पुत्री, बहन, पत्नी, माँ: नारी का सबसे सुंदर रूप आखिर कौन-सा है?
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होम धर्म-संस्कृति

पुत्री, बहन, पत्नी, माँ: नारी का सबसे सुंदर रूप आखिर कौन-सा है?

स्त्री को घर की लक्ष्मी, परम भाग्यशालिनी, पुण्यमयी और घर को शोभायमान करने वाली माना गया है। इसलिए इनकी विशेष रक्षा करनी चाहिए अर्थात स्त्री विशेष रूप से पुजनीय और रक्षणीय है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Oct 15, 2026, 06:16 pm IST
inधर्म-संस्कृति
नारी के अनेक स्वरूप (एआई द्वारा निर्मित)

नारी के अनेक स्वरूप (एआई द्वारा निर्मित)

नवरात्रि का पावन पर्व हमें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के साथ-साथ नारी शक्ति के सम्मान का संदेश भी देता है। हमारे जीवन में नारी पुत्री, बहन, पत्नी और माँ जैसे अनेक रूपों में प्रेम, स्नेह, त्याग और समर्पण का प्रतीक बनकर उपस्थित रहती है। इसी विचार से प्रेरित होकर मैंने लगभग 100 महिलाओं से एक प्रश्न पूछा- “आपको नारी का कौन-सा रूप सबसे उत्तम लगता है- पुत्री, बहन, पत्नी या माँ?” उनके उत्तरों में लगभग 90% महिलाओं ने माँ के स्वरूप, 10% ने पुत्री के स्वरूप को चुना, जबकि केवल एक महिला ने पत्नी के स्वरूप को सर्वोत्तम बताया। इन उत्तरों ने मुझे नारी के विभिन्न रूपों की विशेषताओं और उनके महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। प्रस्तुत लेख में मैंने अपनी समझ के अनुसार नारी के इन चारों स्वरूपों को समझने और उनके भावनात्मक महत्व को शब्दों में पिरोने का एक छोटा-सा प्रयास किया है।

पुत्री:  कुछ महिलाओं ने अपने सबसे पहले स्वरुप ‘पुत्री’ को सबसे उत्तम बताया जिसे  मानने का कारण शायद मां-बाप व भाई-बहनों का भरपूर प्रेम, निश्चिंतता, स्वच्छन्दता व कोई चिंता नहीं और किसी का कोई उत्तरदायित्व ना होना था l हर त्यौहार में पुत्री का पूजा जाना, उपहार व धन से निरंतर उनका पर्स भरा रहना, सुन्दर परिधान व देवी का सा सम्मान, कौन होगा जिसे ये सब नहीं पसंद आएगा l एक रंग-बिरंगी मधुर बोली वाली चिड़िया की भांति चहकती, मुस्कुराती, उछलती हुई और जहाँ भी जाती वहां देवत्व बिखेरती नन्ही परी किसके मन को नहीं मोह लेती है।

दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान्प्रवर्धयन्।यत्फलं लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥ (स्कन्दपुराण)

अकेली कन्या ही दस पुत्रों के समान है। दस पुत्रों के लालन पालन से जो फल प्राप्त होता है वह अकेले कन्या के पोषण से ही प्राप्त हो जाता है। कई स्थानों पर बेटियों से अलग-अलग व्यवहार होता है, जहाँ भी ज्यादा कड़ाई या जरुरत से ज्यादा टोका-टाकी होती है वहां लम्बे समय तक मन में तनाव के कारण कुछ बेटियां कुंठित भी रहती हैं l पर मेरी समझ में इसका कारण वहां हुई ऐतिहासिक घटनाएं व भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं। जिस प्रकार एक ही जल की सतह पर अलग-अलग कोणों में पडने वाली सूर्य की किरणे अलग अलग परावर्तन करती हैं, उसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर पुरानी घटनाओं के कारण बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, जो कि धीरे-धीरे समाज के विचारों में और फिर उनके व्यवहार में आ जाता है।

बेटियों की स्वतंत्रता और गौरव

बेटियों की स्वतंत्रता की बात पर कुछ लोग हम पर ऊँगली तो उठाते हैं पर उन्हें यह भी ज्ञान होना चाहिए कि हमारी सोच तो इतनी विशाल रही है कि पुत्रियों को स्वयं वर चुनने का अधिकार प्राप्त था, और एक बार अपने पति का वरण कर लिया तो जीवन पर्यन्त उसकी धर्मपत्नी बन कर निभाने का धैर्य व समर्पण का साहस भी उनमे संस्कारों में कूट-कूट कर भरा था। इस पावन धरा की पुत्रियों की तो बात ही क्या कहूं , पुरातन समय की हमारी ज्ञानवान पुत्रियों का वरण तो हम सभी करते हैं जो कि सत्य भी है, पर आज के वर्तमान युग में भी हमारी बेटियों ने हर क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर योगदान दिया है और देश का नाम आगे बढ़ाया है।

