नंदादेवी महोत्सव के दौरान मां नंदा के डोले का नगर भ्रमण किया गया। इसके बाद देर शाम मंदिर के समीप झील में डोले का विसर्जन किया जाएगा। इस अवसर पर श्रद्धालुओं में आस्था और भावुकता का माहौल देखने को मिला।
राजा बाज बहादुर चंद से जुड़ा है मां नंदा की उपासना का इतिहास
इतिहास और स्थानीय परंपराओं में राजा बाज बहादुर चंद का विशेष उल्लेख मिलता है। विद्वानों के कथानुसार लगभग 17वीं सदी के आसपास मां नंदा की प्रतिमा को कुमाऊं लाया गया और राजपरिवार ने उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित किया।
बाद में चंद शासकों ने इस महोत्सव और नंदा उपासना को राजपरंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। लेकिन मां नंदा की आराधना केवल चंद राजाओं तक सीमित नहीं थी।
परंपराओं में कत्यूरी और गढ़वाल के पंवार शासकों के साथ भी मां नंदा उपासना के संबंध मिलते हैं। इसी व्यापक राजपरंपरा के कारण ही मां नंदा को ‘राजराजेश्वरी’ भी कहा जाता है।
मां नंदा के डोले के नगर भ्रमण में उमड़ा आस्था का माहौल
नंदादेवी महोत्सव के तहत मां के डोले का नगर भ्रमण आयोजक संस्था श्री राम सेवक सभा के तत्वावधान में किया गया। नगर भ्रमण के बाद देर शाम मंदिर के समीप झील में मां के डोले का विसर्जन किया जाएगा।
इस दौरान जगह-जगह भंडारे, जूस, लस्सी व फलों का वितरण किया गया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दी शुभकामनाएं
प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी व श्री राम सेवक सभा के सभी पदाधिकारियों ने सभी श्रद्धालुओं, पर्यटकों व प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं दीं।
महोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं और लोगों के लिए जगह-जगह भंडारे, जूस, लस्सी व फलों का वितरण किया गया।
हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी का स्वरूप मानी जाती हैं मां नंदा
लोकमान्यतानुसार मां नंदा को हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इसलिए कुमाऊं के लिए मां नंदा का रिश्ता एक बेटी का है, जो कुछ दिनों के लिए मायके आती है और फिर कैलाश लौट जाती है।
यही भाव मां नंदा महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता है। मां नंदा आती हैं तो खुशियां साथ लाती हैं और फिर जब ससुराल वापस जाती हैं तो उदासी के वातावरण से चहुंओर भावुकता छा जाती है।
जैसे कि पूरा कुमाऊं अपनी बेटी को आंखों में आंसू और हृदय में आशीर्वाद देकर विदा कर रहा हो।
कुमाऊं और गढ़वाल को सांस्कृतिक रूप से जोड़ती है मां नंदा की आस्था
मां नंदा की आस्था ने सदियों से कुमाऊं और गढ़वाल को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम भी किया है। नंदा उपासना से जुड़ी परंपराएं दोनों क्षेत्रों की सांस्कृतिक विरासत में विशेष स्थान रखती हैं।
नैनीताल में आयोजित नंदादेवी महोत्सव इसी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

















