उसको रखा है। संविधान सभा के बाहर जो बहस हो रही थी, उसमें ज्यादातर संविधान के विरोध में थी, उसको पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एक लेख ने नई दिशा दी।

वर्ष 1950 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में नहीं थे। वे संविधान सभा से बाहर थे। लेकिन एक जागरूक नागरिक के रूप में, प्रबुद्ध नागरिक के रूप में संविधान की संरचना पर उनकी पैनी नजर थी। उन्होंने एक सलाह दी। संविधान से संबंधित उनके पांच लेख हैं। अपने पांचवें लेख में पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहते हैं कि जो संविधान बन गया है, उसमें आप ध्यान रखिए कि उस संविधान को हमारे लोगों ने बनाया।

संविधान के संरक्षण का इससे बड़ा वक्तव्य अभी तक नहीं है। क्योंकि उन परिस्थतियों में जयप्रकाश नारायण, मानवेंद्रनाथ राय, पूरी सोशलिस्ट पार्टी के नेता, कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कांग्रेस के अंदर भी बहुत बड़े लोग कमलापति त्रिपाठी, जो संविधान सभा में थे, डॉक्टर रघुवीर, ये सभी लोग संविधान पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहे थे। संविधान सभा के अंदर और संविधान सभा के बाहर। संविधान सभा के बाहर जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव थे।

उस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहते हैं कि एक बात ध्यान रखो कि यह संविधान हमारे लोगों ने बनाया है। अब इस एक वाक्य का अर्थ यह होता है कि इस पूरी बहस को वे दूसरी दिशा दे देते हैं क्योंकि सबसे बड़ा आरोप था कि ये संविधान औपनिवेशिकता की निरंतरता में है। 1935 का जो संविधान बना था, उस संविधान की निरंतरता में है। ये तो संविधान को नकारने की बात थी। दीनदयाल जी कहते हैं कि नहीं, हम संविधान को स्वीकार कीजिए क्योंकि ये हमारे लोगों ने बनाया है। हां! इसको परिष्कृत करिए। जहां जरूरत पड़े उसको समुन्नत कीजिए। लेकिन इसको स्वीकार कीजिए। इस भारतवर्ष देश में जो पहला व्यक्ति है, जिसको संविधान से कोई लेना-देना नहीं है, वह यह कह रहा है कि संविधान को स्वीकार कीजिए।

संविधान को नकारने का उपक्रम
दूसरी तरफ, कुछ महीने बाद ही संविधान को कमजोर करने का जो सबसे पहला काम हुआ, वह जवाहरलाल नेहरू ने किया। 12 मई 1951 को उन्होंने संविधान का जो संशोधन किया, उसे संविधान के विशेषज्ञ संविधान का पुनर्लेखन कहते हैं। उसमें उन्होंने संविधान से प्राप्त नागरिक अधिकारों में कटौती करा दी। इसी संशोधन से जिस धाराओं का इस्तेमाल अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में डालने के लिए करते थे, वे सारी धाराएं वापस आ गईं।

संविधान को कमजोर करने का दूसरा बड़ा उदाहरण वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान का है। इंदिरा गांधी ने स्वर्ण सिंह समिति बनाई यानी कांग्रेस के एक बड़े नेता की अध्यक्षता में समिति बनाई और उस समिति ने प्रतिबद्ध न्यायपालिका, प्रतिबद्ध नौकरशाही, प्रतिबद्ध संविधान की अवधारणा दी। फिर 42वां संविधान संशोधन हुआ जिसमें इंदिरा गांधी ने संविधान के दो-तिहाई हिस्से का पुनर्लेखन कराया। यह संविधान का दूसरा पुनर्लेखन था। उसमें मृत्युदंड को भी सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, इसका प्रावधान था।