हाल में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स इसके उम्दा उदाहरण हैं जहाँ अनेकों पदक हमारी गुणवान पुत्रियों ने जीते हैं। वे घर का सौभाग्य तो होती ही हैं पर फिर भी विवाह के बाद उस सौभाग्य को लेकर अपने ससुराल नहीं जाती l विदा के समय शुभता के प्रतीक चावल को वे मायके वाले घर की ओर न्योछावर करती हैं और सौभाग्य को इस घर में ही वास कराकर नये घर की ओर प्रस्थान करती है l और नये घर पर पवित्रता से भरे शुभ चावलों को घर के अंदर बिखेरकर पति के घर में सौभाग्य के साथ ही प्रवेश करती हैं, जिससे नये घर को सुख-समृद्धि व उर्द्धगती प्राप्त हो।

बहन

हालांकि सभी महिलाओं ने इस रिश्ते की सत्ता को ऊंचा स्थान दिया है पर सर्वोपरी नहीं। छोटी बहन हो या बड़ी दीदी, जो शायद अगर मेरे जीवन में ना होती तो ना जाने कैसा रंगहीन होता मेरा बचपन, दीदी के बिना मैं अपने बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकता। लड़ाई-झगड़ा हो या पिटाई या फिर गुस्से से भरी हुई कहा-सुनी, लेकिन उसके पीछे प्रेम का एक अगोचर परन्तु मजबूत धागा तो हमेशा ही जुडा होता है। मुझे हमेशा ही मेरी दीदी ने अम्माजी के जैसा ध्यान रखा, और उनके इस भौतिक संसार से जाने के बाद भी समय-समय पर मार्गदर्शन दिया है। ये मेरी ही क्या अनेकों भाईयों की मन की बातों का निचोड़ है l रक्षाबंधन से एक दिन पहले उस समय मैं आश्चर्य में पड़ गया जब एक बहन अपने भाई को जबरदस्त फटकार लगा रही थी।

भाई-बहन का अगाध प्रेम और बदलते समय की चिंता

जब मैने उसका कारण पूछा तो उसने कहा की मोबाइल खरीदने की बात को लेकर कहा सुनी चल रही है, मैने उससे कहा कि भाई से त्यौहार के उपहार स्वरुप कम महंगा मोबाइल खरीद लो, उस पर क्यों दबाव डालती हो? तब वह तिकोना मुँह बना कर बोली कि अरे मुझे नहीं बल्कि उसे रक्षा बंधन में मुझ से ही मोबाइल चाहिए, वह भी बहुत महंगा वाला, जबकि मैं उसे समझा रही हूं कि इतना महंगा वाला नहीं लुंगी, ये मेरे बजट के बाहर है l पर अब वो कह रहा है कि वो खरीदारी कर चुका है मैं इसलिए उसे डांट रही हूं l ऐसी उलटी गंगा मैने पहली बार बहती देखी थी, मामला समझ में आने पर मेरी बोलती बंद हो गयी, और मैं मुस्कुरा कर वहां से चल पड़ा l इस घटना के बाद मुझे याद हो आया कि मैने भी लगभग ऐसा ही कई बार किया है पर मैं यहाँ उसका उल्लेख नहीं करना चाहता।

अभी कुछ दिन पहले ही एक ऊर्जावान बुजुर्ग ने हँसते हुए बताया था कि आज 70 की आयु हो जाने के बाद भी जब अपनी दीदी से रक्षा बंधन के त्यौहार में मिलते हैं तो वो झुक कर पैर छूने को कहती है और थोड़ा भी आना-कानी की तो डांटती हैl ये कहते ही उनकी डबडबायी आँखों से अश्रु धार बह निकली, ऐसा ही होता है भाई-बहन का एक दूसरे  के प्रति अगाध प्रेम l दिव्य आनंद एवं प्रेम से आप्लावित यह भारत भूमि तो समय-समय पर इस सम्बन्ध की गहराई और उसमें निहित समर्पण की पराकाष्ठा के प्रमाण निरंतर देती रहती है l ये प्रेम व उसकी अनूठी अनुभूति है जिसे बताना व जताना नहीं पड़ता है ये स्वतः ही प्रसफ्फुटित हो जाता है l पर आजकल निरंतर हो रहे भौतिकता वादी बदलाव से डर लगता है, भगवान से प्रार्थना करता हूं कि इस पवित्र सम्बन्ध में कलियुग का प्रभाव हावी ना हो होने पाए।

