यह समय, वातावरण और उत्सव अद्भुत है। एक ओर देवाधिदेव महादेव, दूसरी ओर समुद्र की विशाल लहरें, सूर्य की किरणें, मंत्रों की गूंज, आस्था का उफान और भक्तों की उपस्थिति इसे दिव्य-भव्य बनाते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष के रूप में ‘स्वाभिमान पर्व’ में सक्रिय सेवा का अवसर मिला। 72 घंटे अनवरत ओम् कार मंत्रोच्चार, 1000 ड्रोनों से सोमनाथ की सहस्राब्दी गाथा,वैदिक गुरुकुलों के 1000 विद्यार्थियों की उपस्थिति और 108 अश्वों के साथ शौर्य यात्रा, मंत्रों-भजनों की अद्भुत प्रस्तुति, सब मंत्रमुग्ध कर देने वाला है।
इस अनुभूति को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। इसे केवल समय ही संकलित कर सकता है। इस आयोजन में गर्व, गरिमा, गौरव, वैभव-विरासत, आध्यात्मिक आनंद-आत्मीयता और सबसे बढ़कर देवाधिदेव का आशीर्वाद है। आज मन में बार-बार यह प्रश्न आ रहा है कि 1000 साल पहले इसी स्थान पर क्या माहौल रहा होगा कि हमारे पुरखों ने आस्था, विश्वास व महादेव के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। हजार साल पहले आततायी सोचते थे कि हमें जीत लिया, किंतु आज 1000 साल बाद भी सोमनाथ महादेव मंदिर पर फहरा रही ध्वजा सृष्टि में उद्घोषणा कर रही है कि हिंदुस्थान की शक्ति-सामर्थ्य क्या है? प्रभास पाटन की मिट्टी का कण-कण शौर्य, पराक्रम और वीरता का साक्षी है।
सोमनाथ के स्वरूप की रक्षा-पुनर्निर्माण के लिए कितने ही शिव भक्तों, संस्कृति के उपासकों-ध्वज धारकों ने प्राणों की आहुति दी, अपना सब कुछ देवाधिदेव महादेव को अर्पण कर दिया। ‘स्वाभिमान पर्व’ पर उस हर वीर-वीरांगना को प्रणाम। प्रभास पाटन शिव-क्षेत्र तो है ही, यह भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है। महाभारत काल में पांडवों ने इस तीर्थ में तपस्या की थी। इसलिए यह भारत के अनगिनत आयामों को नमन करने का भी अवसर है।
यह भी एक सुखद संयोग है कि आज सोमनाथ मंदिर की स्वाभिमान यात्रा के 1000 साल और 1951 में इसके पुनर्निर्माण के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं। ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ 1000 साल पहले हुए विध्वंस के स्मरण का नहीं, हजार साल की यात्रा का पर्व है। साथ ही, भारत के अस्तित्व और अभिमान का पर्व है, क्योंकि हर कदम, हर मुकाम पर सोमनाथ और भारत में अनोखी समानताएं दिखती हैं। जैसे सोमनाथ को नष्ट करने के अनेक दुष्प्रयास हुए, उसी तरह विदेशी आक्रांताओं द्वारा कई सदियों तक भारत को खत्म करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। लेकिन न तो सोमनाथ और न ही भारत नष्ट हुआ, क्योंकि भारत और इसकी आस्था के केंद्र एक-दूसरे में समाए हुए हैं।
उस इतिहास की कल्पना कीजिए। 1026 में सबसे पहले गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ा। उसने समझा कि सोमनाथ का वजूद मिटा दिया, कुछ ही वर्षों में मंदिर का पुनर्निर्माण हो गया। 12वीं शताब्दी में राजा कुमारपाल ने इसका भव्य जीर्णोद्धार कराया। 13वीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण का दुस्साहस किया तो जालौर के रावल ने लोहा लिया। 14वीं शताब्दी की शुरुआत में जूनागढ़ के राजा ने पुन: सोमनाथ की प्रतिष्ठा संपन्न की। इसके बाद 14वीं शताब्दी के अंत में मुजफ्फर खान ने सोमनाथ पर हमला किया, लेकिन वह भी नाकाम रहा। 15वीं शताब्दी में अहमद शाह ने मंदिर को दूषित करने की कोशिश की, जबकि उसके पोते महमूद बेगड़ा ने इसे मस्जिद बनाने की कोशिश की। लेकिन महादेव के भक्तों के प्रयासों से यह पुन: जीवंत हो उठा।