भारतीय है संविधान की आत्मा

संविधान का विचार और संवैधानिक मूल्य हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास और हमारी आकांक्षाओं से प्रेरित है। यह जरूर है कि कुछ संस्थाओं की सांगठनिक संरचना के कई तत्व अन्य देशों से प्रेरित हैं परंतु उनका मार्गदर्शन करने वाली आत्मा, मूल्य और सिद्धांत भारतीय मूल्यों के अनुरूप हैं।
इसका प्रमाण मिलता है संविधान की मूल प्रति में उपयोग किए गए चित्रों से। इन्हें शांतिनिकेतन के प्रख्यात चित्रकार श्री नंदलाल बोस ने बनाया था। इसमें उपयोग किए गए रेखांकन संविधान निर्माताओं के जीवन मूल्यों और आशय के बारे में हमें दृष्टि देते हैं। संविधान में इतिहास की झलक निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक जुड़ाव को दर्शाती है और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से निरंतरता और संबंध के बारे में एक स्पष्ट संदेश प्रदान करती है।
संविधान में उपयोग किए गए सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक आश्रम, श्रीलंका पर श्रीरामचंद्र जी का धावा और मां सीता को छुड़ाना, अर्जुन को कृष्ण का उपदेश, महावीर-गौतम बुद्ध के जीवन के दृश्य, विक्रमादित्य का दरबार, नटराज की छवि, नालंदा विश्वविद्यालय आदि अनेक चित्र हैं जो बताते हैं कि भारतीय संविधान में भारतीय दृष्टिकोण किस तरह सम्मिलित है।
संवैधानिक संस्थाओं के आदर्श वाक्यों में भारतीयता पूरी तरह झलकती है। संघ और राज्यों की कई संस्थाओं के आदर्श वाक्य भारतीय ज्ञान परंपरा से निकले हैं।
भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है : सत्यमेव जयते (सत्य की ही विजय होती है)। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का आदर्श वाक्य है : यतो धर्मस्ततो जय: (जहां धर्म है, वहां विजय है)। कैग का आदर्श वाक्य है-लोकहितार्थ सत्यनिष्ठा (जनहित में सत्य को समर्पित)। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का आदर्श वाक्य है-प्रतिकीर्तिमपावृणु (अतीत के गौरव को उजागर करते हैं)। आल इंडिया रेडियो का आदर्श वाक्य बहुजनहिताय बहुजनसुखाय है और इंटेलिजेंस ब्यूरो का आदर्श वाक्य जागृतं अहर्निशम् (दिन-रात जागते रहना) है। ये आदर्श वाक्य संविधान के भारतीय मूल्यों को दर्शाते हैं।

संविधान के सम्मान की रीति
जब जनता पार्टी आई, तो उस संशोधन में से कुछ चीजों, जिसमें नागरिक अधिकारों की बहाली थी, को ठीक किया परंतु चीजें पूरी तरह ठीक नहीं हुईं। इसके ठीक विपरीत जब अटल बिहारी वाजपेयी जी आए, तो उन्होंने संविधान समीक्षा आयोग बनाया। परंतु उसमें भाजपा का कोई व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बना। सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश वेंकटचलैया को अध्यक्ष बनाया गया।
उसी तरह से वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2018 में विज्ञान भवन में तीन दिन त्वरित भाषण दिया, उसके बाद सवाल-जवाब हुए। पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी सरसंघचालक का या उस स्तर के किसी अधिकारी का व्याख्यान दिल्ली में होता है, और मीडिया में कोई विवाद नहीं हुआ।

भागवत जी ने उस भाषण में भी संविधान को सम्मान दिया, संविधान की भावना को सम्मान दिया। संविधान से जो लोकतंत्र निकलता है, संविधान से जो नागरिक अधिकार निकलते हैं, कर्तव्य निकलते हैं, संविधान से मानवता का जो संदेश निकलता है, उसको उन्होंने अपने भाषण में अभिव्यक्त किया। यही सिलसिला, जब भी जरूरत होती है और जब भी कोई प्रसंग आता है, वे लगातार चला रहे हैं। अभी 20 नवंबर को जबलपुर में सरसंघचालक जी का व्याख्यान हुआ, जिसमें वे कहते हैं कि ‘भारत की राष्ट्र की कल्पना पश्चिम की कल्पना से अलग है। भारत भाषा, व्यापारिक हित, सत्ता, राजनीतिक विचार आदि के आधार पर एक राष्ट्र नहीं बना है।