भार्या / धर्मपत्नी

भारतीय पौराणिक एवं सांस्कृतिक आधार पर देखा जाये तो यह इतना अटूट सम्बन्ध है कि एक बार इस पवित्र गठबंधन के बंधन से बंध गए तो अंतिम यात्रा निकलने पर ही शरीर एक दूसरे से विदा कहेगा, हालांकि अब इस सोच में भी पश्चिमी प्रभाव पढ़ रहा है। इस मनुष्य जीवन का सबसे लम्बा चलने वाला रिश्ता शायद पति-पत्नी का ही होता है जो हर प्रकार के रस से सराबोर रहता है। इस अद्भुत रिश्ते में लगातार होते रहते हैं वाद-विवाद, खट्टे-मीठे ताने, क्रोध, प्रेम व नोक-झोंक, जिससे जीवन का अमृत रुपी रस बरसता रहता हैं और व्यक्ति निरंतर ही कुछ सीखता रहता है।

पति-पत्नी: प्रेम, सामंजस्य और पूरकता का अनूठा संबंध

कुल मिलाकर एक अद्भुत, विलक्षण एवं अद्वितीय सम्बन्ध। हमने मानवता के साथ रहना और पति-पत्नी को सामाजिक सरोकारों के साथ जीवन पर्यन्त अपने जीवनसाथी वाले धर्म को निभाते देखा है। ये दोनों ही समाज की एक मजबूत इकाई यानि परिवार को सुद्रढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पवित्र भारत भूमि की इस पावन धरा में विद्यमान लोगों की एक पावन सोच के अनुसार पति-पत्नी का संबंध ऐसा भी मान सकते हैं जैसे कि हमारे दोनों पैर, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए चलना जरूरी है और चलने के लिए दोनों पैरों का सामंजस्य। इस प्रकार संतुलन तभी होगा जब दोनों पैर समान रूप से शरीर का भार उठाएंगे, एक पैर आगे बढ़ता है तो दूसरा उसे संतुलित करने के लिए पीछे आ जाता है। दोनों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि दोनों ही एक दूसरे के पूरक है एक आगे आया तो एक पीछे, जब पीछे वाले की आवश्यकता होगी तब पिछला पैर भी आगे आ जायेगा और अपना कार्य करेगा।  इसी प्रकार जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती रहेगी बिना किसी एक को तकलीफ पहुंचाए या ज्यादा भार डाले। किसी भी पैर को अकड़ में रहने की जरुरत नहीं है क्यूंकि आगे रहने वाला पैर इसलिए आगे आ रहा है जब पीछे वाला संतुलित रहकर मजबूती प्रदान कर रहा है।

माँ

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा।।

मां के जैसा ना कोई छाया दे सकता है और ना ही कोई आश्रय ही दे सकता है और मां के समान ना ही कोई हमें सुरक्षा ही दे सकता है मां इस पूरे ब्रह्मांड में जीवन दायिनी है और उसके जैसा कोई दूसरा नहीं है। ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं पर फिर भी केवल अयोनिज लोगों को छोड़ दें तो बाकी सभी को जन्म के लिए तो माता का गर्भ ही चाहिए। अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ थे, जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई। इस संसार में सबसे पवित्र तो माँ ही है जो कभी अपने संतान का बुरा नहीं चाहती है, भले पुत्र कैसा भी हो, जैसा कि कहा गया है-

‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति’ भावार्थ है ‘पुत्र का बुरा होना संभव है लेकिन मां कभी भी कुमाता नहीं बन सकती।

माँ का नाम हृदय में आते ही मन प्रसन्न हो जाता है इसमें कोई शंका नहीं है। 90 प्रतिशत महिलाओं ने भी अपना सबसे उत्तम स्वरुप माँ को ही माना है, जबकि यह सबसे ज्यादा जिम्मेदारी का कार्य है। माँ के स्वरुप को सबसे उत्तम मानने का उनका कारण था, एक अर्थपूर्ण जिम्मेदारी, जिसमे पालन पोषण, पढ़ाई, देख-रेख व उत्तम संस्कार बच्चे के अंतर्मन में बैठा देने की बड़ी चुनौती होती हैं, और जीवन भर बिना किसी अपेक्षा के पूर्ण समर्पण के साथ  कार्य किया जाता है। इन सब के बाद भी एक अबोध अनभिज्ञ बालक को एक शिक्षित व संस्कारी वयस्क बनते देखने का सुख अनूठा ही होता है l ऐसी करुणामयी माता के लिये कहा गया है…

‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भ धारण से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।

उपाध्यायान दशाचार्य अचार्याणाम शतं पिता, सहस्रं तु पितृनि माता गौरवेणातिरिच्यते।(मनुस्मृति) 

