जालौर: राजस्थान के जालोर से एक प्रेरणा देने वाली और गर्व करने वाली एजुकेशनल उपलब्धि सामने आई है। यहां, क्लास 10 के स्टूडेंट माधव जोशी और उनकी छोटी बहन क्लास 9 की स्टूडेंट अर्चना जोशी ने अपनी छुट्टियों का सही इस्तेमाल करके और अपनी नोटबुक में 100 उपनिषद लिखकर एक शानदार मिसाल कायम की है। जालोर के आदर्श विद्या मंदिर के स्टूडेंट माधव ने कुल 65 उपनिषद लिखे, जबकि उनकी छोटी बहन अर्चना ने 35 उपनिषदों को सुंदर और सटीक लिखावट में लिखा। इन्हें उपनिषदों का लेखन करने में लगभग 100 दिन का समय लगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष को यादगार बनाने का विचार करके भाई बहन ने ग्रीष्मावकाश, दीपावली अवकाश एवं शीतकालीन अवकाश के दिनों का उपयोग कर यह उपनिषद लेखन किया। दोनों भाई बहन आदर्श विद्या मंदिर जालौर के विद्यार्थी हैं।
केवल लेखन नही, ज्ञान साधना भी
यह काम सिर्फ़ नकल या प्रैक्टिस का मामला नहीं था, बल्कि इस प्रोसेस में भाई-बहन दोनों को भारतीय ज्ञान परंपरा के एक अहम खजाने, उपनिषदों के नाम, बनावट, विषय-वस्तु और फिलॉसफी से जुड़ी बहुत सी नई जानकारी मिली। उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि कुछ उपनिषद केवल एक-दो श्लोकों में सीमित हैं, जबकि कई उपनिषद अत्यंत विस्तृत हैं। विभिन्न उपनिषदों के अलग अलग शांतिपाठ की भी जानकारी मिली। इस दौरान संस्कृत भाषा के अनेक नवीन शब्दों को पढ़ने, समझने और आत्मसात करने का अवसर भी मिला।
संघ शताब्दी वर्ष का संकल्प
वर्तमान वर्ष में देशभर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने की चर्चा एवं कार्यक्रम चल रहे हैं। ऐसे समय में परिवार एवं विद्यालय में इसकी चर्चा सुनकर इन बच्चों ने 100 अंक से जोड़कर कुछ सार्थक, सकारात्मक और यादगार कार्य करने का निश्चय किया। घर में 108 उपनिषदों की पुस्तक उपलब्ध थी। ऐसे में ग्रीष्म अवकाश में ही उन्होंने उपनिषदों का लेखन प्रारंभ कर दिया। जो दीपावली अवकाश और शीतकालीन अवकाश में भी जारी रहा। दोनों भाई-बहन संघ और सेविका समिति से जुड़े हैं।
पहले रामायण, अब उपनिषद
उल्लेखनीय है कि 2020 में कोरोना काल के दौरान जब स्कूल बंद थे, तब कक्षा 3 और 4 में पढ़ते हुए इन भाई-बहनों ने अपनी नोटबुक के 2100 पन्नों में संपूर्ण रामचरितमानस को हाथ से लिखा था। यह निरंतर साधना, अनुशासन और भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति उनकी गहरी रुचि को दर्शाता है। देशभर में उनके कार्य की चर्चा और सराहना हुई थी।। अनेक स्थानों पर विद्यार्थियों ने इसका अनुकरण भी किया था।
विद्यालय परिवार ने किया अभिनंदन
यह जानने पर कि स्कूल में पढ़ने वाले एक भाई-बहन ने 100 उपनिषद लिखे हैं, विद्या भारती से जुड़े आदर्श विद्या मंदिर जोधपुर प्रांत के निवर्तमान प्रांतीय सचिव महेंद्र दवे, जालोर जिला सचिव दिनेश गौड़ और जिला व्यवस्थापक जानकी प्रसाद गुप्ता ने दोनों छात्रों के घर जाकर उन्हें बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। योग गुरु बाबा रामदेव, शिक्षाविद डॉ अतुल भाई कोठारी सहित अनेक गणमान्य लोगों ने दोनों विद्यार्थियों के इस श्रेष्ठ कार्य की प्रशंसा करते हुए अपनी शुभकामनाएं व्यक्त की है।भारतीय संस्कृति, संस्कृत साहित्य और ज्ञान की वैदिक परंपरा को बचाने और पढ़ने के लिए भाई-बहन की यह कोशिश समाज को एक प्रेरणा देने वाला संदेश देती है कि खाली समय का इस्तेमाल सिर्फ़ मनोरंजन के लिए ही नहीं, बल्कि क्रिएटिविटी और आध्यात्मिक अभ्यास के लिए भी किया जा सकता है। कम उम्र में यह बौद्धिक और सांस्कृतिक कोशिश बेशक आने वाली पीढ़ियों के लिए “ज्ञान से मूल्यों” का एक प्रेरणा देने वाला उदाहरण बनेगी।
ज्ञान और विज्ञान का भंडार है उपनिषद
उपनिषद वैदिक साहित्य का दार्शनिक शिखर हैं। ‘उपनिषद’ का अर्थ है- गुरु के समीप बैठकर निश्चयपूर्वक प्राप्त किया गया गूढ़ ज्ञान। ये वेदों के ज्ञानकाण्ड का प्रतिनिधित्व करते हैं। उपनिषद ज्ञान को केवल सूचना नहीं, बल्कि अनुभूति और आत्मबोध मानते हैं। ये कौन जानता है से आगे बढ़कर कैसे जाना जाए पर बल देते हैं। चेतना, मन, प्राण, इंद्रियाँ और ब्रह्मांड के पारस्परिक संबंध का विश्लेषण उपनिषदों को मानव-चेतना का वैज्ञानिक अध्ययन बनाता है। उपनिषदों में तर्क, परीक्षण और निषेध द्वारा सत्य तक पहुँचने की विधि है, जो वैज्ञानिक सोच से मेल खाती है। पंचकोश सिद्धांत, प्राण-ऊर्जा, कारण–कार्य और एकत्व की अवधारणा आधुनिक मनोविज्ञान, न्यूरोसाइंस और क्वांटम चिंतन से संवाद करती दिखती है। इसलिए उपनिषद ज्ञान और विज्ञान के बीच सेतु हैं।
कर्मकांड से ऊपर उठकर उपनिषद आत्मबोध, विवेक और वैराग्य पर बल देते हैं। मुक्तिकोपनिषद के अनुसार 108 उपनिषद प्रमाणिक माने गए हैं। जिनमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक जैसे दस प्रमुख उपनिषदों पर आचार्य शंकराचार्य ने भाष्य लिखा। शैली की दृष्टि से उपनिषद संवाद, उपदेश और आत्मचिंतन का संतुलित प्रयोग करते हैं, जिससे दर्शन जीवंत और अनुभूतिपरक बनता है। उनकी महत्ता को शोपेनहावर, मैक्स मूलर, पॉल ड्यूसन, एर्विन श्रोडिंगर और टी. एस. एलियट जैसे विदेशी विचारकों ने भी स्वीकार किया है।
