भारत भूमि सुजलाम्, सुफलाम् रही है। भारत विविधता में एकता और वधुधैव कुटुंबकम् के तत्व दर्शन एवं व्यवहार के आधार पर एक राष्ट्र बना है। अपना जीवन इन जीवन मूल्यों के आधार पर बलिदान करने वाले पूर्वजों की अपनी विशाल परंपरा है। भारत के संविधान की प्रस्तावना भी हिन्दुत्व की ही मूल भावना है।‘ और इस अर्थ में हिंदुत्व और मानवता पर्याय हैं। जब भागवत जी यह कहते हैं तो उनका आशय है कि हिन्दुत्व मानवता का धर्म है, जिसकी दृष्टि में प्रकृति है, पंचतत्व हैं और मनुष्यता है।

दूसरी तरफ, आज की कांग्रेस हो या पहले की कांग्रेस हो, वे संविधान का इस्तेमाल समाज को बांटने और सत्ता को येन-केन-प्रकारेण हथियाने के लिए करते रहे हैं। ये सारे उदाहरण ये कहने के लिए पर्याप्त हैं, कि संविधान का संरक्षण कौन कर रहा है और संविधान के मूल्यों की परंपरा में समाज को ढालने की कोशिश कौन कर रहा है।

संविधान विरोध में माहिर कांग्रेस, वामपंथी

  •  25 मई, 1985 को केरल सरकार में तत्कालीन मंत्री और वामपंथी नेता बालाकृष्ण पिल्लई ने एनार्कुलम में एक जनसभा में लोगों को अपने उद्देश्य हासिल करने के लिए आतंकवाद का सहारा लेने एवं भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए उकसाया। यह मामला केरल उच्च न्यायालय तक गया। इस मामले में पिल्लई को इस्तीफा देना पड़ा।
  •  26 नवंबर, 2021 को कांग्रेस ने संसद के केंद्रीय हॉल में आयोजित संविधान दिवस समारोह का बहिष्कार किया। इस बहिष्कार में वामपंथी दलों और संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा में शामिल राजद, द्रमुक, राकांपा, बसपा समेत कई क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस का साथ दिया।
  •  5 जुलाई, 2022 को केरल के मंत्री और वामपंथी नेता साजी चेरियन ने भारत के संविधान की आलोचना करते हुए कहा कि संविधान शोषण को माफ करने वाला है और यह देश के लुटेरे लोगों की मदद करने की दृष्टि से लिखा गया है। चेरियन मल्लापल्ली में एक राजनीतिक कार्यक्रम में यह बयान दिया। इस पर कांग्रेस-भाजपा ने उनके इस्तीफे की मांग की है।
  •  6 जून, 2020 को केरल के महिला आयोग की अध्यक्ष एम.सी. जोसेफिन ने दावा किया कि उनका पार्टी माकपा ही अदालत भी है और पुलिस स्टेशन भी है। जोसेफिन काडिनामकुलम में एक महिला का उसके पति और उसके दोस्तों द्वारा यौन उत्पीड़न किए जाने पर मीडिया से बात कर रही थीं। इस मामले में माकपा नेता पी.के. सासी पर आरोप था। जोसेफिन ने कहा कि इसकी जांच की कोई जरूरत नहीं है। पार्टी द्वारा की जाने वाली जांच पर्याप्त है।
  •  1 फरवरी, 2022 को तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने नए संविधान का मसौदा तैयार करने और उभरती चुनौतियों पर नए विचारों को प्रोत्साहित करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी संविधान आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका है।
  •  जनवरी, 2014 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पद पर रहते हुए आंदोलन के लिए सड़क पर उतरते हुए दिल्ली को अस्त-व्यस्त कर दिया था। उन्होंने मीडिया से कहा कि ‘कुछ लोग कहते हैं कि मैं अराजकतावादी हूं और मैं गलत संदेश फैला रहा हूं। हां मैं स्वीकार करता हूं कि मैं भारत का सबसे बड़ा अराजकतावादी हूं।’