इसका भावार्थ यह है कि वेदांगों के सहित वेद अध्ययन कराने वाले द्विज आचार्य का दस गुना, आचार्य से पिता का सौ गुना और पिता से माता का स्थान हजार गुना होता है। यह भी एक विडम्बना है कि इस जगत में कुछ लोगों के माँ ही नहीं है, कुछ लोग किसी ना किसी कारण से माँ के पास नहीं रह पाते हैं और एक-दो लोग ऐसे भी मिले जिनका माँ के साथ का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा जिसका कारण माँ के ऊपर एक असीमित स्वभाव में बसा चिड़चिड़ापन, कारण चाहें जो भी हो पर है तो बहुत दुःख की बात।

कई बार महिलाओं ने बताया कि घर में बेटियों के स्वरुप में, माँ के लगातार आने वाले सुझाव व परामर्श से बहुत ज्यादा परेशान हो जाती थीं। ऐसे ही हमारी एक प्रिय वरिष्ठ ने बताया कि कुछ दशक पूर्व छुटपन में एक बार उनकी साइकिल पंक्चर होने पर वे संध्या समय कुछ लेट हो गयी, माताजी बहुत क्रोधित हुई और उन्होंने ज्यादा कोई बात सुने बिना एक थप्पड़ रसीद दिया, पर उन्हें कुछ समझ नहीं आया और ना तो पूछने का साहस हुआ पर आज इतने वर्षों के बाद जब हम स्वयं माँ के रुप में हैं तो उनकी बातों का व डांट का मर्म समझ आता है कि सौ दिशाओं से चीजों को जानना व उनको व्यवस्थित करना कितना मुश्किल कार्य है।

हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार संसार से विदा लेने के बाद भी माता-पिता प्रत्यक्ष रूप से ना भी हों तो सूक्ष्म रूप से हमेशा ध्यान रखते हैं। हमारी एक प्रिय वरिष्ठ मैडम की जब शल्य चिकित्सा होना तय हुआ तो वे हॉस्पिटल में दाखिल हो गयी। सर्जरी से एक दिन पहले रात्रि के समय उनकी अनुभवी व वरिष्ठ सर्जन को सपने में हमारी मैडम की माताजी ने आकर उनके बारे में हाल-चाल पूछा व ध्यान रखने को कहा। प्रातः जब सर्जन ने अपना कार्य सफलता पूर्वक कर लिया तो उनको असीम शांति मिली। माँ के सपने में आने वाली बात सर्जन ने कुछ समय बाद हमारी मैडम को बताई, तो माँ को याद करके उनकी आँखे नम हो गयी। ऐसा निश्छल होता है माँ का प्यार व करुणा, जो शरीर छोड़ने के बाद भी अपने बच्चों के साथ, प्रेम के अगोचर तंतुओं से जुडा होता है।

जगतजननी

चूंकि कलिकाल सभी पर प्रभाव डालता है और आज की आधुनिक मातायें भी इससे अछूती नहीं है। जीवन की हर दिशा में, हम हमेशा अर्थ या अहं जैसी नकारात्मक सोच को सर्वोपरि रखकर नहीं चल सकते है l  रिश्तों की नाजुक डोर तो विनम्रता, सहनशीलता, त्याग व सामंजस्य के कारण ही जुडी रहती है। जगतजननी हो या प्रत्यक्ष रूप में विद्यमान हमारे इस स्वरुप की जननी या फिर उनका कोई और रूप, वे हमेशा ही करुणा, प्रेम, त्याग व वात्सल्य के रस से आप्लावित रहती हैं। ऐसी स्त्री का कोई भी स्वरूप मनभावन ही होता है l कलिकाल का यह तमसयुक्त समय है और हम कभी अपनी कुतर्क भरी बातों से या कभी अर्थ कमाने की दौड़ में अपने घर-परिवार व माताओं की उपेक्षा कर रहे हैं। हमारी जीवन यात्रा का प्रारंभ उनकी कोख से, बचपन माँ के आँचल की भीनी सी छाँव में व कुछ बड़े होने पर उनके मार्गदर्शन व आशीर्वाद से  ही संभव हो पाता है। हमें सदैव ही इस बात का भी आभास होना चाहिए कि हम कितनी भी संपत्ति जोड़ लें या कितना भी नाम कमा लें पर अपनी माता के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकते हैं।

अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥ (श्रीदुर्गासप्तशती)

सभी देवताओं से उत्पन्न हुआ और तीनों लोकों में व्याप्त, वह अतुल्य तेज जब एकत्रित हुआ तब वह नारी बना।

Topics: importance of motherimportance of women Indian cultureNavratriwomen powerWomen Respect
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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