9/11 के बाद दुनिया के अनेक देशों और महाद्वीपों में एक के बाद एक आतंकी हमले हुए। न्यूयॉर्क से लंदन, मैड्रिड से पेरिस तक आतंकवाद ने सुरक्षा, समाज और शासन की बुनियाद को चुनौती दी। इसके बावजूद दशकों तक संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद की सर्वमान्य और स्पष्ट परिभाषा तय नहीं कर पाया। सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी थी? किसके दबाव में विश्व संस्था आतंकवाद और कट्टरपंथ की स्पष्ट पहचान से बचती रही? जिस विषय पर सामान्य विवेक से भी स्पष्टता संभव थी, उसे तय करने में दशकों लग गए। यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं,आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक इच्छाशक्ति की गंभीर विफलता है।
समस्या केवल संयुक्त राष्ट्र तक सीमित नहीं है। आज भी अनेक देश और समाज यह कहने से नहीं थकते कि ‘आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता।’ आतंकवाद को किसी मजहब या उसके अनुयायियों से जोड़ना निश्चित रूप से उचित नहीं है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह भी है कि आतंकवाद के पीछे काम करने वाली विचारधाराओं, संगठनों और उनके वैचारिक आधार की पहचान करने से भी बचा जाए?
यदि घोषित लगभग 750 कट्टरपंथियों में से 710 एक ही मजहबी पृष्ठभूमि से आते हैं, तो इस तथ्य पर आंखें मूंद लेना कितना उचित है? जब तक इस सच को देखने की हिम्मत नहीं करेंगे और शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाकर यह मानेंगे कि कोई खतरा नहीं है, तब तक यह स्थिति न केवल दुर्भाग्यपूर्ण, बल्कि अत्यंत भयावह बनी रहेगी।

इसका निष्पक्ष और गंभीर अध्ययन क्यों न हो? क्या केवल इसलिए कि कोई निष्कर्ष असुविधाजनक हो सकता है, उसके कारणों की जांच भी रोक दी जाए? कट्टरपंथी हिंसा के पीछे विचारधारा, प्रचार-तंत्र, वित्तपोषण, भर्ती के तरीके और सामाजिक प्रभाव—इन सभी का आपराधिक तथा वैचारिक अनुसंधान होना चाहिए। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई तभी प्रभावी होगी, जब हम आतंकवादी हिंसा के साथ-साथ उसे जन्म देने वाली विचारधारा और उसके नेटवर्क को भी पहचानने का साहस दिखाएं।
इसके बाद जो स्थिति बनती है, वह है इस्लामोफोबिया के नाम पर आलोचना या सवाल को दबाने की कोशिश। यानी कट्टरपंथी गतिविधियों पर कार्रवाई न हो। और यदि हो, तो कार्रवाई करने वाले को इस्लामोफोबिक घोषित कर दिया जाए। इसके बाद ‘गजवा-ए-हिंद’ या विश्व को ‘दारुल इस्लाम’ बनाने जैसी घोषणाएं सामने आती हैं। विश्व को इन अवधारणाओं और इनके खतरे को समझना ही होगा। खतरे की घंटी बज चुकी है।
फ्रांस में जो घटनाक्रम चल रहे हैं, वे चिंता का विषय हैं। वहां मुस्लिम जनसंख्या लगभग 10 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है, और सांप्रदायिक हिंसा तथा आगजनी जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इस पर केवल फ्रांस सरकार को नहीं, पूरे यूरोप को चिंतित होना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर अपना वक्तव्य दिया है, लेकिन विश्व के बुद्धिजीवी अभी मौन हैं। यह मौन शुतुरमुर्ग जैसा रवैया है—खतरे पर चर्चा न करो, या ऐसी ‘शालीनता’ दिखाओ जिससे इस्लामोफोबिया का आरोप न लगे।
इंग्लैंड में भी यही हुआ, जहां बलात्कार के मामले बढ़ते गए और उनमें अधिकांश आरोपी पाकिस्तानी व बांग्लादेशी मूल के थे। फिर भी इस पर खुलकर जांच और चर्चा को जरूरी नहीं समझा गया। सवाल है जो अपराध हुए, उनके लिए कार्रवाई हो रही है या नहीं? जिन लोगों ने अपराध किया, उन पर कार्रवाई तो हो, पर जिन लोगों ने उस अपराध पर आवरण चढ़ाया, वे भी दोषी हैं और उन पर भी ऐतिहासिक कार्रवाई होनी चाहिए।
दुनिया और हमारे देश को तय करना होगा कि चरमपंथी अपराध पर कठोर कार्रवाई होगी, चाहे अपराधी किसी भी बिरादरी या तथाकथित साथी गुट से हो।

