संविधान पर डॉ. मोहन भागवत जी के वक्तव्यों के अंश

डॉ. मोहन भागवत
  •  ‘ऐसी नीतियां चलाकर देश के जिस स्वरूप के निर्माण की आकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की हैं, उस ओर देश को बढ़ाने का काम करना होगा।’ (विजयादशमी उत्सव, नागपुर – 3 अक्टूबर 2014)
  •  ‘इस देश की संस्कृति हम सब को जोड़ती है, यह प्राकृतिक सत्य है। हमारे संविधान में भी इस भावनात्मक एकता पर बल दिया गया है। हमारी मानसिकता इन्हीं मूल्यों से ओतप्रोत है।‘ (संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष समापन समारोह, नागपुर – 9 जून 2016)
  •  ‘संविधान के कारण राजनीतिक तथा आर्थिक समता का पथ प्रशस्त हो गया, परन्तु सामाजिक समता को लाये बिना वास्तविक व टिकाऊ परिवर्तन नहीं आएगा, ऐसी चेतावनी पूज्य डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी ने हम सबको दी थी।’ (विजयादशमी उत्सव, नागपुर – 5 अक्तूबर 2022)
  •  ‘शासन-प्रशासन के किसी निर्णय पर या समाज में घटने वाली अच्छी बुरी घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देते समय अथवा अपना विरोध जताते समय, हम लोगों की कृति, राष्ट्रीय एकात्मता का ध्यान व सम्मान रखकर, समाज में विद्यमान सभी पंथ, प्रांत, जाति, भाषा आदि विविधताओं का सम्मान रखते हुए व संविधान कानून की मर्यादा के अंदर ही अभिव्यक्त हो, यह आवश्यक है। दुर्भाग्य से अपने देश में इन बातों पर प्रामाणिक निष्ठा न रखने वाले अथवा इन मूल्यों का विरोध करने वाले लोग भी, अपने-आप को प्रजातंत्र, संविधान, कानून, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों के सबसे बड़े रखवाले बताकर, समाज को भ्रमित करने का कार्य करते चले आ रहे हैं। 25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनके ऐसे तरीकों को ‘अराजकता का व्याकरण कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना व उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।‘ (विजयादशमी उत्सव, नागपुर – 25 अक्तूबर 2020)
  •  ‘भारत के बच्चों को, जब वे जीवन के प्रारंभिक चरण में होते हैं, तब उनको संविधान की प्रस्तावना, संविधान में नागरिक कर्तव्य, संविधान में नागरिक अधिकार और अपने संविधान के मार्गदर्शक अर्थात नीति निर्देशक तत्व, ये सब ठीक से पढ़ाने चाहिए क्योंकि यही धर्म है।’ (हिन्दी मासिक पत्रिका – विवेक के साथ साक्षात्कार – 9 अक्टूबर 2020)
  •  ‘स्वतंत्र भारत के सब प्रतीकों के अनुशासन में उसका पूर्ण सम्मान करके हम चलते हैं। हमारा संविधान भी ऐसा ही प्रतीक है। शतकों के बाद हम को फिर से अपना जीवन अपने तंत्र से खड़ा करने का जो मौका मिला, उस पर हमारे देश के मूर्धन्य लोगों ने, विचारवान लोगों ने एकत्रित होकर, विचार करके संविधान को बनाया है।‘ (भविष्य का भारत – 18 सितम्बर 2018, विज्ञान भवन, नई दिल्ली)
  •  ‘संविधान ऐसे ही नहीं बना है। उसके एक-एक शब्द का बहुत विश्लेषण हुआ है और उनको लेकर सर्वसहमति उत्पन्न करने के पूर्ण प्रयास के बाद जो सहमति बनी, वह संविधान के रूप में अपने पास आयी, उसकी एक प्रस्तावना है। उसमें नागरिक कर्तव्य बताए हैं। उसमें नीति-निर्देशक सिद्धांत है, और उसमें नागरिक अधिकार भी हैं।‘ (भविष्य का भारत, नई दिल्ली – 18 सितम्बर 2018)
  •  ‘हमारे प्रजातांत्रिक देश ने, हमने एक संविधान को स्वीकार किया है। वह संविधान हमारे लोगों (भारतीय लोगों ने) ने तैयार किया है। हमारा संविधान, हमारे देश की चेतना है। इसलिए उस संविधान के अनुशासन का पालन करना, यह सबका कर्तव्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसको पहले से मानता है।’ (भविष्य का भारत, नई दिल्ली – 18 सितम्बर 2018)

