2014 वह साल था, जब पूरे विश्व ने वह देखा था जो अभी तक केवल किताबों में था। जो केवल पढ़ाया जाता था कि कैसे इस्लामी आक्रांता आए और उन्होनें गैर मुसलमानों को मारना शुरू कर दिया। कैसे लड़कियों को बाजार में बेचा और मंडी लगाई। जो लड़कियां नहीं मानीं, उन्हें जिंदा जला दिया।
साल 2014, जब ईराक में सिन्जर की पहाड़ियों में बसे हुए यजीदी समुदाय पर आईएसआईएस ने हमला कर दिया था। यह हमला केवल और केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर किया गया था और जो कई सौ साल पहले हिंदुओं पर भी किया गया था।
जब इतिहास की किताबों के उदाहरण सामने दिखे
यह सब किताबों में पढ़ा करते थे कि हजारों की संख्याओं में महिलाएं जौहर कर लिया करती थीं। ये जौहर महिलाएं क्यों कर लिया करती थीं? यह एक प्रश्न है? क्या केवल बलात्कार से बचने के लिए? या फिर उससे भी बड़ा कुकृत्य उनके साथ होता था? जब साल 2014 में सिन्जर की पहाड़ियों से ये दर्दनाक साक्षात चित्र नहीं आए थे, तब तक यह विश्वास कर पाना कठिन होता था कि आखिर जौहर लड़कियां क्यों कर लेती थीं?
जौहर क्यों?
हिंदू महिलाएं जौहर इसलिए कर लेती थीं क्योंकि उन्हें यह पता होता था कि उन्हें बाजार में किस तरह बेचा जाएगा? सबके सामने उन्हें निर्वस्त्र कर उनके अंगों के आधार पर उनकी बोली लगाई जाएगी। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली में सामान्य वस्तुओं और पशुओं के साथ-साथ इंसानों के लिए भी दरें निर्धारित कर बाजार बनाए जाते थे।
अलाउद्दीन खिलजी का गुलाम बाजार
तारीख ए फिरोजशाही में यह साफ लिखा हुआ है कि कैसे गुलाम बनाकर गैर मुस्लिम लड़कियों को लाया जाता था और उनकी बोलियां लगाई जाती थी। ऐसा भी नहीं था कि उनके खरीददार एक ही रहे होंगे, ऐसा भी देखा गया कि इन यौन कनीज़ों को एक के बाद दूसरे और फिर तीसरे के पास भेजा जाता था। जैसा अभी हमने ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग्स की पीड़ित लड़कियों से भी सुना कि उन्हें बरगलाकर किस प्रकार एक के बाद दूसरे और फिर तीसरे आदमी के पास भेजा गया।
एक बच्ची को तो सैकड़ों आदमियों के पास भेजा गया था। ग्रूमिंग गैंग्स से पीड़ित लड़कियों ने भी आत्महत्या की है। मगर जौहर अलग था।
मानसिकता अभी भी वही
यूं तो मानसिकता अभी भी “माल ए गनीमत” की है। माल ए गनीमत का अर्थ है गैर मुसलमानों के साथ जंग में जीती गई दौलत और इसमें मानव संपत्ति भी होती थी। हारे हुए लोगों में पुरुषों को गुलाम बनाया जाता था और महिलाओं और बच्चों को कनीज़ बनाया जाता था। अब वैसे तो युद्ध केवल आदमियों के बीच होता है, तो सत्ता हस्तांतरण होना चाहिए था, जैसा कि इस्लामी आक्रान्ताओं के आने से पहले होता था, मगर मध्यकालीन युग में इस्लामी आक्रान्ताओं ने युद्ध में नई परिभाषाएं दीं, जिनमें माल ए गनीमत भी था।
इस माल में से बंदी बनाई गई गैर-मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों को कनीज़, लौंडी या सबया कहा जाता था। सैनिक उन्हें दौलत की तरह आपस में बांट लेते थे, कनीज के रूप में रखते थे या खुलेआम बाजारों में बेच देते थे।
यह सभ्य लड़कियों के जीवित अस्तित्व को समाप्त कर उन्हें केवल वस्तु में बदलने का अमानवीय कदम था। जरा सोचें कि कुछ समय पहले तक अपने घर में या बाजार में स्वतंत्र अस्तित्व वाली लड़कियों को एक ही क्षण में चीज बना देना और वह भी ऐसी कि उसे कोई भी कितनी ही बार खरीद सकता है?