17वीं-18वीं शताब्दी में औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को अपवित्र किया, मस्जिद बनाने की कोशिश की। तब अहिल्याबाई होलकर ने नए मंदिर की स्थापना कर सोमनाथ को पुनः साकार किया। यानी, सोमनाथ का इतिहास विनाश-पराजय का नहीं, विजय व पुनर्निर्माण, पूर्वजों के पराक्रम, त्याग और बलिदान का है। आततायी आते रहे, मजहबी आतंक के आक्रमण होते रहे, लेकिन हर युग में सोमनाथ पुनः स्थापित होता रहा। इतनी सदियों का संघर्ष, प्रतिकार, धैर्य, सृजन-सामर्थ्य, अपनी संस्कृति में विश्वास और आस्था का उदाहरण विश्व-इतिहास में दुर्लभ है।
गजनवी से औरंगजेब तक, आक्रांताओं को लगा कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ जीत रही है। कट्टरपंथी यह नहीं समझ पाए कि जिसे वे नष्ट करना चाहते थे, उसके नाम मे ही सोम अर्थात् अमृत जुड़ा है। उसमें हालाहल पीकर भी अमर रहने का विचार जुड़ा है। उसमें सदाशिव महादेव की चैतन्य शक्ति है, जो कल्याणकारी है और प्रचंड तांडव: शिवा: का शक्ति स्रोत भी।
सोमनाथ में विराजमान महादेव का एक नाम मृत्युंजय भी है, यानी मृत्यु को जीतने वाले, काल स्वरूप। ‘यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्’ अर्थात् यह सृष्टि उनसे उत्पन्न होती है और उन्हीं में विलय हो जाती है। ‘त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपा’ यानी शिव पूरे जगत में व्याप्त हैं। इसलिए हम कण-कण में उस शंकर को देखते हैं। फिर कोई उनसे हमारी आस्था को कैसे डिगा सकता था?
यह समय का चक्र है कि सोमनाथ-ध्वंस की मंशा वाले मजहबी आततायी इतिहास के पन्नों में सिमट गए और सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समंदर के किनारे गगनचुंबी धर्म ध्वजा थामे खड़ा है। सोमनाथ का यह शिखर मानो उद्घोष कर रहा है- चंद्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:। अर्थात् मैं चंद्रशेखर शिव पर आश्रित हूं, काल भी मेरा क्या कर लेगा?
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ इतिहास का गौरव है, कालातीत यात्रा को भविष्य के लिए जीवंत बनाने का माध्यम भी है। हमें इस अवसर को अपने अस्तित्व और पहचान को सशक्त करने के लिए उपयोग करना है। किसी देश के पास कुछ 100 वर्ष पुरानी विरासत होती है तो उसे अपनी पहचान बनाते हैं। हमारे पास सोमनाथ जैसे हजारों साल पुराने पुण्य स्थान हैं, जो हमारे सामर्थ्य, प्रतिरोध और परंपरा के पर्याय हैं। लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के बाद गुलामी की मानसिकता वालों ने उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश की, उस इतिहास भुलाने का कुत्सित प्रयास किया। सोमनाथ की रक्षा हेतु देश ने कैसे-कैसे बलिदान दिए। रावल कन्नड़देव, वीर हमीर गोहिल, वेगड़ा भील जैसे नायकों का पराक्रम सोमनाथ मंदिर से जुड़ा है। लेकिन दुर्भाग्य से इन्हें महत्व नहीं दिया गया। उल्टे कुछ इतिहासकारों और राजनेताओं द्वारा आक्रमण के इतिहास को दबा देने की कोशिश की गई। मजहबी उन्माद की मानसिकता को ‘साधारण लूट’ बताकर किताबें लिखी गईं।

सोमनाथ मंदिर बार-बार तोड़ा गया। यदि सोमनाथ पर आक्रमण केवल लूट के लिए होते तो हजार वर्ष पूर्व पहली बड़ी लूट के बाद रुक गए होते, पर ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ के पवित्र विग्रह को तोड़ा गया, बार-बार मंदिर का स्वरूप बदलने की कोशिश हुई और हमें पढ़ाया गया कि मंदिर को लूट के लिए तोड़ा गया। नफरत, अत्याचार और आतंक का क्रूर इतिहास हमसे छिपाया गया। धर्म के प्रति ईमानदार कोई भी व्यक्ति ऐसी कट्टरपंथी सोच का समर्थन नहीं करेगा। लेकिन तुष्टीकरण के ठेकेदारों ने हमेशा इस सोच के आगे घुटने टेके।