अप्रामाणिक आरोप
एक अप्रामाणिक रटा-रटाया आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या इनसे जुड़ी संस्थाएं संविधान के मूल्यों को नुकसान पहुंचाती हैं। ये एक जुमला है। ब्यूरोके्रसी में मौजूद वामपंथी इसको दोहराते रहते हैं, बुद्धिजीवी इसे दोहराते रहते हैं। लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है।

अभी रामचंद्र गुहा का एक लेख आया है। इन्होंने भी इस आरोप को दोहराने की कोशिश की है। लेकिन आरोप लगाना और इसको बार बार दोहराते जाने से सत्य तो नहीं बदलता। जो लोग आरोप लगा रहे हैं, उनके पास प्रमाण नहीं है। हां, वह आरोप इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि वे लोग बौखलाए हुए हैं। वर्ष 2014 के बाद जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ है और वह परिवर्तन जीवन में दिखायी देने लगा है। उनको यह लग रहा है कि अब उन्हें आरोप लगाने का कोई अवसर तो मिल नहीं रहा है तो वे अपनी पुरानी बातों को ही दोहरा रहे हैं। इनका आरोप संघ पर कम है और राजनीतिक ज्यादा है और प्रधानमंत्री पर निशाना लगाना नामुमकिन है। इनका आरोप का पूरा पूरा सार यह है कि भारत सरकार संघ की योजना में या संघ के जीवन मूल्यों से चल रही है, इसलिए भारत की बाहुलता को खतरा पैदा हो गया है। अब ऐसे आरोपों पर केवल हंसा जा सकता है, आनंद लिया जा सकता है उस नासमझी का।

कन्नड़ साहित्य में एक सज्जन हैं देवानुर महादेव। रामचंद्र गुहा ने इस अपने लेख में लिखा है कि संघ के दूसरे सरसंघचालक मनुस्मृति के समर्थक थे। देवानुर ने कोई बुकलेट लिखी है, उसी कारण वे आरोप संघ पर भी लगा रहे हैं और नरेन्द्र मोदी पर भी लगा रहे हैं। ये लोग जड़मत हैं, इनको सुजान बनने में समय लगेगा। यदि प्रामाणिक तौर पर छानबीन करें तो पाएंगे कि संविधान में जो भारतीयता है, जितना भी अंश है, उसके संरक्षण, उसके संवर्धन के लिए संघ या संघ से जुड़े हुए लोग कार्यरत हैं।

संविधान एक उपकरण है और एक माध्यम है, एक दस्तावेज है। और, इसी से लोगों को मालूम होता है कि शासन कैसे चलना चाहिए, शासन में कैसे सुधार होना चाहिए। संविधान की मूल भावना समरसता की है, भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा की है, राष्ट्रीय एकता की है और राष्ट्रीय एकात्मता की है। इसमें धर्म कहीं आड़े नहीं आता, मजहब कहीं आड़े नहीं आता। कोई प्रधानमंत्री के संबोधनों का एक भी उदाहरण नहीं दे सकता जिसमें वे पंथ या धर्म के आधार पर नागरिकों में भेदभाव करते हों। जबकि कांग्रेस के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक भेदभाव की बात चलती आ रही है।

मनमोहन सिंह ने तो एक बार यह भी कह दिया कि यहां जो संपत्ति है, यहां जो अधिकार है, उस पर सबसे पहला हक मुसलमानों का है। यह तो जिन्ना की भाषा है। जबकि दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी बात करते हैं तो 137 करोड़ नागरिकों की बात करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में, प्रधानमंत्री बनने के पहले, एक राजनीतिज्ञ के रूप में संविधान में श्रद्धा का कोई एक व्यक्ति प्रतीक है तो उसका नाम है नरेन्द्र मोदी। संविधान भी नागरिकों की बात करता है और नरेन्द्र मोदी भी नागरिकों की बात करते हैं। धर्म या पंथ के आधार पर भेदभाव नहीं है। आरोप लगाना एक बात है और सच्चाई होना दूसरी बात है। आरोप लगाने वाले यह समझते हैं कि सच्चाई छिप जाएगी परंतु सच्चाई छिप नहीं सकती।

