वीर सावकर जयंती (28 मई) पर विशेष : युग द्रष्टा सावरकर
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वीर सावकर जयंती (28 मई) पर विशेष : युग द्रष्टा सावरकर

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 27, 2021, 07:51 pm IST
inदिल्ली

टुकड़े-टुकड़े गैंग समय-समय पर देश को तोड़ने का कुत्सित प्रयास करता है। अपनी सुविधानुसार वह महापुरुषों को खांचों में बांट कर समाज को भ्रमित करने और स्वतंत्रता संग्राम के सच्चे सेनानियों के योगदान को दरकिनार कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। हिंदुत्व निष्ठ सावरकर जो अपने समय से बहुत आगे देखते थे, उनकी आंखों में खटकते हैं

महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि वे युद्ध में शस्त्र न उठाने के अपने वचन से बंधे हुए थे, लेकिन सारथी बन कर रणभूमि में अर्जुन का मार्गदर्शन कर रहे थे। श्रीकृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता है, फिर भी हम उन्हें पूजते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि उन्होंने रण क्यों छोड़ा था। छत्रपति शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को चिट्ठी लिखी थी। लेकिन हम जानते हैं कि शिवाजी कौन थे और उन्होंने जो चिट्ठी लिखी थी, उसके मूल में क्या था। इसी तरह, जब वीर सावरकर की चिट्ठी की बात होती है तो हमें उनके शौर्य, पराक्रम और समझ के बारे में जानकारी होनी चाहिए। यह मालूम होना चाहिए कि आखिर माफीनामा क्या था? इसका त्रिआयामी विवेचन हो सकता है।

हर प्रतीक के टुकड़े
पहले आयाम का विवेचन आज की शब्दावली में किया जाना चाहिए। इसे टुकड़े-टुकड़े गैंग के संदर्भ में समझने की कोशिश की जानी चाहिए। ‘टुकड़े-टुकड़े’ केवल एक नारा नहीं है। इसका मतलब है देश के टुकड़े… इस देश के महापुरुषों के टुकड़े। हम बाबासाहब आंबेडकर, महात्मागांधी, वीर सावरकर को टुकड़ों में नहीं बांट सकते। वह सबके लिए समान हैं। हमें उन्हें इसी दृष्टि से देखना होगा। जब तक पूर्वजों को देखने की दृष्टि ठीक नहीं होगी, तब तक चीजें ठीक नहीं हो सकतीं। इसीलिए जब लोग कहते हैं कि महापुरुषों के टुकड़े करो तब कुछ को वे पूज्य बनाते हैं तथा योग्य न होते हुए भी कुछ को उनके समकक्ष खड़ा करने का प्रयास किया जाता है। शेष महापुरुषों को एक किनारे रख दिया जाता है, क्योंकि उन्हें इस बात का डर होता है कि अगर इनके विषय में जानकारी सामने आई तो गड़बड़ हो जाएगा। यह बातें शायद कुछ लोगों के गले से नीचे नहीं उतरेगी।

आज के संदर्भ में जब हम सावरकर की बात करें तो यह विमर्श उन पर केंद्र्रित नहीं है, लेकिन वे वर्तमान राजनीति के संदर्भ बिंदु हैं। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है, जिसमें वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रास बिहारी बोस, आजाद हिंद फौज के 30 हजार सेनानियों, आर्य समाज आंदोलन, हिंदू महासभा, सबको दरकिनार कर दिया गया। उन 30 हजार सेनानियों का बलिदान कहां गया? 31 अक्तूबर, 1943 को मणिपुर के मोइरांग में पहली बार तिरंगा फहराया गया था, इसे हम कैसे भूल सकते हैं? आजादी किसी एक के नहीं, बल्कि सभी के समन्वित प्रयास से मिली। आजादी कब मिली और उसकी घोषणा कब की गई, इसका एक बिंदु अलग हो सकता है। इस बिंदु को छोड़ने का मतलब है, इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को छोड़ देना। डॉ. हेडगेवार, सावरकर और सुभाषचंद्र बोस, इन तीनों के बीच एक समझ और समन्वय था। एक राष्ट्रीय अभिलेखागार में गुप्तचर विभाग की एक रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है कि 20 सितंबर, 1943 को नागपुर में एक बैठक हुई थी। उस बैठक में इस बारे में चर्चा हुई थी कि जापान की सहायता से आजाद हिंद फौज के भारत की ओर कूच करने के समय संघ की संभावित योजना क्या हो सकती है। अगर हम यह नहीं समझेंगे तो न सावरकर को समझ पाएंगे, न संघ को, न सुभाषचंद्र बोस और न ही इस देश की आजादी को।