आजादी के बाद जब सरदार सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण की शपथ ली, तो उन्हें भी रोकने की कोशिश की गई। 1951 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ आने पर भी आपत्ति जताई गई। तब सौराष्ट्र के जाम साहब दिग्विजय सिंह आगे आए। भूमि अधिग्रहण से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक, उन्होंने राष्ट्रीय गौरव को सबसे ऊपर रखा। सोमनाथ मंदिर के लिए उन्होंने एक लाख रुपये दान दिए और ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। दुर्भाग्य से आज भी वे ताकतें सक्रिय हैं, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध किया था। आज तलवारों की जगह कुत्सित तरीकों से भारत के खिलाफ षड्यंत्र हो रहे हैं। इसलिए हमें ज्यादा सावधान रहना है। एकजुट रहकर खुद को शक्तिशाली बनाना है और बांटने की साजिशें रचने वालों को हराना है। जब हम अपनी जड़, आस्था से जुड़े रहते हैं तो अपनी विरासत के प्रति सजग रहते हैं और स्वाभिमान के साथ उसका संरक्षण करते हैं तो सभ्यता की जड़ें भी मजबूत होती हैं। पिछले 1000 वर्ष की यात्रा हमें अगले 1000 वर्ष के लिए तैयार रहने की प्रेरणा देती है।
राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर मैंने भारत के लिए हजार साल का विराट स्वप्न सामने रखा था। देव से देश-विजन के साथ आगे बढ़ने की बात कही थी। आज देश का सांस्कृतिक पुनर्जागरण करोड़ों देशवासियों में नया विश्वास भर रहा है। आज हर देशवासी के मन में विकसित भारत को लेकर एक भरोसा है कि भारत अपने गौरव को नई बुलंदी देगा। हम गरीबी पर विजय पाएंगे और विकास की नई ऊंचाइयों को छुएंगे। पहले तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य, फिर उसके आगे के सफर के लिए देश तैयार है। सोमनाथ मंदिर की ऊर्जा इन संकल्पों को आशीर्वाद दे रही है। विरासत से विकास की प्रेरणा लेकर भारत आगे बढ़ रहा है। सोमनाथ में ‘विकास भी, विरासत भी’ की भावना निरंतर साकार हो रही है।
आज का भारत आस्था को स्मृति मात्र न रख कर इन्फ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और तकनीक के जरिये भविष्य को भी सशक्त कर रहा है। हमारी सभ्यता का संदेश किसी को पराजित करने का नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन रखने का रहा है। सोमनाथ जैसे तीर्थ ने सिखाया है कि सृजन का मार्ग लंबा, लेकिन स्थाई होता है। तलवार से कभी दिल नहीं जीते जा सकते। मिटाने वाली सभ्यताएं विलुप्त हो जाती हैं। इसलिए भारत ने दुनिया को दूसरों को हराना नहीं, बल्कि दिलों को जीतना सिखाया है। यह विचार आज दुनिया की जरूरत है। सोमनाथ की हजार वर्ष की गाथा पूरी मानवता को सीख दे रही है। आइए, संकल्प लें। हम विकास की ओर कदम से कदम, कंधे से कंधा और मन से मन को जोड़कर चलें। लक्ष्य से ओझल हुए बिना, अतीत और विरासत से भी जुड़े रहें और आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी चेतना संभाले रखें।
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ जैसे आयोजनों से प्रेरणा लेते हुए चुनौतियों के पार अपने लक्ष्य तक पहुंचें। यह कार्यक्रम आज शुरू हो रहा है। हमें हजार साल का स्मरण देश के कोने-कोने में करना है। दुनिया को अपनी विरासत से परिचित कराना है। 75 साल का यह नया पर्व हम मई 2027 तक मनाते रहें, जन-जन को जगाते रहें। इसी कामना के साथ, एक बार फिर समस्त देशवासियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
हर हर महादेव! जय सोमनाथ!

