संविधान की भावना और संघ के कार्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के संविधान में दिए गए मूल विचार को अपनी प्रकृति, अपने व्यवहार में ढाला है। जहां तक हिंदी भाषा का सवाल है, संघ सदैव इसका पक्षधर रहा है। तकनीकी और चिकित्सा संबंधी विषयों को हिंदी में पढ़ाए जाने की योजना का संघ ने स्वागत किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इस विषय को शामिल किया गया है।
भारत की सुरक्षा और अखंडता के प्रश्न पर संघ ने हमेशा आगे बढ़कर साथ दिया। समय चाहे नई-नई स्वतंत्रता के समय कश्मीर पर पाकिस्तानी कबाइली हमले का हो, पाकिस्तान से 1965 और 1971 का युद्ध हो, या 1962 की चीन युद्ध, संघ ने देशहित में आगे बढ़कर काम किया। कई स्वयंसेवकों ने बलिदान दिया।
संविधान में समता और बंधुत्व की भावना है। समता और बंधुत्व को कुछ लोग फ्रेंच क्रांति से जोड़ते थे। परंतु बाबा साहेब आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि यह भारत की संस्कृति से निकला है। उन्होंने इसे बुद्ध से जोड़ा। संघ ने निरंतर अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाया और सभी मनुष्यों को एक माना। संघ के तृतीय सरसंघचालक पूजनीय बाला साहेब देवरस ने स्पष्ट कहा कि ‘अगर अस्पृश्यता गलत नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है और इसे पूरी तरह समाप्त होना चाहिए।’
स्पष्ट है कि भारतीय संविधान के भावना और संघ के कार्यों में एक साम्यता है। और यह साम्यता स्वयंसेवकों के व्यवहार में शामिल है।

 

संविधान सभा में बहसें
संविधान सभा में हुई बहसें बताती हैं कि सभा के सदस्यों ने विभिन्न प्रश्नों पर कितनी संजीदगी से संविधान की आत्मा भारतीय बनाए रखने के लिए बहसें कीं। एक बहस देश के नामकरण ‘इंडिया दैट इज भारत’ पर थी। इस पर देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत या भारत वर्ष करने के लिए काफी संशोधन प्रस्ताव पेश हुए। इनमें 15 नवंबर, 1948 को हुई बहस में एम.ए.आयंगर ने अनुच्छेद 1, प्रावधान (1) में इंडिया शब्द को बदलकर भारत, भारत वर्ष, हिन्दुस्तान रखने का प्रस्ताव किया। ऐसे कुल 15 संशोधन प्रस्ताव थे।

भारत नाम रखने के पक्ष में लोकनाथ मिश्र, सेठ गोविंददास, एच.वी. कामत और शिब्बनलाल सक्सेना और कई अन्य सदस्य थे। शिब्बनलाल सक्सेना ने देश का नाम ‘भारत’ रखने, राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंगों को केसरिया, सफेद और हरा रखने, सफेद पट्टी के केंद्र में नीले रंग में अशोक के धर्मचक्र को रखने और देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा बनाने का संशोधन रखा। इसमें राज्यों को अपने राज्य की भाषाओं को चुनने का भी अधिकार था। अंग्रेजी को संविधान लागू होने से पांच वर्ष तक की अवधि के लिए द्वितीय आधिकारिक भाषा रखने का आग्रह था। काफी बहस के बाद भारतीय आकांक्षाओं के अनुरूप निर्णय किए गए।

Topics: the basic spirit of the constitutionDr. Mohan BhagwatManmohan Singhराष्ट्र की आकांक्षा के प्राणतत्ववामपंथी दलों और संयुक्त प्रगतिशील मोर्चारामचंद्र गुहा‘हमारे प्रजातांत्रिक देशदेवानुर महादेवप्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसंविधान की मूल भावना समरसताRashtriya Swayamsevak SanghPranatattva of the nation's aspirationharmonyRamchandra Guhaअरविंद केजरीवालDevanur Mahadevमनमोहन सिंहPrime Minister Jawaharlal Nehruडॉ. मोहन भागवत
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