आतंकी संगठन आईएसआईएस के नाम और आतंक से सभी परिचित हैं और यह भी लोग जानते हैं कि किस प्रकार वह आम मुसलमान युवाओं को मजहब के नाम पर भड़काकर आतंकवादी बनाता है और गैर मुसलमानों को मरवाता है। भारत के भी कई युवाओं को उसने अपने जाल में फँसाया और कई लोग सीरिया और ईराक में पकड़े गए और अभी तक जेलों में हैं।
मगर अब सीरिया या ईराक में उन भारतीयों के पकड़े जाने के समाचार कम आते हैं, जो आईएसआईएस से जुड़ना चाहते हैं। अब आईएसआईएस या अल कायदा से जुड़कर काम करने वाले भारतीयों के बाहर जाने की संख्या में काफी कमी आई है। स्टेटसमेन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीयों का इन संगठनों से जुडने के लिए बाहर न जाना खुफिया एजेंसियों के लिए खतरा पैदा कर रहा है। अब हैंडलर्स भारतीयों को भारत में ही रुकने और वहीं से रहकर उनका काम करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
2024 से बदली रणनीति
खुफिया अधिकारियों का कहना है कि वर्ष 2024 से इन संगठनों के साथ जुड़ने का पूरा पैटर्न बदल गया है। अब इन संगठनों के साथ जुडने वाले लोगों से यह कहा जाता है कि इसके बजाय कि लोग अफगानिस्तान, ईराक या सीरिया आयें, वे अपने ही देश में रहें और उन्हें ऑनलाइन निर्देश मिलते हैं कि अपने देश में कब और क्या करना है?
बाहर जाने वाले युवाओं की संख्या लगभग शून्य
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खुफिया आँकलनों के अनुसार आईएसआईएस और अल कायदा जैसे संगठनों के साथ जुडने वाले युवाओं की संख्या 2014 से 2023 तक अपने चरम पर थी, मगर 2024 के बाद से यह संख्या घटकर शून्य तक रह गई है।
दक्षिण के राज्यों पर विशेष ध्यान
इस रिपोर्ट के अनुसार आईएसआईएस की योजना देश के विभिन्न हिस्सों में क्षेत्र के अनुसार ही कार्य करने की है और उस पर भी उनका ध्यान दक्षिण के राज्यों पर विशेष रूप से है। हाल ही के वर्षों मे केरलम और तमिलनाडु से सीरिया और ईराक जाने वाले युवाओं की संख्या एकदम शून्य हो चुकी है। मगर अब कट्टरपंथियों और विदेशी हैंडलर्स के बीच जो संवाद सामने आया है, उसने खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ाकर रख दी है।
आईएसआईएस ने अपनी रणनीति को बदल दिया है। एक खुफिया अधिकारी ने कहा कि स्थानीय स्तर पर काम करना आईएसआईएस की बदली रणनीति का हिस्सा है और यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। सुरक्षा अधिकारियों का यह भी मानना है कि इस्लामिक स्टेट पूरे देश में एकीकृत संरचना के स्थान पर छोटे-छोटे समूहों को बनाने का प्रयास कर रहा है, जिसमें वह भौगोलिक क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करेगा।
एक अधिकारी ने इस उद्देश्य को विभिन्न प्रांतों में “मिनी-इस्लामिक स्टेटस” के निर्माण के रूप में बताया।
किशोरों और युवाओं पर विशेष नजर
यह और भी चिंताजनक बात है कि अब इन हैंडलर्स का निशाना युवा और किशोर हैं। अधिकारियों का कहना है कि जहां 20 या 30 की आयुवर्ग वाले लोग तो सहज आकर्षित होते ही हैं, मगर अब हैंडलर्स ने स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले किशोरों पर अपनी नजर टिका दी है। इनका मानना है कि कम उम्र में संगठन के साथ जुडने वाले लोग चरमपंथी और कट्टरपंथी सोच के साथ ज्यादा समय तक टिके रहते हैं।
क्या है आईएसआईएस और क्यों है खतरनाक?
आईएसआईएस अर्थात इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया, जिसका उद्देश्य पूरे विश्व में खिलाफत की स्थापना करना है और वह समूचे मुस्लिम जगत को एक ही मजहबी ढांचे के भीतर लाना चाहता है। आईएसआईएस पूरे विश्व में शरीयत की स्थापना करना चाहता है और जब उसने ईराक के इलाकों में कब्जा कर लिया था, तो वहाँ पर कड़े शरिया कानून लागू कर दिए थे।
गैरमुसलमानों का कत्लेआम
आईएसआईएस का एक और उद्देश्य है और वह है गैर मुसलमानों का कत्लेआम करना, उनका पूरी तरह से सफाया करना। साल 2014 में आईएसआईएस ने ईराक में रहने वाले ईसाइयों और यजीदी समुदाय के साथ जो किया था, उसे पूरे विश्व ने देखा था। विशेषकर यजीदी समुदाय के प्रति तो उनकी क्रूरता और नृशंसता हर सीमा पार कर गई थी। अगस्त 2014 में ईराक के सिंजर में रहने वाले यजीदी समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया था और जो उन्होनें किया, उसे यजीदी समुदाय के जेनसाइड की संज्ञा दी जा सकती है।
पुरुषों और बुजुर्गों का सामूहिक कत्लेआम कराया गया या फिर उनसे जबरन इस्लाम कुबूल करवाया गया। यह माना जाता है कि लगभग 3000 से 5000 यजीदी पुरुषों और बुजुर्गों की हत्याएं की गई थीं। कम से कम 7000 यजीदी महिलाओं और लड़कियों का अपहरण किया गया। उन्हें सबया अर्थात जंग के इनाम के रूप में घोषित किया गया। और पूरे विश्व ने देखा था कि कैसे इन लड़कियों की बोली सार्वजनिक रूप से लगाई जाती थी।
जो लड़कियां इनकार करती थीं, उन पर असंख्य अत्याचार किए जाते थे। कुछ लड़कियों को तो पिंजरे में बंदकर करके जिंदा जला दिया गया था। ऐसे आईएसआईएस की बदली रणनीति से खुफिया एजेंसियों के माथे पर बल हैं, क्योंकि लोग आईएसआईएस से जुड़ना बंद नहीं हो रहे हैं, बल्कि वे बाहर जाना बंद कर रहे हैं और दिखना कम हो रहे हैं।

