1956 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड एटली भारत दौरे पर आए थे। उस समय उन्होंने बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल पी.बी. चक्रवर्ती से कहा था कि अंग्रेजों ने 1947 में भारत को किसी और कारण से नहीं, बल्कि सुभाषचंद्र्र बोस के कारण छोड़ा। यानी यह उस योजना, जिसमें सावरकर और बाकी लोग शामिल थे, का दबाव था जिसके कारण भारतीय सेना में विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई थी। भारत की आजादी की लड़ाई समन्वित रूप से सभी महापुरुष इकट्ठे होकर लड़ रहे थे। उस लड़ाई का खाका सिर्फ एक जगह दिखाने के लिए महापुरुषों की छवि को खंडित करना और उन्हें बांटकर दिखाना ही टुकड़े-टुकड़े गैंग का पहला षड्यंत्र है। इसे हमें समझना होगा। सावरकर ने 14 साल की आयु में देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में न केवल खुद को प्रस्तुत किया, बल्कि आगे चलकर एक ग्रंथ लिखा और अभिनव भारत नाम से एक संगठन भी खड़ा किया। उनके हृदय में राष्ट्र के लिए जो भाव था, उसे समझना पड़ेगा। राष्ट्रवाद कह कर जो इसे किनारे लगाने की बात करते हैं, उन्हेंं इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। राष्ट्र के लिए उनकी तड़प और अलख जो सबको जोड़ती है, उसे समझना पड़ेगा, चाहे उनकी हिंदुत्व विचारधारा हो, उनके लिखी पुस्तकें व लेख हों या उनके बनाए संगठन। सबसे बड़ी बात है कि सावरकर एक महापुरुष ही नहीं, बल्कि कुशल संगठनकर्ता भी थे। पीटी आचार्य लिखते हैं कि सावरकर में ऐसी क्षमता थी कि वे हाथ मिलाकर लोगों का मन परिवर्तित कर देते थे। जो लोग सावरकर की बात करते हैं, वे मदन लाल ढींगरा को भूल जाते हैं। लाला हरदयाल को भूल जाते हैं। वे भाई परमानंद की बात करना नहीं चाहते। वीरेंद्र चट्टोपाध्याय इन सबकी बात या कहें कि इन सबको एक माला को गूंथने वाले तो सावरकर ही हैं।

यह एक ऐतिहासिक अन्याय है, जिसमें वीर सावरकर, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रास बिहारी बोस, आजाद हिंद फौज के 30 हजार सेनानियों, आर्य समाज आंदोलन, हिंदू महासभा, सबको दरकिनार कर दिया गया। उन 30 हजार सेनानियों का बलिदान कहां गया? 31 अक्तूबर, 1943 को मणिपुर के मोइरांग में पहली बार तिरंगा फहराया गया था, इसे हम कैसे भूल सकते हैं?

देश की पहचान को नकारना
दूसरा आयाम है-देश के टुकड़े करना और देश की पहचान को नकारना। टुकड़े-टुकड़े गैंग कहता है कि सावरकर की हिंदुत्व की सोच संकीर्ण है। 1526 ई. में भारत पर बाबर के हमले के बाद गुरु नानक ने कहा था, ‘खुरासान खसमाना कीआ, हिन्दू आन डराईया।’ ये हिन्दू आन क्या था? सावरकर का हिन्दुत्व क्या है? अगर दोनों को देखेंगे तो पाएंगे कि उनकी सामाजिक सूझ, जीवन के मूल्य और नैतिकता गुरु नानक व सावरकर में अलग-अलग नहीं है। 1937 में 14 वर्ष की कारावास और नजरबंदी की सजा काट कर लौटने के बाद सावरकर के पास कांग्रेस वाले यह निवेदन करने आए थे कि ‘आप कांग्रेस में शामिल हो जाएं।’ कांग्रेस से पूछना चाहिए कि उस समय सावरकर ने क्या जवाब दिया था, तब पता चलेगा कि सावरकर संदर्भ बिंदु कैसे हैं। उस समय सावरकर ने कहा था, ‘‘तुष्टीकरण छोड़ दो। इससे किसी का भला होने वाला नहीं है। राष्ट्रवाद के नाम पर हिंदुओं की कीमत पर मुसलमानों को तुष्ट करना राष्ट्र के साथ धोखा है। मैं ऐसी स्थिति में कांग्रेस में शामिल नहीं हो सकता।’’ कांग्रेसी नेताओं का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत को स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। इसी का फायदा उठाते हुए मुस्लिम नेता हिंदू अधिकारों की कीमत पर अपने समुदाय के लिए रियायतें हासिल कर रहे हैं। सावरकर ने कांग्रेस में शामिल नहीं होने का कारण बताने के साथ एक बात और कही थी। उन्होंने कहा था, ‘‘राष्ट्र को धोखा देने वालों की पहली कतार में खड़े होने वालों से बेहतर मैं राष्ट्र भक्तों की अंतिम कतार में खड़ा होना समझता हूं।’’

