यह श्लोक सनातन धर्म के प्रख्यात ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के चतुर्थ अध्याय से लिया गया है।
श्लोक :
यमान् सेवेत सततं न नित्यं नियमान् बुधः।
यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्।।
भावार्थ :
प्रत्येक व्यक्ति को ‘यम’ अर्थात् आत्मनियन्त्रण के साधनों ब्रह्मचर्य, दया, शान्ति, दान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), मधुरता एवं इन्द्रियनिग्रह का नियमित रुप से पालन करना चाहिए, इसी प्रकार नियमों अर्थात् जो यम के समान अनिवार्य तो न हो, परन्तु जिनका आचरण उपयोगी हो (जैसे शौच, यज्ञ करना, जप, दान, स्वाध्याय, कर्मेन्द्रियनिग्रह, व्रताचरण, मौन रहना, उपवास करना व स्नानाचरण) निश्चित रूप से पालन करना चाहिये। यमों का पालन न करने वाला तथा केवल नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति पतित हो जाता है।
श्लोक की प्रासंगिकता (Relevance) :
यह श्लोक जीवन में आंतरिक नैतिकता और बाह्य आचरण के बीच के संतुलन को समझाने के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है:
आंतरिक शुद्धि और सदाचार की प्रधानता: श्लोक यह संदेश देता है कि केवल बाहरी कर्मकांड, नियम, उपवास या पूजा-पाठ (नियम) तब तक अर्थहीन हैं, जब तक व्यक्ति के भीतर नैतिक मूल्य, संयम और मानवीय गुण (यम) विकसित न हों।
मूल्यों का पतन: यदि कोई व्यक्ति क्रोध, हिंसा, लोभ या अहंकार (यमों की उपेक्षा) से भरा हुआ है और केवल दिखावे के लिए धार्मिक अनुष्ठान या बाह्य नियम निभाता है, तो उसका नैतिक पतन निश्चित है।
संतुलित जीवनशैली: यह हमें सिखाता है कि जीवन में स्थायी शांति और प्रगति के लिए मूलभूत मानवीय और नैतिक मूल्यों (सत्य, अहिंसा, संयम आदि) का निरंतर अभ्यास सर्वोपरि होना चाहिए।

