उसके अंगों का मुआयना कर सकता है, उसे छूकर देख सकता है? और यह अभी 2014 में ही ईराक में यजीदी लड़कियों के सजे हुए बाजारों के रूप में देखा था।
यही कारण था कि राजपूत महिलाओं ने वस्तु बनने से बेहतर जौहर चुना! बलात्कार का डर नहीं, आजीवन वस्तु बनने के विरुद्ध साहसिक कदम। यह बलात्कार का डर नहीं था, बल्कि आजीवन गुलामी या कहें आजीवन वस्तु बनाकर रखे जाने के खिलाफ अपनी संप्रभुता, आदर एवं गरिमा को बचाए रखने का एक साहसिक कदम था।
आज जब इंटरनेट के जमाने में यह दिखता है कि कैसे यजीदी लड़कियों की सरेआम बोली लगाई जाती है, या फिर ग्रूमिंग गैंग्स की पीड़ित लड़कियों को सैकड़ों लोगों के पास भेजा जाता है या फिर बोकोहरम ईसाई लड़कियों को जिंदा जला देता है, तो फिर उस समय जब संचार के साधन नहीं थे, उस समय आजीवन अपमान झेलने के स्थान पर वीर राजपूत महिलाओं ने अग्नि प्रवेश को चुना था।
आज स्वरा भास्कर जौहर करने वाली महिलाओं को कायर कह सकती हैं, या फिर हिंदुओं को कायर कह सकती हैं, वह स्वरा कभी अलाउद्दीन खिलजी के कनीज वाले बाजार पर कुछ नहीं कहेंगी? वह यह नहीं बताएंगी कि जौहर दरअसल इसलिए किया जाता था क्योंकि गैर मुसलमान लड़कियों को ज़िंदगी भर के लिए यौन गुलाम बना लिया जाता था।
उनके अंगों को देखकर उनके दाम तय किए जाते थे, उन्हें एक के बाद दूसरे, और दूसरे के बाद तीसरे को बेचा जाता था और यह एक अंतहीन प्रक्रिया थी। स्वरा भास्कर ने इस बाजार पर कुछ कहा हो, यह ज्ञात नहीं है। स्वरा भास्कर ने 2014 में जिंदा बेची गई यजीदी लड़कियों के लिए कुछ कहा हो पता नहीं!
स्वरा भास्कर कभी भी उस अपमान की कल्पना नहीं कर सकती है जो एक लड़की को तब अनुभव होता है जब उसके अंगों को छू-छूकर उसके दाम तय किये जाते हैं? वह उस पीड़ा का अनुमान नहीं लगा सकती है, जो इस एहसास से उत्पन्न हो कि जो लड़की यौन कनीज बनी है, उसकी आने वाली पीढ़ियाँ गुलाम ही रहेंगी। यह पीढ़ियों का अपमान था, यह बलात्कार की आशंका नहीं थी, जैसा स्वरा कह रही हैं।
जरा कल्पना करें एक स्वतंत्र हिन्दू स्त्री, जिसे यौन गुलाम बनाया जा रहा है और उसके पास न्याय मांगने का या फिर विरोध करने का कोई अधिकार ही शेष नहीं है। यह बलात्कार का डर नहीं था, बल्कि उसके अस्तित्व को ही नष्ट किया जाना था, जहां पर उसकी रक्षा का कोई भी अधिकार उसके पास नहीं था।
हिन्दू स्त्रियां जौहर इसलिए कर सकीं थीं क्योंकि वे आत्मा की शुद्धता में विश्वास करती थीं। उन्होनें इसलिए जौहर चुना क्योंकि उन्हें पता था कि आक्रमणकारी उनके शवों के साथ भी बलात्कार कर सकते हैं, इसलिए अपनी मृत देह की गरिमा बनाए रखने के लिए उन्होनें अग्नि स्नान चुना।
स्वरा रेप महामारी की बात करती हैं, मगर अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में यह महामारी कौन फैला रहा था, उस पर बात नहीं करतीं!
वस्तु बनने की पीड़ा समझना कठिन है
स्वरा भास्कर कभी भी एक स्वतंत्र अस्तित्व के वस्तु बनने की और बार-बार बेचे जाने की पीड़ा को समझ नहीं सकती हैं, और न ही वह यह कह सकती है कि आखिर इन महिलाओं के इस अग्नि स्नान के लिए जिम्मेदार कौन था? तभी वे इन महिलाओं पर उंगली उठाती हैं।
सिलेक्टिव एक्टिविज़्म
साल 2014 में स्वरा भास्कर यजीदी महिलाओं की खुलेआम बोली पर भी बोल नहीं पाती हैं, न ही उन्होंने उन लड़कियों को जिंदा जलाए जाने पर कुछ कहा, जिनके चित्र अभी तक इंटरनेट पर मौजूद हैं, और जिन्हें केवल इसलिए जिंदा जला दिया गया था, क्योंकि उन्होंने आईएसआईएस के लड़ाकों के सामने सबया अर्थात यौन कनीज बनने से इनकार कर दिया था।
स्वरा बीबी, जौहर पर बोल रही हैं, मगर उनकी हिम्मत कभी भी उन 19 लड़कियों पर बोलने की नहीं होती, जिन्हें सबया न बनने पर जिंदा जला दिया गया था, या फिर जिनके बच्चों का मांस ही उन्हें खिला दिया गया था।
स्वरा भास्कर जैसी महिलाएं इतिहास के तथ्यों को अपने अनुसार तोड़मरोड़ कर पेश करती हैं और जौहर के मामले में जहां अलाउद्दीन खिलजी पर बात करनी चाहिए थी, उसके यौन कनीजों के बाजार पर बात करनी थी, वह हिन्दू पुरुषों को खलनायक और हिन्दू महिलाओं को कायर सा बता रही थी।

