भ्रम पैदा करने की कोशिश
तीसरा आयाम है भ्रम पैदा करने की कोशिश। जिन लोगों को चीजें स्पष्ट दिख रही थी, उनके खिलाफ भ्रम का माहौल खड़ा किया गया। एक ओर आजादी की लड़ाई चल रही थी तो दूसरी ओर विभाजनकारी नीति काम कर रही थी। उस समय सावरकर ने कहा था, ‘‘ऐ मुसलमानो! अगर तुम स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है। हम यह लड़ाई साथ-साथ लड़ेंगे। अगर तुम साथ नहीं दोगे, तब भी हम यह लड़ाई लड़ेंगे। अगर तुम विरोध करोगे, तब भी हम यह लड़ाई लड़ेंगे। यहां लड़ाई किससे है, किसके लिए है, इसमें कोई भ्रम नहीं है।’’ कहने का मतलब है कि विभाजनकारी राजनीति और भ्रम पैदा करने के प्रयासों के बीच कुछ ऐसे भी लोग थे, जो भविष्य को स्पष्ट देख रहे थे। अगर कांग्रेस ने सावरकर की सलाह मानी होती और तुष्टीकरण नहीं किया होता तो यकीनन देश का विभाजन नहीं होता।

उन्होंंने कहा था कि एक देश में दो निशान पोसने का काम हो रहा है। एक को कोसना और दूसरे को पोसना बंद नहीं किया तो राजनीति बंद हो जाएगी और मातृभूमि के टुकड़े होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि इस देश से जो मत-पंथ निकले हैं, उनको इस देश का दर्द महसूस होता है। देश के बंटवारे के समय यह बात सच साबित हुई। असेंबली में 86 प्रतिशत मुसलमानों ने देश विभाजन के पक्ष में मतदान किया, क्यों? वहीं, कांग्रेस को सिर्फ 3 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी विभाजनकारी ताकतें बहुत आगे निकल चुकी थीं। कांग्रेस के तुष्टीकरण से पाकिस्तान बना। पाकिस्तान ने आंतकवाद को जन्म दिया, जो अब दुनिया के लिए खतरा बन गया है। यहां मजहब की बात नहीं हो रही। इसे विश्व पर मंडरा रहे खतरे के रूप में देखना चाहिए। एक विश्वमानव अपने समय से बहुत आगे स्पष्ट तौर पर देख रहा था कि खतरा कहां-कहां पर होगा। इसी तरह, बाबासाहब को हिन्दू विद्वेषी बताया जाता है और गांधी जी के बारे में भी ऐसा ही चित्रण किया जाता है। गांधी जी राम-राज की बात करते थे। गाय की बात करते थे। कन्वर्जन के खिलाफ उन्होंने कहा था कि भारत आजाद हुआ और मेरी चली तो सबसे पहले कन्वर्जन बंद करूंगा। क्या आज की राजनीति गांधी जी के रास्ते पर चल रही है?

1956 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट रिचर्ड एटली भारत दौरे पर आए थे। उस समय उन्होंने बंगाल के कार्यवाहक राज्यरपाल पी.बी. चक्रवर्ती से उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों ने 1947 में भारत को किसी और कारण से नहीं, बल्कि सुभाषचंद्र बोस के कारण छोड़ा।

महापुरुषों के साथ षड्यंत्र
सावरकर हों, बाबासाहब हों या गांधी हों, उनके साथ बड़े षड्यंत्र किए जाते हैं। इस देश में सबसे बड़ा सम्मान ऐसे महापुरुषों के विरुद्ध षड्यंत्र करने के लिए दिया जाता है। गीता प्रेस, गोरखपुर पर यह लांछन लगाया जाता है कि इसने कट्टरवाद को बढ़ाया। एक ऐसे व्यक्ति को रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया, जिसने अपनी किताब में झूठ लिखा कि गीता प्रेस ने अपनी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ में गांधी जी की हत्या पर श्रद्धांजलि तक देना उचित नहीं समझा। ‘पाञ्चजन्य’ ने तथ्यों के साथ इस पर आलेख छापा और लेखक से सवाल किए, तब उनके पास कोई जवाब नहीं था। देश में ऐसे लोगों को पत्रकारिता का पुरस्कार दिया जा रहा है।

