पश्चिम बंगाल की राजनीति का चरित्र और मिजाज हमेशा से सत्ता के संरक्षण और प्रशासनिक रुख से तय होता रहा है। हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर इस सत्य को सिद्ध कर दिया है कि “सब दिन होत न एक समान”। वही हुमायूं कबीर, जो कभी दो घंटे में हिंदुओं को भागीरथी में फेंक देने की खुलेआम धमकी देता था, जो बाबरी ढांचे की तर्ज पर मुर्शिदाबाद में नई बाबरी बनाने का शिलान्यास करता था, जो थाना घेरकर पुलिस अधिकारी को कॉलर से खींचने की खुली चुनौती देता था और विपक्षी नेताओं पर आक्रामक हमला बोलता था, आज कैमरों के सामने आंसू बहाते हुए राजनीति से निवृत्ति की भाषा बोल रहा है।
रेजीनगर की घटना और निवृत्ति का ऐलान
7 अक्टूबर 2026 को रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव के दौरान पुलिस से तीखी भिड़ंत और तत्पश्चात हुई गिरफ्तारी के बाद, अगले दिन मीडिया के सामने रोते हुए हुमायूं कबीर ने एक बड़ा राजनीतिक बयान दिया। उन्होंने कहा:
“जब तक शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री रहेंगे तो मैं विधानसभा नहीं जाऊंगा। नओदा की जनता से माफी मांगकर राजनीति से स्वैच्छिक निवृत्ति ले लूंगा।”
हालांकि, अगर प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए, तो तकनीकी रूप से न तो उन्होंने विधायक पद से औपचारिक इस्तीफा दिया है और न ही अपनी पार्टी ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ से खुद को अलग किया है। यह केवल एक सार्वजनिक और राजनीतिक बयान है। ऐसे नेताओं के बयानों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए। हो सकता है कि उपचुनाव में संभावित खराब प्रदर्शन की बदनामी से बचने के लिए यह बयान दिया गया हो, या फिर पुराने आपराधिक मामलों और फाइलों के खुलने के डर से जेल जाने से बचने के लिए यह रणनीतिक संदेश दिया जा रहा हो कि “भाई, सब राजनीति ही छोड़ दूंगा”।
जब शुभेंदु ने विधानसभा में पढ़े कबीर के बयान
यह वही व्यक्ति है जिसने जून 2026 में बंगाल की राजनीति को अपने बयानों से गरमा दिया था। तब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में खड़े होकर हुमायूं कबीर के दो अति-विवादास्पद भाषणों के अंश हू-बहू पढ़कर सुनाए थे।


तब हुमायूं कबीर के खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं और राज्य में सख्त कानून का राज स्थापित करने की सीधी चेतावनी दी गई थी।
जब तक छतरी थी, शेर बना रहा
हुमायूं कबीर की पूरी राजनीतिक यात्रा पश्चिम बंगाल के सियासी समीकरणों की एक कड़वी हकीकत को उजागर करती है। जब तक राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकारें रहीं, तब तक वह अपनी मर्जी का राजा बना रहा। मुर्शिदाबाद क्षेत्र में 65 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी के जनसांख्यिकीय आधार ने उसे वह राजनीतिक ताकत और दुस्साहस दिया, जिसके बल पर वह प्रशासनिक तंत्र को चुनौती देता था।
तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक के ध्रुवीकरण के चक्कर में बार-बार उसके बयानों और हरकतों की ओर से अपनी आंखें मूंद लीं। न तो उसके उग्र बयानों पर समय रहते कठोर दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही उसके सांप्रदायिक उकसावे को रोका गया। इसके विपरीत, उसे राजनीतिक संरक्षण देकर लगातार बढ़ावा दिया गया। तृणमूल कांग्रेस में वह मंत्री बना, फिर पार्टी से निकाला गया, पुनः वापस लिया गया, फिर निलंबित हुआ लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इतने लंबे समय तक उसे इतनी छूट क्यों मिलती रही?
इसका सीधा कारण यह है कि वह वोट बैंक की राजनीति का एक बेहद उपयोगी उपकरण था। तुष्टिकरण की राजनीति को जीवित रखने के लिए ऐसे उग्र चेहरों की आवश्यकता होती है जो बहुसंख्यक समुदाय में डर पैदा कर सकें, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को धार दे सकें और फिर वक्त आने पर खुद को पीड़ित बताकर सहानुभूति बटोर सकें। हुमायूं कबीर ने दशकों तक इसी भूमिका को बखूबी निभाया।
सत्ता का बदलाव और नए कानून का राज
अब पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य और प्रशासनिक रुख पूरी तरह बदल चुका है। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही कानून-व्यवस्था का रुख कड़ा हुआ है। अब एक बात साफ तौर पर दिखने लगी है,गुंडागर्दी, धमकी, पुलिस पर दबाव और गैरकानूनी गतिविधियां इस नई प्रशासनिक व्यवस्था में हुमायूं कबीर जैसा कोई भी नेता नहीं कर पा रहा है और न ही कर सकता है।
इसी प्रशासनिक सख्ती का नतीजा है कि कबीर अब यह स्वीकार करने पर मजबूर हैं कि राज्यसत्ता और पुलिस प्रशासन से कोई नहीं लड़ सकता। जो नेता कल तक सबको आंख दिखाता था, थाना घेरने की बात करता था, आज वही आंखों में आंसू भरकर कैमरों के सामने राजनीती से निवृत्ति की गुहार लगा रहा है।
यह कोई नैतिक स्वैच्छिक निवृत्ति नहीं, बल्कि कानून के शासन के आगे हार का सीधा स्वीकार है। यह उस राजनीति का अंत है जो वोटों की फसल काटने के लिए नफरत बोती थी और सत्ता का संरक्षण छिनते ही आंसू बहाने लगती है। सब दिन होत न एक समान। जब तक तुष्टिकरण करने वाली सरकारें थीं, तब तक हुमायूं कबीर जैसे लोग राजनीतिक छतरी के नीचे शेर बने रहे। जैसे ही वह छतरी हटी और कानून ने अपना काम शुरू किया, वही आक्रामकता भीगी बिल्ली में बदल गई। आज पश्चिम बंगाल को किसी समुदाय विशेष के नाम पर उग्रता बेचने वाले नेताओं की नहीं, बल्कि समान नागरिक कानून, निष्पक्ष प्रशासन और सच्ची धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता है,जहां कोई भी व्यक्ति बहुमत या तुष्टिकरण के बल पर धमकी न दे सके।
















