30 सितंबर की घटना केवल विमानन जगत को झकझोरने वाली त्रासदी नहीं थी। वह संकट की घड़ी में साहस, संयम और कर्तव्यनिष्ठा की परीक्षा भी थी। फ्लाईदुबई के भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस परिस्थिति में अपनी जान जोखिम में डालकर विमान में सवार लोगों की सुरक्षा के लिए निर्णायक भूमिका निभाई, वह भारतीय पायलटों के साहस का उदाहरण है। उनकी बहादुरी की चर्चा दुनिया भर में हो रही है।
लेकिन इस पूरी घटना का एक बेहद असहज करने वाला पहलू भी है। भारत में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने इस बहादुर भारतीय के लिए एक शब्द कहना भी जरूरी नहीं समझा। यह चुप्पी असहज करने वाली है। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि कैप्टन मच्छार किसी खास राजनीतिक विचारधारा के खांचे में फिट नहीं बैठते? क्या इसलिए कि उनकी बहादुरी की प्रशंसा करने से किसी की वोट-बैंक की राजनीति प्रभावित हो सकती है? या इसलिए कि हर घटना को राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत इतनी गहरी हो चुकी है कि एक भारतीय की बहादुरी भी उस चश्मे से बाहर दिखाई नहीं देती?
एक भारतीय ने संकट की घड़ी में साहस दिखाया। अपनी जान जोखिम में डालकर विमान में बैठे लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दुनिया के सामने भारत का मान बढ़ाया। इसमें राजनीति कहां से आ गई? बहादुरी का कोई दल नहीं होता। साहस की कोई विचारधारा नहीं होती। और किसी भारतीय के असाधारण पराक्रम को सलाम करने के लिए किसी राजनीतिक प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
इस घटना का दूसरा पहलू और अधिक गंभीर है, जिससे आंखें मूंदना खतरनाक होगा। आतंकवाद और कट्टरपंथ के प्रश्न पर राजनीतिक सुविधा के लिए मौन नहीं साधा जा सकता। अगर किसी व्यक्ति ने किसी कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर विमान को जानबूझकर दुर्घटनाग्रस्त करने का प्रयास किया, तो उसकी निंदा स्पष्ट और बिना किसी संकोच के होनी चाहिए। संयुक्त अरब अमीरात ने घटना को आतंकवादी हमला माना है और जांच भी कर रहा है। यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट रहनी चाहिए—यह लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ नहीं, बल्कि उस कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ है जो मजहब के नाम पर हिंसा और आतंक को उचित ठहराती है।
इस्लाम को मानने वाले भारत सहित दुनिया भर में करोड़ों शांतिप्रिय लोग हैं। उन्हें भी मजहबी कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ सबसे स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए।
किसी आतंकी के अपराध के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराना उतना ही गलत है, जितना कट्टरपंथ के प्रश्न से बचने के लिए हर आलोचना को ‘घृणा’ बता देना। धार्मिक पहचान के नाम पर हिंसा करने वालों के खिलाफ सबसे स्पष्ट आवाज उस समाज के भीतर से भी उठनी चाहिए, जिसके नाम का दुरुपयोग आतंकवादी करते हैं।
आज यदि कोई विमान में बैठने से पहले पायलट का नाम और पहचान देखने लगे, किसी चिकित्सक के पास जाने से पहले उसकी पहचान को लेकर आशंकित हो, तो हमें इस अविश्वास की जड़ तलाशनी होगी। यह अविश्वास किसने पैदा किया? मजहब के नाम पर हिंसा करने वालों ने। लेकिन उसका उपचार किसी मजहब या समुदाय को कठघरे में खड़ा करना नहीं है। उपचार है—कट्टरपंथ की पहचान, आतंकवाद की स्पष्ट निंदा और हिंसक विचारधाराओं के विरुद्ध ईमानदार लड़ाई।
सच को सच कहने का साहस चाहिए। और बहादुरी को बहादुरी कहने का भी। कैप्टन स्मित मच्छार ने अपना कर्तव्य निभाया। अब हमारी बारी है, उनकी बहादुरी को राजनीति से ऊपर उठकर सलाम करने की। कैप्टन स्मित मच्छार, भारत आपको सलाम करता है।

