राष्ट्र के हितों की बात करने वाले मीडिया के एक वर्ग को ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है, लेकिन पुरस्कार मोदी जी के हाथ दिलवाया जाता है। यानी हथियार भी बनाएंगे और आप पर हमला भी करेंगे। यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है, जो इतिहास लेखन से लेकर साहित्य और मीडिया विमर्श में भी दिखता है। इसलिए एक ओर भगत सिंह को कम्युनिस्ट बताया जाता है और दूसरी ओर सावरकर की निंदा की जाती है। कहा जाता है कि भगत सिंह मूर्तिपूजा, कर्मकांड आदि के खिलाफ थे, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि भगत सिंह के पूज्य लाला लाजपत राय आर्य समाज से कैसे जुड़े हुए थे। वैसे भी आर्य समाज मूर्तिपूजा को वेद संगत नहीं मानता है।

समाज में जो स्थान लाला लाजपत राय का है, वही भगत सिंह का है। आजादी की लड़ाई में केवल कांग्रेस की चर्चा करना तथा बाकी लोगों और हिंदू सभा की बात नहीं करना आखिर क्या है? सावरकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ से भगत सिंह बहुत प्रभावित थे और इस पुस्तक का उन्होंने गुप्त रूप से प्रकाशन भी किया था। लेकिन कम्युनिस्ट इसकी बात नहीं करते। राजगुरु भी सावरकर से मिले थे। सावरकर मराठी में जो साहित्य लिख रहे थे, वही काम उत्तर भारत में भगत सिंह कर रहे थे। इसके बावजूद कम्युनिस्ट दोनों को अलग बताते हैं। जिन्ना के बारे में खुद सावरकर कहते हैं, ‘‘मैं और जिन्ना, दोनों एक जैसे नहीं हैं। जिन्ना मुसलमानों के लाभ के लिए ज्यादा से ज्यादा मांग कर रहे हैं, जबकि मैं सभी के साथ समान व्यवहार की बात करता हूं। हिंदू राष्ट्र में सभी पंथों के साथ बराबरी का व्यवहार किया जाएगा। यदि अल्पसंख्यकों की प्रार्थना सभाओं में बाधा पहुंचाने की कोशिश की जाएगी तो सरकार हस्तक्षेप करते हुए सुनिश्चित करेगी कि वह अपनी परंपरा के अनुसार पूजा और प्रार्थना कर सकें। लेकिन हिन्दू राष्ट्र मजहबी अल्पसंख्यकवाद के नाम पर राष्ट्र के भीतर अलग राष्ट्र के निर्माण की अनुमति नहीं देगा।’’ आज की परिस्थिति को देखते हुए यह कहना पड़ेगा कि सावरकर एक एक दूरद्रष्टा थे और उन्होेंने सब कुछ पहले ही देख लिया था।

जिस समय पूर्वी क्षेत्र से लोग आ रहे थे, तब सावरकर ही थे, जिन्होंने कहा था कि इससे असम की स्थिति गड़बड़ा जाएगी। राज्य में असंतुलन पैदा हो जाएगा। उस समय असम में मुसलमानों की आबादी महज 10 प्रतिशत थी। लेकिन नेहरू जी कह रहे थे कि प्रकृति को खाली जगह पसंद नहीं है। तब सावरकर ने इसका जवाब दिया था, ‘‘इस बारे में नेहरू जी की सोच थोड़ी संकुचित है। प्रकृति को जहरीली गैस भी पसंद नहीं है।’’ आज असम में हम जो असंतुलन देख रहे हैं, उसे द्वितीय युद्ध से 10 साल पहले सावरकर ने भांप लिया था। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि सावरकर में भविष्य की चार परतों वाली योजना बनाने की क्षमता थी। इसलिए उन्होेंने हिंदुत्व के बारे में कह दिया था कि एक दिन आएगा, जब दुनिया को हिंदुओं की ताकत का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि भारत, दुनिया के सामने गीता, गौतमबुद्ध द्वारा प्रचारित अहिंसा या महाराष्ट्र के संत तुकाराम की विशेष शिक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करेगा।

हम अखंड भारत की अखंडमंडलाकार की बात करते हैं तो इन चीजों को एक समग्र रूप में देखने का दृष्टिकोण विकसित करना होगा, तभी अपने देश के महापुरुषों और इस देश की संस्कृति को समग्र रूप से देख और समझ पाएंगे।
-हितेश शंकर

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