स्वाधीनता का अमृत महोत्सव
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स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

हमारे देश ने तमाम व्यवधानों और संकटों को पार करते हुए इन ७५ वर्षों की यात्रा तय की है। यह यात्रा अपने आप में रोमांचित करने वाली है।

Written byदत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघदत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
Aug 15, 2022, 12:08 pm IST
inभारत, संघ @100, आजादी का अमृत महोत्सव
दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

दत्तात्रेय होसबाले, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

आज जब देश की स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो इस अवसर पर देश का हर नागरिक उल्लासित है। हमारे देश ने तमाम व्यवधानों और संकटों को पार करते हुए इन ७५ वर्षों की यात्रा तय की है। यह यात्रा अपने आप में रोमांचित करने वाली है। आज जब हमारे देश की स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो देश की उपलब्धियां, चुनौतियां सभी हमारे सामने हैं। कैसे एक राष्ट्र ने स्वतंत्र होते ही विभाजन जैसी त्रासदी का सामना किया और विभाजन के कारण हुई हिंसा का दंश झेला। इसके तुरंत बाद सीमा पर आक्रमण का सामना किया, परन्तु ये चुनौतियां हमारे राष्ट्र के सामर्थ्य को हरा नहीं पायीं। हमारा राष्ट्र इन चुनौतियों का सामना करते हुए अपने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता रहा। आज हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि कैसे हमारे देश के नागरिकों ने विभाजन और आक्रमण के दुःख झेलने के बाद १९५२ में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व को मनाया और भारत में लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना की।

भारत के समाज को समझना होगा

यह भारतवासियों का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति ही थी, जिसने १९४७ के बाद लगातार भारत के छूटे हुए हिस्से गोवा, दादरा एवं नगर हवेली, हैदराबाद और पुड्डुचेरी को फिर भारत भूमि में मिलाने का प्रयास जारी रखा और अंत में नागरिक प्रयासों से लक्ष्य की प्राप्ति की। कई बार यह प्रश्न आता है कि एक राष्ट्र जिसको राजनीतिक स्वतंत्रता केवल कुछ वर्षों पूर्व मिली हो, इतना जल्दी कैसे कर सकता है? इसको समझने के लिए हमें भारत के समाज को समझना होगा। भारत का समाज सभी प्रकार के आक्रमण और संकट को सहते हुए भी अपने एकता के सूत्र को नहीं भूला। यदि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को समझने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि संघर्ष के पदचिन्ह नगरों, ग्रामों, जंगलों, पहाड़ों व तटीय क्षेत्रों हर जगह मिलते हैं। चाहे संथाल का विद्रोह हो या दक्षिण के वीरों का सशस्त्र संघर्ष, आपको सभी संघर्षों में एक ही भाव मिलेगा। सभी लोग किसी भी कीमत पर स्वाधीनता चाहते थे और वो यह स्वाधीनता केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु अपने समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए चाहते थे।

स्वाधीनता के लिए भारतीय समाज की व्याकुलता इतनी थी कि वह इसके लिए हर प्रकार के त्याग और हर प्रकार के मार्ग पर चलने को इच्छुक थे। यही कारण है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लन्दन, यूएस, जापान हर जगह से प्रयास हुए। लन्दन स्थित इंडिया हाउस तो भारतीय स्वाधीनता का एक प्रमुख केंद्र बन गया था।

असंख्य नायक, लेकिन मकसद एक

भारत का स्वाधीनता आन्दोलन इतना व्यापक था कि उसने भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक सभी विभाजनों के परे जाकर भारत के जनमानस को एक किया। इसके लिए किसी एक का नाम लेना बेमानी होगा क्योंकि भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में अनेकों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें से कुछ का नाम हम जानते हैं और कुछ का नाम नहीं जानते हैं। यह एक आन्दोलन था, जिसके असंख्य नायक थे। मगर हर नायक का मकसद एक ही था।

यही कारण है कि स्वाधीनता के बाद देश को परम वैभव की ओर ले जाने का भाव देश की जनता के मन में था और यह इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर नहीं था। इसी कारण जब देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर हमले का प्रयास, आपातकाल के रूप में हुआ तो देश की जनता ने उसकी सम्हाल की और स्वयं ही संघर्ष किया।

यह है भारत की मेधा शक्ति

आज जब हमारी स्वाधीनता को ७५ वर्ष हो रहे हैं तो हमें यह भी विचार करना होगा कि स्वाधीनता के शताब्दी वर्ष तक हमारे लक्ष्य क्या होंगे? आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना और वैश्विक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है तो एक राष्ट्र के रूप में हमारे क्या लक्ष्य होने चाहिये? इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछला दशक भारत के लिए अनेकों उपलब्धियों से भरपूर रहा है। चाहे वह भारत के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करने का विषय हो, जिसमें स्वास्थ्य, आवास और वित्तीय समावेशन का विषय हो, यह सब यही परिलक्षित करता है कि भारत का समाज और नागरिक सशक्त हो रहा है। यह भारत की मेधा शक्ति ही है, जिसने कोरोना के समय, सबसे कम समय में सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित वैक्सीन का निर्माण किया। जिसने पूरे विश्व की सहायता की और करोड़ों जीवन की रक्षा की।

समरसता के लिए करने होंगे और प्रयास

इन सभी बातों के बाद भी, भारतीय समाज और एक राष्ट्र के रूप में हमें कई आंतरिक और बाह्य संकटों का न केवल सामना करना है, अपितु उसका समाधान भी ढूंढना है। भारत को अभी भी समरसता के लिए और प्रयास करने होंगे क्योंकि समाज जितना समरस होगा, उतना सशक्त होगा। इसलिए इस पर और भी कार्य करने की आवश्यकता है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बाद भी आगे बढ़ रही है, मगर भारत की बढ़ी आबादी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे और तेजी से प्रगति करनी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि हम भारतीय उद्योगों और उपक्रमों को बढ़ावा दें। इसके बिना हम भारत की रोजगार की अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएंगे। भारत सही मायने में तभी सशक्त होगा, जब भारत स्वावलंबी होगा।

इस मुद्दे पर विचार करने की आवश्यकता

भारत की स्वाधीनता को जब आज ७५ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो यह आवश्यक है कि हम विचार करें कि क्या भारत के नीति प्रतिष्ठान, वर्तमान के भारत की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप हैं। अगर वह नहीं हैं तो उसमे परिवर्तन कैसे हो सकता है, इस पर भी विचार की आवश्यकता है। आज हम बहुत सी ऐसी व्यवस्था देखते हैं, जिसमें एक साधारण आदमी अपने को असहज और असमर्थ पाता है, चाहे वह आज की न्यायिक व्यवस्था हो या राजनीतिक व्यवस्था। ये एक साधारण आदमी की पहुंच में सहजता और सुलभता से कैसे पहुंचे, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब उसकी आंतरिक व्यवस्था मजबूत हो और आंतरिक व्यवस्था न केवल आर्थिक या न केवल सामाजिक सशक्तिकरण पर निर्भर है। भारत की आंतरिक व्यवस्था का समाधान आर्थिक और सामाजिक दोनों चुनौतियों के समाधान में निहित है।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघदत्तात्रेय होसबालेswadhinta ka amrut mahotsavस्वाधीनता का अमृत महोत्सव
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