ओरिक्काई (कांचीपुरम)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने हाल ही में ओरिक्काई में कांची कामकोटि पीठ के आचार्यों से भेंट की. इस दौरान उनका पारंपरिक स्वागत किया गया, जहां उन्हें औपचारिक पगड़ी (हेडगियर) पहनाकर सम्मानित किया गया और श्री कामाक्षी अम्बाल देवस्थानम का प्रसाद भेंट किया गया, जबकि वरिष्ठ विद्वानों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार किया जा रहा था.

सरसंघचालक जी ने श्री कांची कामकोटि पीठ के जगतगुरु श्री शंकरा विजयेन्द्र सरस्वती शंकराचार्य स्वामीगल द्वारा श्री चंद्रमौलेश्वर स्वामी के लिए किए जा रहे अभिषेक के दर्शन किए. इसके बाद उन्होंने समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए वैदिक विद्वानों द्वारा आयोजित वैदिक मंत्रोच्चार, जप और विशेष प्रार्थनाओं में भाग लिया.

दंपती पूजन और श्रौत यज्ञ ‘संग्रहणीययेष्टि’ की पूर्णाहुति के बने साक्षी
परिवार औरार्मिक मूल्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए एक पारंपरिक दंपती पूजन का आयोजन किया गया, जिसमें 60 वर्ष का वैवाहिक जीवन पूरा करने वाले एक अष्टवर्षीय (बुजुर्ग) दंपती ने 60 बुजुर्ग जोड़ों का सम्मान किया.

“मोहन भागवत जी ने दुनिया भर के लोगों के लिए शांति, समृद्धि और खुशी की प्रार्थना के साथ संपन्न हुए श्रौत अनुष्ठान ‘संग्रहणीययेष्टि’ की पूर्णाहुति भी देखी।”
इसके पश्चात उन्होंने श्री कांची मठ द्वारा शिक्षा, वेद और चिकित्सा (विद्या, वेद और वैद्य) के क्षेत्र में चलाई जा रही पहलों का अवलोकन किया, जिसमें स्कूल, वेद पाठशालाएं, पारंपरिक शिल्प और मूर्तिकला प्रशिक्षण केंद्र तथा बालिकाओं को सांस्कृतिक शिक्षा देने वाले संस्थान शामिल हैं. उन्होंने पूज्य शंकराचार्य स्वामी जी के आशीर्वाद से संचालित चैरिटी मैनेजमेंट कोर्स का पूरा करने वाले छात्रों के पहले बैच के प्रमाणपत्र वितरण समारोह में भी शिरकत की.

गुरुजी गोलवलकर की ऐतिहासिक यात्रा से जुड़े शताब्दी पुराने घर का किया भ्रमण
अपने दौरे के अंत में, सरसंघचालक जी ने ओरिक्काई स्थित उस शताब्दी पुराने घर का भ्रमण किया, जहां वर्ष 1955 में गुरुजी एम.एस. गोलवलकर ने पूज्य कांची महास्वामी के दर्शन किए थे.

कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण:
- दिव्य दर्शन: जगतगुरु आदि शंकराचार्य की पादुकओं की विशेष पूजा और टोटकाष्टकम का पाठ.
- सामाजिक मूल्य: पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए पारंपरिक दंपती पूजन.
- ऐतिहासिक स्मरण: गुरुजी गोलवलकर की 1955 की ऐतिहासिक यात्रा की स्मृति में परिवार द्वारा सरसंघचालक जी को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया.
- चतुर्मास्यम स्थल: इसी घर में 1988 में कांची आचार्य त्रिवेणी द्वारा चतुर्मास्यम भी किया गया था.
यह यात्रा सांस्कृतिक एकता, सनातन परंपराओं के संरक्षण और समाज कल्याण के संदेश को और अधिक सुदृढ़ करने वाली रही.

















