यह प्रसिद्ध श्लोक ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ तथा ‘हितोपदेश’ (प्रस्ताविका) जैसे संस्कृत सुभाषित और नीति-ग्रंथों में संकलित है।
श्लोक :
गतेऽपि वयसि ग्राह्या विद्या सर्वात्मना बुधैः।
इह चेत्स्यान्न फलदा फलदा साऽन्यजन्मनि।।
भावार्थ :
अवस्था बीत जाने पर भी बुद्धिमानों के द्वारा विद्या पूरे मन से ग्रहणीय है। यदि वह इस लोक में फल देने वाली नहीं है, तो दूसरे जन्म में अवश्य फल देगी।
श्लोक की प्रासंगिकता (Relevance)
आजीवन सीखने का संदेश : यह श्लोक स्पष्ट करता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया जीवन के किसी भी पड़ाव पर रुकनी नहीं चाहिए।
प्रयास का शाश्वत मूल्य: यह विचार व्यक्त करता है कि अर्जित ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि वर्तमान जीवन में उसका सीधा लाभ न भी मिले, तो भी वह हमारी चेतना, बुद्धि और भावी संस्कारों को समृद्ध करता है।
मानसिक सतर्कता व सकारात्मकता: वृद्धावस्था या ढलती उम्र में नई विद्या सीखने से मन सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण बना रहता है।

















